फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

ऐसे शुरू किया था सुशांत सिंह राजपूत ने अभिनेता बनने का सफर, आसान नहीं थी डगर

Wed, 24 Jun 2020 06:01 PM IST
anand anand बीबीसी हिंदी
विज्ञापन
1 of 14
सुशांत सिंह राजपूत - फोटो : सोशल मीडिया
उस रात उन्होंने शनि ग्रह के छल्ले को देखा था। आसमान में करोड़ों किलोमीटर दूर उन्हें यह नजारा दिखा था। चांद भी दिखा था। उस टेलीस्कोप से जो चंबल के बीहड़ों में बसे छोटे से-कस्बे धौलपुर में उन्होंने लगाया था। उन रातों को याद करते हुए अभिनेता रणवीर शौरी बताते हैं कि किस तरह इन सबके बीच गुरू ग्रह भी दिख रहा था लेकिन वे सिर्फ उन नारंगी छल्लों को याद कर रहे थे। वे याद करते हैं कि किस तरह उन्होंने बीहड़ के बीच उस कस्बे में बिताई कुछ रातों को आसमान में अनंत की ओर देखा था। धौलपुर में लोग अपनी फिल्म 'सोनचिरैया' की शूटिंग के लिए डेरा जमाए हुए थे।

उसी दौरान दिवंगत अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत ने कुछ विलक्षण आकाशीय घटनाओं को देखने के लिए एक मजमा जुटाया था। उस रात चांद कुछ दूसरे ग्रहों की सीध में आने वाला था, तो कुछ इस तरह के थे सुशांत। थोड़े अलग-से। रणवीर बरसों पहले सुशांत के साथ बिताए अपने दिनों को कुछ इस तरह याद करते हैं। इसके साथ यह भी बताते हैं कि सुशांत ने किस तरह उन्हें गणित के सिद्धांतों के बारे में बताया था। रणवीर कहते हैं कि मौत की बात सोचकर उन्हें कंपकंपी होने लगती है।

खैर, बॉलीवुड क्रूर जगह तो है ही। शायद सुशांत को यहां दरकिनार किया जा रहा हो लेकिन तब तक वो स्टार बन चुके थे। शौरी कहते हैं कि बॉलीवुड की दुनिया जोखिम से भरी है। यहां कब कामयाबी आपसे रूठ जाए कोई कह नहीं सकता। यहां दुनिया का सारा गणित मिलाकर भी कामयाबी का कोई फॉर्मूला बनाना मुश्किल है। आखिरकार यह बाजार है। सनक भरा बाजार। साथ ही बेरहम और पूर्वाग्रह से भरा मीडिया भी मौजूद है। शौरी बताते हैं, "सुशांत में एक बेचैनी थी। उनके अंदर एक बेताब एनर्जी थी। वह शर्मीला-सा चुपचाप रहने वाला लड़का। उनसे आसानी से बातचीत नहीं हो सकती थी क्योंकि वो अपनी ही दुनिया में खोए रहते थे। मैं तो कहूंगा कि स्टार दो तरह के होते हैं। एक जो बॉक्स ऑफिस को चलाते हैं। और दूसरे जिन्हें मीडिया और भाई-भतीजावाद से जुड़ी ताकतें स्टार बनाती हैं। सुशांत असली स्टार थे। अगर आप उस क्लब के मेंबर नहीं हैं तो आपकी जिंदगी बेहद मुश्किल हो जाती है। आपको रिजेक्ट किया जाता है। आपको रोका जाता है और आपके सामने एक दीवार खड़ी की जाती है।"

जाहिर है, इन सबके बीच रहना आसान नहीं होता है। आपको इन सबके बीच अस्तित्व बनाए रखना होता है। बॉलीवुड की चमक के पीछे एक काला घना अंधेरा भी है, ठीक वैसे ही जैसे चाँद का अंधेरा हिस्सा है जो सुशांत के टेलीस्कोप से भी नहीं दिखता। लोग कह रहे हैं कि सुशांत सिंह राजपूत डिप्रेशन की दवा ले रहे थे। रविवार की सुबह उन्होंने खुदकुशी कर ली। उनका टेलीस्कोप पीछे छुट गया।
विज्ञापन

