सुशांत सिंह राजपूत
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'गली ब्वाय' के सिद्धांत चतुर्वेदी ने चंकी पांडे की बेटी अनन्या पांडे की इस बात पर दिलचस्प प्रतिक्रिया दी थी कि स्टार किड्स को भी स्ट्रगल करना पड़ता है। नए कलाकारों के साथ राजीव मसंद की राउंडटेबल में सिद्धांत ने कहा था कि "जहां से हमारे सपने सच होने शुरू होते हैं, वहां से आपका संघर्ष भी शुरू होता है।" जो लोग सुशांत को जानते हैं वो कहते हैं कि वह हमेशा से अलग किस्म के थे। तथाकथित आउटसाइडर बॉलीवुड में परिवारवाद के बारे में सब कुछ जानते हैं। उन्होंने इसके बीच काम किया है, इससे लड़े हैं और इससे तालमेल भी बिठाया है। दस साल पहले बेंगलुरू से मुंबई एक्टर बनने आए गुलशन देवैया कहते हैं कि लोगों को अपनी बदकिस्मती के लिए दूसरों को दोष देना अच्छा लगता है। कुछ मायनों में सुशांत सिंह राजपूत और देवैया की कहानी एक जैसी है। दोनों शर्मीले, शांत और अंतर्मुखी बच्चे रहे थे।
देवैया कहते हैं कि स्कूल में 'क्यूट किड' कहकर उनका मजाक उड़ाया जाता था। कुछ ऐसी कहानी नसीरुद्दीन शाह की भी थी, वे कुछ और होना पसंद करते थे। स्टेज उन्हें पसंद था जहां वह खुद को खुलकर अभिव्यक्त कर सकें। वहां वो सब बोल सकते थे, जो उन्हें कहीं और बोलने नहीं दिया जाता। देवैया कहते हैं, "बॉलीवुड संगीत के प्रति मेरे पिता के प्रेम और उनके सैकड़ों टेप मुझे विरासत में मिले थे। बचपन की नासमझी में मैं हमेशा एक हिंदी फिल्म स्टार बनने का सपना देखता था।" लेकिन इसके बदले वह 1997 में बेंगलुरू के नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ फैशन टेक्नोलॉजी पहुंच गए, डिजाइनर बनने के लिए। 1998 में उन्होंने 'सत्या' देखी और सामान बांधकर 2008 में मुंबई आ गए, बॉलीवुड में किस्मत आजमाने। देवैया की नजर में बॉलीवुड एक ऐसी काल्पनिक दुनिया है, जो पूरी तरह भरमाती है। देवैया कहते हैं, "हमारे यहां होने का पूरा श्रेय रामगोपाल वर्मा और मनोज वाजपेयी को जाता है। मैं जानता हूं कि मैं अच्छा दिखता हूं लेकिन मैंने खुद को कभी शानदार मूवी स्टार के तौर पर नहीं देखा।"