अपनी पहली ही फिल्म स्टूडेंट ऑफ द ईयर 2 से शोहरत की ऊंची छलांग लगा चुकीं अनन्या पांडे के बाबा देश के उन गिने चुने चिकित्सकों में से रहे जिन्होंने देश में दिल के ऑपरेशन करने शुरू किए। अपने बाबा की ही तरह अनन्या भी दिल की बात खरी खरी कहती हैं और करती भी हैं। पिता चंकी पांडे से पारिवारिक अनुशासन और संस्कार सीखने वाली अनन्या से अमर उजाला की एक खास मुलाकात।
सोशल मीडिया पर सबसे ज्यादा अखरने वाली बात आपको क्या लगती है?
जबसे मैंने होश संभाला, खुद को डिजिटल दुनिया में पाया है। 15 साल की उम्र से ही मैं सोशल मीडिया पर सक्रिय हूं और मुझे लगता है कि समय आ गया है कि हमें युवाओं को समझाना चाहिए कि जो कुछ भी वे सोशल मीडिया पर लिखते हैं, पोस्ट करते हैं, उसमें एक जिम्मेदारी का एहसास होना चाहिए। उन्हें ये पता होना चाहिए कि जो कुछ भी वे बस यूं ही जाकर वहां पोस्ट कर देते हैं, उसका समाज के बड़े तबके पर सीधा असर होता है। सोशल मीडिया पर कुछ ऐसे लोग भी हैं जो दूसरों को अनावश्यक डराते-धमकाते रहते हैं, मैं चाहती हूं कि इस बारे में लोगों को जागरूक किया जाए और उन्हें समझाया जाए।
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ananya pandey
- फोटो : social media
आपके सो पॉजीटिव अभियान का उद्देश्य क्या है?
मैंने ‘सो पॉजीटिव’ नाम से एक अभियान भी इसी के चलते शुरू किया है, जहां मैं उन लोगों से बात करने को कोशिश करती हूं जिन्हें सोशल मीडिया पर लोग डराते-धमकाते रहते हैं। आमतौर पर टीनएजर्स इस तरह का कुछ होने पर मन ही मन घुटना शुरू कर देते हैं। मेरा मानना है कि ऐसा कुछ भी होने पर तुरंत किसी ऐसे शख्स से बात करनी चाहिए जिस पर आप विश्वास कर सकते हैं। सोशल मीडिया पर शुरू हुआ ये ट्रेंड काफी खतरनाक है। इससे बच्चों के मानसिक विकास पर असर पड़ता है। मैं अपने इस अभियान के तहत खुद भी ऐसे लोगों से बात करती हूं और उन्हें अपनी समझ के हिसाब से इस सबका सामना करने की जुगत बताती हूं। हमने सो पॉजीटिव का एक पेज बनाया है जहां लोग मुझसे सीधे संपर्क करके इस बारे में मुझसे बात कर सकते हैं।
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ananya pandey
- फोटो : file photo
लोगों का कहना है कि मोबाइल युवा पीढ़ी के लिए नशे की तरह हो गया है, आप क्या कहती हैं इस बारे में?
ये सही है कि मेरी उम्र अभी इतनी नहीं है कि मैं ज्यादा बड़ी बड़ी बातें कर सकूं लेकिन चूंकि डिजिटल दुनिया इतनी तेजी से फैल रही है लिहाजा हमें कहीं न कहीं से तो शुरूआत करनी ही चाहिए। सोशल मीडिया एक नशे की तरह फैल रहा है। मैं भी इंस्टाग्राम या फेसबुक पर लगातार नजर बनाए रखती हूं कि मेरे आसपास क्या हो रहा है, इंडस्ट्री में क्या चल रहा है। तमाम बातें इसी तरह मुझे पता चलती हैं। कहना बहुत मुश्किल है कि सोशल मीडिया से हमें बीच बीच में ब्रेक लेते रहना चाहिए क्योकि शायदमैं खुद भी बिना मोबाइल के एक दिन भी न गुजार पाऊं। पर युवाओं को इसी से बचना है। सोशल मीडिया से बीच बीच में ब्रेक लेते रहना बहुत जरूरी है ताकि अपने असली कम पर सही तरीके से ध्यान लगा पाएं।
अपने जैसे युवाओं को कामयाबी हासिल करने के लिए क्या सलाह देना चाहेंगी?
काम कोई भी हो चाहे आप किसी भी क्षेत्र में हों, कामयाब तभी होंगे जब आप पूरे जी जान से इसमें अपना सौ फीसदी देंगे। अक्सर लोग स्टार किड्स पर वंशवाद के जरिए आगे आ जाने का आरोप लगाते हैं लेकिन अगर मैं करण जौहर से जाकर आसानी से मिल सकती हूं या उनकी फिल्म के लिए ऑडीशन दे सकती हूं तो बस ये फायदा यहीं तक है। अगर काम नहीं आता है, काम के प्रति आपका समर्पण नहीं है, अपने काम की चुनौतियों के लिए आप खुद को मानसिक या शारीरिक तौर पर तैयार नहीं कर पाते हैं तो मौका चाहे जितना बड़ा मिले, वहां कामयाबी मिलना आपके लिए मुश्किल होगा।
निजी और व्यावसायिक जिंदगी में परिवार की अहमियत आपके हिसाब से क्या है?
परिवार किसी भी इंसान के लिए सबसे मजबूत सहारा होता है। आपको विरासत में जो कुछ मिला है, उसे और बेहतर बनाने की हमारी कोशिश होनी चाहिए। चर्चा में बने रहने के लिए अनावश्यक बातें जरूरी नहीं हैं। आपका नाम आपके काम से ही होना चाहिए। मेरे दादाजी देश के बड़े हार्ट सर्जन रहे, पिता ने अभिनय में नाम कमाया तो मेरी ये जिम्मेदारी है कि मैं अब इस परंपरा को आगे ले जाऊं। एक और बात जो मैं अमर उजाला की दिल की डायरी से कॉलम के लिए लिखना चाह रही हूं वह ये कि माता पिता को कभी अपने बच्चों पर किसी तरह का दबाव नहीं बनाना चाहिए जैसे कि मेरे माता पिता ने मेरे ऊपर करियर चुनने का कभी कोई दबाव नहीं बनाया। हर युवा को ये खुद तय करना चाहिए कि उसे जीवन मे क्या बनना है। इसके बारे में माता पिता से खुलकर बात करनी चाहिए, मुझे भरोसा है कि हर अभिभावक अपने बच्चे को उसका सपना पूरा करने में मदद जरूर करते हैं।