2 of 14
सुशांत सिंह राजपूत - फोटो : सोशल मीडिया
अतीत को कई तरह से देखा जा सकता है। 34 साल के इस एक्टर के अतीत को, जो अपने पीछे कोई नोट छोड़कर नहीं गए लेकिन उन्होंने अपने पीछे कुछ शब्द छोड़ दिए थे। कुछ आकृतियां, कुछ विचार छोड़े थे और इनमें से ज्यादातर उन चीजों के बारे में थे, जो उन्होंने अंतरिक्ष में देखे थे। स्पेस की उनकी यह यात्रा उनकी उन अधूरी-सी कविताओं में पिरोई हुई थी, जिन्हें वो अपने 'ख्यालात' कहा करते थे। वह साइंस में डूबे रहने वाले शख्स थे। वे आधे कवि भी थे। उनके बारे में समझना हो तो उनकी पढ़ी हुई चीजों से कुछ सुराग मिल सकता है। उन्होंने जो देखा उसे देखकर ही आप उनके बारे में कुछ समझ सकेंगे। सुशांत को पता था कि शनि ग्रह के छल्ले धूमकेतुओं के टुकड़े, छोटे तारों या इसके सशक्त गुरुत्वाकर्षण से चकनाचूर चांदों के टुकड़े हैं। ये बर्फ, पत्थर और धूल हैं। सुशांत ने फिलीप रोथ को पढ़ा था, वाल्डो इमर्सन को भी, वह ईई कमिंग्स को कोट किया करते थे। वह रात में अनंत की ओर देखा करते थे। वह कहा करते थे कि तारे किस तरह अंतरंग होकर एक दूसरे को गले लगा रहे हैं। उन्हें पीटर प्रिंसिपल नाम के कॉन्सेप्ट के बारे में पता था। उनके पास 200 किलो का भारी-भरकम टेलीस्कोप था। उन्होंने आसमान की मैपिंग की थी। उन्हें याद्दाश्त चले जाने के बारे में पता था।
विज्ञापन

3 of 14
सुशांत सिंह राजपूत - फोटो : सोशल मीडिया
वह ब्लैक होल और चांद के गड्ढों को बारे में जानते थे। उन्हें 'डार्क साइड ऑफ मून' के बारे में भी पता था और जब भी वह आसमां में उन तारों को देखते थे जो समय की यात्रा कर रहे होते थे। उन्हें नीत्शे के बारे में भी पता था। नीत्शे कहा करते थे अगर आप लंबे वक्त तक शून्य को घूरते हैं तो वह भी आपको घूरने लगता है। शायद वो सितारों की भीड़ में खुद को अकेला, अलग-थलग खड़े पाते थे। शायद सुशांत स्पूतनिक हैं। वो सेटेलाइट जिसे छोड़े जाने के तीन महीने के बाद हर 96 मिनट पर पृथ्वी का चक्कर लगाना था, जो टूट कर बिखर गया था। वह अंतरिक्ष में विलीन हो गया था। शायद स्पूतनिक वो प्रेमी था जो ब्लैक होल में खो गया। बगैर पृथ्वी का चक्कर लगाए वह सीधे अनंत में विलीन हो गया। इसके पीछे न कोई सिद्धांत काम कर रहा था और न कोई भौतिकी और न ही कोई रसायनशास्त्र।

सुशांत एक ऐसे शख्स थे, जो हमारे सामने थोड़ा खुले भी थे और थोड़ा बंद भी। उनमें कई चीजों का मेल दिखता था। यह एक ऐसे आदमी की कहानी थी, जिसने हमने तवज्जो नहीं दिया। खुदकुशी के बाद कई लोगों ने उनके बारे में कई चीजें लिखीं। किसी ने खुदकुशी के तरीके के बारे में लिखा, तो कुछ ने इसकी वजह बताई। उसकी मौत की साजिश के बारे में बातें हुईं। पुलिस की पूछताछ और डॉक्टरों पर बयानों को लेकर चर्चा हुई। उनकी खुदकुशी को लेकर कई लॉबियाँ खड़ी हो गईं। भाई-भतीजावाद की भर्त्सना की गई। बिहार के मुजफ्फरपुर में बॉलीवुड के एक्टर्स और डायरेक्टरों के खिलाफ एफआईआर दर्ज हुई। एफआईआर में आरोप लगाया गया कि सुशांत को कुछ लोगों ने खुदकुशी के कगार पर पहुंचा दिया था। कुछ ने कहा कि पहले उन्हें प्रेम में फंसाया गया और फिर धोखा दे दिया गया। एक मीडिया संस्थान ने तो ये थ्योरी दे दी कि उनकी मौत का नाता उनके ट्विटर प्रोफाइल में लगी वैन गॉग की पेंटिंग से है, एक महान डच चित्रकार जिसने खुद को गोली मार ली थी। इन सबमें डिप्रेशन की कहानी गायब थी। और शायद यही खुदकुशी की इस दुखद कहानी का सबसे अहम पहलू था।

