सचिन देव बर्मन, संगीत की दुनिया में एक ऐसा नाम जिसने अपने सुरों से एक नए युग की शुरुआत की। आज एसडी बर्मन का जन्मदिन है। उनके नगमों और संगीत को चाहकर भी नहीं भुलाया जा सकता है। आज उनके चाहने वालों के लिए उनके संगीत के सफर के साथ हम लाए हैं कुछ अनसुने किस्से। ये किस्से सुन आप जान पाएंगे कि कितने अद्भुत थे एसडी बर्मन।
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अपने बेटे का बनाया हुआ गाना 'दम मारो दम' सुनकर स्टूडियो से चले गए थे एसडी बर्मन
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एसडी बर्मन को अलग-आलग राज्य के संगीत प्रेमी अलग-अलग नामों से पुकारते थे। कोलकाता के लिए वो "सचिन कारता" तो मुंबई के लिए "बर्मन दा" थे। इसी तरह बांग्लादेश और पश्चिम बंगाल के रेडियो श्रोताओं में "शोचिन देब बोर्मोन" के नाम से जाने जाते थे। वहीं सिने जगत के लिए "एस.डी" थे। एसडी बर्मन त्रिपुरा के राजा नबद्वीप चंद्र देव बर्मन के बेटे थे।
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सचिन 9 भाई-बहनों में से एक थे। उन्होंने शास्त्रीय संगीत की शिक्षा अपने पिता व सितार-वादक नबद्वीप चंद्र देव बर्मन से ली। इसके आगे का संगीत उन्होंने उस्ताद बादल खान और भीष्मदेव चट्टोपाध्याय से सीखा। यहीं से उनकी शास्त्रीय संगीत की जड़ें पक्की हो गईं। अपने पिता की मौत के बाद वो घर से निकल गए और जंगलों में घूमते रहे। उन्होंने घूम-घूमकर बंगाल व आसपास के लोक संगीत की जानकारी ली।
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1930 में एसडी बर्मन ने कोलकाता में "सुर मंदिर" नाम से अपने संगीत विद्यालय की स्थापना की। अब लोग उन्होंने गायक के रूप में पहचानने लगे थे और वो फेमस हो गए। उन्होंने राज कुमार निर्शोने के लिये 1940 में एक बंगाली फिल्म में संगीत भी दिया। उनकी एक स्टूडेंट थी मीरा दास गुप्ता, जिन्हें वो संगीत की तालीम देते थे। धीरे-धीरे दोनों एक-दूसरे को पसंद करने लगे। दोनों ही बहुत अच्छे परिवार से थे।
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इस वजह से दोनों के प्यार को किसी ने स्वीकार नहीं किया। दोनों के परिवारवाले एक-दूसरे को छोड़ने के लिए दबाव बनाने लगे। लेकिन एसडी ने ऐसा करने से मना कर दिया और मीरा से शादी कर ली। 1939 में राहुल देव बर्मन का जन्म हुआ। शादी के बाद एसडी मुंबई आ गए थे। लेकिन मुंबई में काम आसान नहीं था। वहां उन्हें पहचान मिलने में वक्त लगा।
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इससे हताश बर्मन ने वापस कोलकाता जाने का फैसला किया। यही वो समय था जब अशोक कुमार ने उन्हें रोक लिया। उन्होंने कहा "मशाल" का संगीत दो और फिर तुम आजाद हो। दादा ने फिर मोर्चा संभाला। मशाल का संगीत सुपरहिट हुआ। उसी वक्त एसडी की मुलाकात देव आनंद से हुई, जिनकी सिने जगत में अच्छी पहचान थी। देव ने एसडी बर्मन को 'बाज़ी' का संगीत देने को कहा। फिल्म का संगीत काफी हिट रहा।
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उन्होंने अपने बेटे आरडी बर्मन और नासिर हुसैन को भी शास्त्रीय संगीत की शिक्षा दी। बहुत से गाने तीनों ने साथ मिलकर बनाए। एक समय ऐसा आया था जब लता मंगेशकर ने उनके साथ रिकॉर्ड करने के लिये मना कर दिया था। इसके बाद उन्होंने आशा भोसले और गीता दत्त के साथ एक के बाद एक कई हिट गाने दिए। उन्होंने आशा भोसले, किशोर कुमार और हेमंत कुमार को भी बतौर गायक तैयार किया।
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उन्होंने रफी से सॉफ्ट गाने गवाये जब अन्य संगीतकार उनसे हाई पिच गीत गाने को कह रहे थे। बर्मन दा की हमेशा कोशिश रहती कि एक बार जो संगीत उन्होंने दिया उसको अगले किसी भी गाने में दोहराया न जाये। इसी वजह से उनके किसी भी गाने में ऐसा कभी नहीं लगा कि पहले भी किसी गाने में दिया गया हो। बर्मन दा पर एक किताब भी लिखी गई जिसका नाम है- एस डी बर्मन: दी वर्ल्ड ऑफ हिज म्यूजिक’।
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इस किताब में लेखक एस के रायचौधरी ने एसडी के जीवन से जुड़े कई किस्सों के बारे में बताया है। सचिन दा ने आर डी को एक संगीतकार के रूप में संवारा था। लेकिन राहुल देव बर्मन ने अपने पिता की शैली के विपरीत जाकर संगीत देना शुरू कर दिया था। वो अलग-अलग तरह के साजों में हाथ आजमाते रहते थे। इसी के चलते एक बार एसडी अपने बेटे का प्रचलित गाना सुनकर बहुत दुखी हो गए थे।
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जब 'दम मारो दम' गीत गाया जा रहा था तो एसडी स्टूडियो से उठकर बाहर चले गए थे। उनका लटका हुआ चेहरा बयां कर रहा था कि वो बहुत दुखी हैं। वे इस बात से दुखी नहीं थे कि देव आनंद ने ‘हरे रामा हरे कृष्णा’ के लिए उनकी जगह उनके बेटे को मौका दिया। लेकिन वो इस बात से दुखी थे कि उनके बेटे ने उन्हें त्याग दिया था। उनकी विरासत को छोड़ दिया है।
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सचिन दा को फुटबाल और टेनिस से बेहद प्यार था और वे इन खेलों में काफी माहिर भी थे। जब ईस्ट बंगाल और मोहन बगान के बीच मैच हो रहा होता था तो कोई उन्हें फुटबाल के मैदान से दूर नहीं रख सकता था। सचिन ईस्ट बंगाल के प्रबल समर्थक थे। अपनी टीम के मैच हारने पर वो खाना-पीना छोड़ देते थे। गुस्से और दुख के मारे रोते थे। उन्हें अपनी खुशमिजाजी में लौटने में कई दिन लग जाते थे।
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अपने अंतिम समय में सचिन कोमा में चले गए थे। उन्हें ठीक करने की हर कोशिश नाकाम हो चुकी थी। लेकिन उन्होंने एक बात सुनकर अपनी आंखें खोल दी थी। एक दिन ईस्ट बंगाल और मोहन बगान के बीच फुटबॉल लीग हो रही थी। इस मैच में ईस्ट बंगाल ने मोहन बागान को 5-0 से हरा दिया था। राहुल ने यह खबर अपने पिता के कान में चिल्लाकर दी। इस पर उन्होंने अंतिम पर अपनी आंखें खोल दी थीं।