4 of 14
सुशांत सिंह राजपूत - फोटो : सोशल मीडिया
बॉलीवुड के लिए वह पूरी तरह से बाहरी थे। दर्शक उन्हें जानते थे, सेलेब्रेट करते थे। अपनी पहली फिल्म 'काई पो चे'में उन्होंने एक ऐसे युवा शख्स का रोल किया जो क्रिकेट का दीवाना है और जो एक युवा मुस्लिम लड़के को कोचिंग देता है ताकि वह आगे खेल सके। यह एक ऐसी भूमिका थी, जिसे आप भुला नहीं सकते। उस क्षण को तो आप अपने जेहन से कभी झटक ही नहीं पाएंगे जब वह खिड़की से रेंगते हुए बाहर निकलते हैं और बस की छत पर चढ़ जाते हैं। उनमें छोटे शहर के उस लड़के की झलक मिलती है जो अपनी आकांक्षाओं और जुनून के बीच डुबकियां लगाता रहता है। यह मां-बाप की महत्वाकांक्षाओं और आजादी के आकर्षण के बीच कश्मकश की कहानी है। आप लोगों को जिंदगी के उस हिस्से के बारे में बखूबी पता होगा। बिहार ऐसी ही जगह है, जहां छोटी उम्र के बच्चों के दिमाग में सपने रोप दिए जाते हैं। इंजीनियर, डॉक्टर, सिविल सर्वेंट बनने से लेकर शादी करने और सैटल होने तक सपने। यहां आपको हर दीवार पर आपको कोचिंग सेंटर के विज्ञापन चिपके मिलेंगे। सुशांत सिंह राजपूत ने इंजीनियरिंग की पढ़ाई के लिए एंट्रेस एग्जाम दिया था और इसमें पूरे देश भर में सातवीं पोजिशन पर आए थे। एक्टिंग के फील्ड में उतरने से पहले वे मैकेनिकल इंजीनयरिंग की पढ़ाई कर रहे थे। एक्टिंग के लिए उन्होंने इंजीनियरिंग दी थी।

 
विज्ञापन

5 of 14
सुशांत सिंह राजपूत, सिद्धांत चतुर्वेदी - फोटो : सोशल मीडिया
सुशांत सिंह का जन्म बिहार के पूर्णिया जिले के मलडीहा में 1986 में हुआ था। पांच भाई-बहनों में सबसे छोटे। सभी बहनें, सिर्फ एक भाई। अपनी मां के बेहद करीब। वह शांत रहने वाला बच्चे थे। 2003 में मां की मौत का उस पर गहरा असर रहा। वह हमेशा एकांतप्रिय रहा। सुशांत के परिवार की नजदीकी रंजीता ओझा कहती हैं कि वह अपनी मां के बहुत करीब थे। मां की याद उन्हें बहुत सताती थी। हंसराज स्कूल में दाखिले के लिए वे दिल्ली के मुखर्जी नगर आ गए थे, अपनी बहन के साथ रहने। बहन यहीं रहकर सिविल सर्विसेज की तैयारी करती थीं।

सुशांत ने डेल्ही कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग में दाखिला ले लिया था। वह हमेशा मुस्कुराते रहते। रंजीता को उनकी यही मुस्कुराहट हमेशा याद आती है। या तो वे पार्क में अकले घूमते या फिर अपनी पढ़ने की मेज पर होते। वह मेज भी कुछ अलग थी। उस पर मिनिएचर एंटिक कारों के मॉडल रखे थे। साथ में उनकी असेंबल की हुई छोटी मशीनें भी थीं। उस छोटी-सी उम्र में किशोर होते हुए सुशांत रेने देकार्ते और सार्त्र के बारे में बात किया करते थे। सुशांत की बहन ने दर्शनशास्त्र में ग्रेजुएशन किया था। रंजीता कहती हैं, वे काफी समझदार थे। भाई-भतीजावाद कोई नई बात नहीं है। जो लोग नामी हैं उनके घरों में बच्चों से भी नाम कमाने की उम्मीद की जाती है। दिवंगत ऋषि कपूर और नीतू सिंह के बेटे रणवीर कपूर, कपूर खानदान की चौथी पीढ़ी के अभिनेता हैं। उन्होंने एक इंटरव्यू में कहा था कि फिल्म इंडस्ट्री में उन्हें ज्यादा मौके इसलिए मिले क्योंकि वह फिल्मी परिवार से ताल्लुक रखते हैं।
 
विज्ञापन

6 of 14
सुशांत सिंह राजपूत - फोटो : सोशल मीडिया
राजपूत श्यामक डावर के डांस ट्रूप में थे। उन्होंने बेरी जॉन के एक्टिंग स्कूल में एक्टिंग भी सीखी थी। बाद में वे नादिरा बब्बर के एक 'एकजुट थियेटर' से भी जुड़े। सुशांत जब कॉलेज में थे तो उन्होंने अपनी सबसे बड़ी बहन को फोन कर कहा था कि वे डांस करना चाहते हैं। सुशांत के एक पारिवारिक मित्र ने बताया कि उस दौरान उनकी बहन ने उसकी मदद की थी। बड़ी बहन ने पिता को नहीं बताया कि सुशांत डांस करने के लिए मुंबई गए हैं। पिता को उन्होंने यह बताया कि वह इंटर्नशिप पर वे मुंबई में हैं। जल्दी ही सुशांत को नोटिस किया जाने लगा और फिर 'किस देश में रहता है मेरे दिल' से उनका टीवी का करियर शुरू हुआ। फिर वे एकता कपूर के सीरियल 'पवित्र रिश्ता'में लीड रोल में दिखे।

2011 में उन्होंने बॉलीवुड पर नजरें टिकाईं, जहां फिल्म इंडस्ट्री से ताल्लुक रखने वाले रणवीर सिंह, वरुण धवन, रणवीर कपूर जैसे स्टार मौजूद थे। परिवार का फिल्मी बैकग्राउंड हो तो करियर में दूसरा या तीसरा चांस भी मिल जाता है। कई बार ब्रेक मिल जाते हैं। लेकिन फिल्मी दुनिया के बिल्कुल बाहर वाले शख्स के लिए तो सिर्फ एक मौका मिलता है। मगर सुशांत की पहली ही फिल्म सफल रही। इसके बाद आई मनीष शर्मा की 'शुद्ध देसी रोमांस'(2013)। इसके बाद उन्होंने राजकुमार हिरानी की फिल्म 'पीके' (2014) में उन्होंने सरफराज की भूमिका निभाई। इसके बाद सुशांत को यशराज फिल्म ने साइन किया और उन्हें दिबाकर बैनर्जी की 'डिटेक्टिव ब्योमकेश बख्शी' फिल्म मिली।

पढ़ें: सोनू निगम को मिला संगीतकार सलीम मर्चेंट का साथ, सोना ने कहा फिल्मों के आगे जहां और भी है..
विज्ञापन

7 of 14
सुशांत सिंह राजपूत का घर - फोटो : सोशल मीडिया
विकास चंद्रा की मुलाकात सुशांत सिंह राजपूत से ब्योमकेश बख्शी के सेट पर हुई थी। विकास कहते हैं कि "जिस भाई-भतीजावाद की बात की जा रही है, उसने सुशांत को नहीं मारा। उन्हें तो एक महामारी ने मारा और वह है अकेलापन। हमारे चारों ओर भारी अकेलापन है। आपको पता नहीं कि अकेलापन क्या कर सकता है। खास कर ऐसे शख्स के साथ, जो डिप्रेशन से जूझ रहा हो। और जो किसी ने किसी रूप में अकेला रहा हो। इंडस्ट्री में भाई-भतीजावाद के बावजूद वह स्टार बन गए थे। सुशांत को भी पता था कि उन्हें सब कुछ मिल गया है। लेकिन वह एक अलग शख्स भी थे"। चंद्रा बॉलीवुड के बारे में कहते हैं, "यह एक खास चौखटे में फिट दुनिया है। इसमें खोखलापन और भौंडापन है और साथ है इस चौखटे में खुद को फिट करने का दबाव। यहां की व्यवस्था से थोड़ा-सा अलग होते ही अटकलबाजियाँ शुरू हो जाती हैं।

आपके बारे में तरह-तरह की बातें बनाई जाने लगती हैं।" चंद्रा कहते हैं कि भाई-भतीजावाद की यह कहानी दरअसल भारतीय समाज की कहानी है। चंद्रा कहते हैं, "भारत भरोसा न करने वालों का देश है। हमारे अंदर किसी के प्रति भरोसा नहीं हैं। हम इसी तरह विकसित हुए हैं। आखिर हमें सिफारिशों की क्यों जरूरत पड़ती है। हम सब इस विडंबना को समझते हैं। दरअसल, हम दोहरा जीवन जीने में पारंगत लोग हैं। बॉलीवुड इसी दोहरेपन में जीता है। यहां लोग खानदानी कारोबार करते हैं। लेकिन यह सच्चाई है कि यहां प्रतिस्पर्द्धा भी बेहद कड़ी है। परफॉरमेंस रिव्यू तो आखिर जनता ही देती है"। यही वजह है कि नामी हीरो-हीरोइनों के बच्चों में से कुछ ही फिल्म में चलते हैं क्योंकि यहां भी 'सर्वाइवल ऑफ द फिटेस्ट' का सिद्धांत चलता है। बॉलीवुड आपको ऊंचाई देने का वादा करता है। आप पूरे देश में मशहूर हो जाना चाहते हैं। बॉलीवुड आप को इससे  निकलने ही नहीं देता। चंद्रा कहते हैं "लोग यहां तारीफ पाने के लिए आते हैं। शो बिजनेस ऐसा ही होता है।"

8 of 14
सुशांत सिंह राजपूत - फोटो : सोशल मीडिया
सच तो यही है कि आदित्य चोपड़ा ने ही ब्योमकेश बख्शी के रोल के लिए सुशांत सिंह राजपूत का नाम सुझाया था। चंद्रा कहते हैं, "वह अपने काम के प्रति गंभीर थे। स्टार की तरह उनके नखरे नहीं थे। वह आने वाले दौर के स्टार थे। इस बात को वह जानते थे।" चंद्रा आगे बताते हैं, "सुशांत को यह अहसास कराया गया कि वह आउटसाइडर हैं। वह नेटवर्किंग और पीआर जैसी चीजों से नफरत करते थे। मुझे पता था कि उन्हें ये चीजें अच्छी नहीं लगती थीं लेकिन अगर आप ये सब चीजें नहीं करते हैं आपको इससे जुड़े फायदे भी नहीं मिलते, लेकिन यह भी सच्चाई है कि इन सब चीजें के बावजूद वहां पहुंचे, जहां उन्हें पहुंचना था। नई पीढ़ी के स्टार्स में उनका भी नाम था।" जब करनी सेना जैसे संगठनों ने कहा कि फिल्म पद्मावत राजपूत संस्कृति का अपमान करती है इसलिए उसे रिलीज नहीं होने देना चाहिए। इसके बाद सुशांत ने कहा कि वे अपने नाम में से राजपूत शब्द हटा रहे हैं जिसके नाम पर इस तरह के विवाद पैदा किए जा रहे हैं। चंद्रा कहते हैं कि भाई-भतीजावाद एक ऐसा मुद्दा है, जिसमें अब कोई दम नहीं है। "सुशांत सिंह भाई-भतीजावाद के तर्क की काट हैं। उन्हें किसी करण जौहर की जरूरत नहीं थी। दरअसल शीर्ष पर अकेलापन होता है। यह किसी को भी पागल बना सकता है। हमें यह नहीं सिखाया जाता कि सफलता को कैसे हैंडल करना है। हमें पता ही नहीं कि सफलता का हम करें क्या? दिबाकर बनर्जी ने एक इंटरव्यू में कहा कि बॉलीवुड के बाहर के लोगों को यहां जमने के लिए दोगुनी मेहनत करनी पड़ती है।

 

9 of 14
सुशांत सिंह राजपूत - फोटो : सोशल मीडिया
'गली ब्वाय' के सिद्धांत चतुर्वेदी ने चंकी पांडे की बेटी अनन्या पांडे की इस बात पर दिलचस्प प्रतिक्रिया दी थी कि स्टार किड्स को भी स्ट्रगल करना पड़ता है। नए कलाकारों के साथ राजीव मसंद की राउंडटेबल में सिद्धांत ने कहा था कि "जहां से हमारे सपने सच होने शुरू होते हैं, वहां से आपका संघर्ष भी शुरू होता है।" जो लोग सुशांत को जानते हैं वो कहते हैं कि वह हमेशा से अलग किस्म के थे। तथाकथित आउटसाइडर बॉलीवुड में परिवारवाद के बारे में सब कुछ जानते हैं। उन्होंने इसके बीच काम किया है, इससे लड़े हैं और इससे तालमेल भी बिठाया है। दस साल पहले बेंगलुरू से मुंबई एक्टर बनने आए गुलशन देवैया कहते हैं कि लोगों को अपनी बदकिस्मती के लिए दूसरों को दोष देना अच्छा लगता है। कुछ मायनों में सुशांत सिंह राजपूत और देवैया की कहानी एक जैसी है। दोनों शर्मीले, शांत और अंतर्मुखी बच्चे रहे थे।

देवैया कहते हैं कि स्कूल में 'क्यूट किड' कहकर उनका मजाक उड़ाया जाता था। कुछ ऐसी कहानी नसीरुद्दीन शाह की भी थी, वे कुछ और होना पसंद करते थे। स्टेज उन्हें पसंद था जहां वह खुद को खुलकर अभिव्यक्त कर सकें। वहां वो सब बोल सकते थे, जो उन्हें कहीं और बोलने नहीं दिया जाता। देवैया कहते हैं, "बॉलीवुड संगीत के प्रति मेरे पिता के प्रेम और उनके सैकड़ों टेप मुझे विरासत में मिले थे। बचपन की नासमझी में मैं हमेशा एक हिंदी फिल्म स्टार बनने का सपना देखता था।" लेकिन इसके बदले वह 1997 में बेंगलुरू के नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ फैशन टेक्नोलॉजी पहुंच गए, डिजाइनर बनने के लिए। 1998 में उन्होंने 'सत्या' देखी और सामान बांधकर 2008 में मुंबई आ गए, बॉलीवुड में किस्मत आजमाने। देवैया की नजर में बॉलीवुड एक ऐसी काल्पनिक दुनिया है, जो पूरी तरह भरमाती है। देवैया कहते हैं, "हमारे यहां होने का पूरा श्रेय रामगोपाल वर्मा और मनोज वाजपेयी को जाता है। मैं जानता हूं कि मैं अच्छा दिखता हूं लेकिन मैंने खुद को कभी शानदार मूवी स्टार के तौर पर नहीं देखा।"

10 of 14
सुशांत सिंह राजपूत - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
सुशांत की तरह ही देवैया ने थियेटर से शुरुआत की। उन्हें भी नोटिस किया गया और ऑडिशन के लिए बुलाए गए। उन्हें 'गर्ल इन येलो बूट्स' में रोल मिला, जिसमें कल्कि का बड़ा रोल था। उस दौरान उनसे जान-पहचान थी। गुलशन देवैया कहते हैं कि यहां आप इतनी बार नकारे जाते हैं कि इसे दिल पर लेना छोड़ देते हैं। आप इसके लिए किसी से व्यक्तिगत रंजिश नहीं रखते। गुलशन बताते हैं कि इंडस्ट्री में कई ऐसे लोग हैं जो आज भी ऑडिशन ही दे रहे हैं। आर्मी से मेजर की नौकरी छोड़कर आए एक सज्जन तो एक साल में 200 से 300 ऑडिशन दे चुके थे। वे कहते हैं,

"बॉलीवुड में आपका गुरूर जाता रहता है और आप अपमान बर्दाश्त करना सीख जाते हैं। मेरे अंदर यह क्षमता नहीं थी। मैं वहीं ऑडिशन देने जाता था, जहां मुझे लगता था कि जाना चाहिए। एक परफॉरमेंस से आप किसी की क्षमता नहीं आंक सकते। आप सिर्फ एक धारणा बना सकते हैं। मेरिट पर यहां कोई ध्यान नहीं देता। न तो मैं खुद को इनसाइडर मानता हूं और न आउटसाइडर।" सुशांत और गुलशन की दो बार थोड़े वक्त के लिए मुलाकातें हुई हैं। दोनों में दुआ-सलाम भी हुई थी। गुलशन कहते हैं, "निश्चित तौर पर इंडस्ट्री में परिवारवाद है। इसका अपना पावर स्ट्रक्चर है। यहां लोग गलत लोगों पर गुस्सा निकालते हैं और कुछ ऐसे हैं जो सोचते हैं कि कामयाबी तो उनका हक है, और फिर स्टार किड्स की जादुई दुनिया तो है ही। यहां केवल काबिलियत से काम नहीं होता।"

11 of 14
सुशांत सिंह राजपूत - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
गुलशन याद करके बताते हैं कि जब वह गोवा में 'दम मारो दम' की शूटिंग कर रहे थे तो लोग उनके पास आकर पूछते थे कि क्या वे राज बब्बर के बेटे हैं। जब वे राजस्थान में शूटिंग कर रहे थे तो आमिर खान की बेटी डायरेक्टर को असिस्ट कर रही थीं। गुलशन ने देखा कि भीड़ उन्हें देखने के लिए आती थी। उत्सुकता उन लोगों को वहां खींच लाई थी। यह एक खास किस्म का फायदा तो देता ही है। लेकिन आखिर में किसी भी एक्टर का भाग्य तो बाजार ही तय करता है। मसलन, शाहरुख खान को ले लीजिए। वो तो बिल्कुल आउटसाइडर हैं। लेकिन उन्होंने बॉलीवुड में बड़ा नाम कमाया जबकि कई हीरो-हीरोइनों के बच्चे लॉन्च किए गए। उन्हें दूसरा, तीसरा मौका भी मिला लेकिन वे चल नहीं पाए। अब सिर्फ भाई-भतीजावाद को दोष देना ठीक नहीं होगा। अब हमें आरोप लगाने से बचना होगा। अब हमें तार्किक आकलन करना होगा। देवैया ने 2013 में रिलीज हुई 'काई पो चे' के लिए भी ऑडिशन दिया था। इस फिल्म को ठीक-ठाक कामयाबी मिली थी। वे कहते हैं, "सुशांत को यह फिल्म मिल गई और उन्हें पंसद करने वालों का फैन बेस भी बन गया। मुझे यह फिल्म नहीं मिली। यहां हर कोई चाहता है कि उसे यशराज फिल्म का कॉन्ट्रेक्ट मिले लेकिन ऐसा नहीं होता।"


 

12 of 14
सुशांत सिंह राजपूत - फोटो : सोशल मीडिया
सोशल मीडिया पर बताए जा रहे तमाम वाकयों और पेश किए जा रहे सबूतों से गुजरने के बाद ऐसा लग सकता है कि सुशांत को किनारे किया गया। उनका मजाक उड़ाया गया और परेशानी झेलनी के लिए छोड़ दिया गया। यह सच है या नहीं पता नहीं। लेकिन उनके हाथ में जो प्रोजेक्ट थे और बॉक्स ऑफिस पर उनकी फिल्मों को जो सफलता मिली थी, उससे लगता है कि उनका करियर उठाने के लिए उन्हें किसी करन जौहर की जरूरत नहीं थी। इंडस्ट्री में परिवारवाद के वर्चस्व के बावजूद उन्होंने कामयाबी हासिल कर दिखाया था। शाहरुख और इरफान के अलावा ऐसी मिसालें कम ही हैं कि कोई एक्टर टीवी धारावाहिकों से शुरू करे और सुपरस्टार बन जाए लेकिन सुशांत यहां तक पहुंचे।

और जैसा कि देवैया कहते हैं "उन्होंने बॉलीवुड में अपनी पारी अच्छे तरीके से खेली।" बॉलीवुड में जल्दी ही लोग परिवारवाद के बीच काम करना सीख जाते हैं। अगर यहां स्टार किड्स चमक रहे हैं तो ऐसे भी लोग हैं जो बगैर रिश्तेदारी के और पावर सेंटर्स और तमाम चीजों के बावजूद कामयाबी तक पहुंच रहे हैं। डायरेक्टर अभिषेक कपूर ने मीडिया में सुशांत सिंह राजपूत के बारे में अपने बयान में कहा "एक कोमल मस्तिष्क को बड़े ही व्यवस्थित तरीके से चोट पहुंचाई गई।" शायद यही इस त्रासद खुदकुशी की वजह बनी। लेकिन सुशांत को जो मानसिक चोट पहुंचाई गई उसके लिए सिर्फ बॉलीवुड के परिवारवाद को ही दोषी नहीं ठहराया जा सकता। शेखर कपूर के निर्देशन में बनने वाली फिल्म 'पानी' के लिए सुशांत ने 12 प्रोजेक्ट ठुकराए। सुशांत इस हैसियत में थे कि ऐसा कर सकते थे। 2019 में उन्होंने अकेले व्यावसायिक तौर पर सफल फिल्म दी। 'सोनचिरैया' में भी उनकी भूमिका को आलोचकों की खूब सराहना मिली थी।

13 of 14
सुशांत सिंह राजपूत - फोटो : सोशल मीडिया
इंडस्ट्री से बाहर का होना और परिवारवाद का शिकार होने जैसे तर्कों से हम सुशांत की उपलब्धियों पर अपना नजरिया छोटा कर लेते हैं। तमाम कठिनाइयों के बावजूद उनकी सफलता को प्रति यह असम्मान प्रकट करने जैसा है। सुशांत, नवाजुद्दीन सिद्दिकी को पसंद करते थे। लेकिन उन्हें नवाजुद्दीन की तरह संघर्ष नहीं करना पड़ा। उन्हें उस छवि को साथ लेकर संघर्ष नहीं करना पड़ा, जिन्हें स्थायी रूप से गरीब आदमी की भूमिका के लिए फिट माना जाने लगा। कई साल पहले नवाजुद्दीन ने मुझसे एक इंटरव्यू में कहा था, "मुझे अपने संघर्षों पर गुस्सा आता था। मुझे हर चीज पर गुस्सा आने लगा था।" एक वक्त था जब कोई भी उन्हें गंभीरता से नहीं लेता था। जब वह कहते थे कि उन्हें लीड रोल चाहिए तो उनके दोस्त यह कहकर उन्हें खारिज कर देते थे कि "तुम हीरो मैटेरियल नहीं हो।" उस इंटरव्यू के दौरान उन्होंने मुझसे कहा था कि "मैं एक दिन बॉलीवुड का सबसे ज्यादा फीस लेने वाला एक्टर बनना चाहता हूं"। बॉलीवुड में संघर्ष रहा है। कुछ इसे झेलने में नाकाम रहे, जैसे अनिल कपूर के बेटे हर्षवर्धन कपूर लेकिन नवाजुद्दीन जैसे लोगों ने संघर्ष कर जगह बनाई। सुशांत सिंह राजपूत ने भी इसी संघर्ष से अपनी जगह बनाई।
विज्ञापन

14 of 14
सुशांत सिंह राजपूत - फोटो : सोशल मीडिया
नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो ( NCRB) के मुताबिक 2018 में देश में खुदकुशी के 1,34,516 मामले सामने आए। इसके पिछले साल के मुकाबले 3।6 फीसदी अधिक। डॉक्टरों के नजरिए से देखें तो खुदकुशी एक धुंधला-सा विषय है। इसे समझने के लिए हमें उन लेखकों की जिंदगी पर नजर दौड़ानी पड़ती है जो बायोपोलर डिसऑर्डर और डिप्रेशन के शिकार हो गए। यह इसे समझने का एक तरीका हो सकता है। इसके जरिए यह समझा जा सकता है कि खुदकुशी करने वाले शख्स के दिमाग में क्या चलता रहता है। यह सच है कि जो लोग डिप्रेशन से जूझ रहे हैं वे दर्द झेल रहे होते हैं और जानते हैं कि इसकी कोई दवा नहीं है, उन्हें एक दर्द से दूसरे दर्द तक का सफर तय करते रहना होगा। यही वजह है कि डिप्रेशन से जूझ रहे शखस् को 'वाकिंग वुंडेड' कहा जाता है, यह लड़ाई में घायल ऐसे सैनिक को कहा जाता है जो जख्मी तो है लेकिन अपने पैरों पर खड़ा है। खुशनुमा मुस्कान वाले सुशांत सिंह राजपूत अपरिचितों के साथ रहते थे। बाद में वह अपने अतीत के साथ रहने लगे थे। अपने इंस्टाग्राम अकाउंट पर सुशांत की कविता के टुकड़े में हमें उनकी पहचान मिल सकती है। उन टुकड़ों में ही सही। उन्हें जोड़कर ही हम उन्हें पहचान सकते हैं। उस शख्स को जिसने छोटे-छोटे टुकड़े में आकाश को एक साथ जितना हो सके, जोड़ने की कोशिश की थी। सुशांत सफर करते रहे लेकिन उन्होंने अपनी जमीन नहीं छोड़ी थी। तीन जून को उन्होंने मां की तस्वीर पोस्ट की थी, जिसमें उन्होंने लिखा था-- 'आंसुओं से धुंधली होती आंखों से मां की इस तस्वीर को निहारा'। हर जिंदगी का एक पूर्ण विराम होता है लेकिन कई बार यात्राएँ अनंत होती हैं, इसका मतलब यही होता है कि सफर आगे जारी रहेगा। जिस शख्स ने सितारों और ग्रहों को देखा उसकी कहानी अभी खत्म नहीं हुई है। हमें इस कहानी के कई रूप और पात्र देखने को मिलेंगे। अगले कुछ सालों में दुनिया पूरी तरह बदल नहीं जाएगी, और न ही सपने देखने वाले पूरी तरह गायब हो जाएंगे।
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें