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यहां से आया सूरज बड़जात्या की फिल्मों का हीरो 'प्रेम', बोले- अखबार की एक कटिंग ने दिया जीवनदान

Sat, 01 Feb 2020 10:30 AM IST
Avinash Pal रोहिताश सिंह परमार, मुंबई
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सलमान खान और सूरज बड़जात्या - फोटो : सोशल मीडिया
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सूरज बड़तात्या हिंदी सिनेमा में फिल्म निर्माण कंपनी राजश्री के मशाल वाहक हैं। भारतीयता से ओतप्रोत फिल्में बनाने वाले सूरज को लगता है कि समाज में बुजुर्गों की कहानियों पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया जा रहा है इसीलिए उन्होंने एक धारावाहिक 'दादी अम्मा दादी अम्मा मान जाओ' बनाया है। सलमान खान की अगली फिल्म से लेकर सिनेमा के बदलते रंग रूप पर सूरज बड़जात्या से ये खास मुलाकात की रोहिताश सिंह परमार ने।
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सूरज बड़जात्या - फोटो : अमर उजाला
राजश्री का पारिवारिक फिल्में बनाने का इतिहास रहा है, अब फिर वैसी ही फिल्में हिट हो रही हैं जिन्हें पूरा परिवार साथ में देखे। क्या राजश्री का मूल विचार ही इन फिल्मों की कामयाबी का मूल मंत्र है?
मैं बहुत खुश हूं कि वह दौर फिर से लौट आया है जिसमें पूरा परिवार साथ बैठकर फिल्म देख रहा है। मेरा मानना है कि फिल्म हो, टीवी हो या ओटीटी हो, सब परिवार पर ही आधारित हैं। आप कितना भी अकेले देख लो लेकिन जहां कहानी है, वहां बांट कर ही मजा आता है। राजश्री की फिल्में देखना एक पिकनिक मनाने जैसा होता है। मुझे बहुत खुशी होती है जब अमित शर्मा की 'बधाई हो', लव रंजन 'दे दे प्यार दे' या गौरी शिंदे हैलो जिंदगी इंग्लिश विंग्लिश बनाते हैं। फिल्म बनाना और देखना एक उपचार है। मैं अपनी कमियों के बावजूद 'बाला' की तरह पूर्ण हूं, ये किसी को शिक्षा देने से समझ में नहीं आएगा। 
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Salman and Sooraj Barjatya
'मैंने प्यार किया' से सलमान ने आपके साथ काम किया, 'प्रेम रतन धन पायो' तक एक अभिनेता और एक इंसान के तौर पर सलमान में आप क्या बदलाव देखते हैं?
हमें एक दूसरे को जानते हुए 32 साल बीत चुके हैं। एक इंसान के तौर पर उनमें एक प्रतिशत भी बदलाव नहीं आया। एसी में न बैठना, कुछ भी खा लेना, कहीं भी सो जाना, वही दिलदारी ये सब अब भी बरकरार है। लेकिन, एक अभिनेता के रूप में उनमें बहुत बदलाव आए हैं। अब वह बहुत सुलझे हुए हैं, काम पर केंद्रित रहते हैं।

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salman and sonam
आपकी फिल्मों की भाग्यश्री, माधुरी दीक्षित, सोनम कपूर जैसी अभिनेत्रियां भारतीय संस्कृति का एक उदाहरण रही हैं। समय को देखते हुए आपकी अगली फिल्म की अभिनेत्री में कितने बदलाव आएंगे?
थोड़ा सा बदलाव तो आएगा ही। लेकिन अभी कुछ भी कहना जल्दबाजी होगा। और बात रही भारतीयता की तो वह तो 100 प्रतिशत रहेगी ही क्योंकि यह हमारी पहचान है। मैं मानता हूं कि भारतीय नारी जितना खूबसूरत पूरी दुनिया में कोई नहीं है। 
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Salman and Sooraj Barjatya
आपकी फिल्मों में बड़े-बड़े परिवार होते हैं लेकिन अब छोटे परिवार को सुखी माना जाता है। ऐसे में परिवार को साथ लेकर कैसे चला जाए?
आज के दौर में साथ रहना तो बहुत मुश्किल है, लेकिन साथ का मतलब सिर्फ साथ रहना नहीं है, दिल साथ रहने चाहिए। ज्यादा कुछ नहीं तो सिर्फ हालचाल लेने के लिए फोन जरूर करते रहना चाहिए और हर त्यौहार साथ मिलकर मनाना चाहिए। आजकल जो मनमुटाव हो जाते हैं, वह नहीं होना चाहिए। यही आज का आदर्श संयुक्त परिवार माना जायेगा। 
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सलमान खान और सूरज बड़जात्या - फोटो : सोशल मीडिया
सिनेमा में पुरुषों का वर्चस्व टूट रहा है। मेहनताने में समानता से लेकर एक नायिका के लिए और क्या कुछ बदल रहा है?
धीरे-धीरे फिल्म में नायिकाओं के मेहनताने में बदलाव हो रहा हैं, क्योंकि अब हीरोइन की अपनी एक अलग पहचान होती है। मेरा मानना है आने वाले कुछ समय में ये स्टार सिस्टम खत्म हो जाएगा। फिल्म की सामग्री ही सबसे बड़ी सुपरस्टार होगी और अभिनेता भी ऐसा तलाशा जाएगा जो किरदार के साथ न्याय कर सके। अब विग लगाने का टाइम गया, अब हीरो को खुद ही दाढ़ी उगानी होती है, आज के दर्शक सभी चीजों पर ध्यान देते हैं।
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maine pyar kiya
आपकी फिल्मों में मुख्य किरदार का नाम हमेशा प्रेम होता है। इसकी शुरूआत कहां से हुई?
यह बहुत पुरानी बात है। जब हम फिल्म 'मैंने प्यार किया' की कहानी लिख रहे थे तो इस बात पर मंत्रणा चल रही थी कि हीरो का नाम क्या रखा जाए? उस समय हमारी सबसे बड़ी हिट फिल्म 'दुल्हन वही जो पिया मन भाए' थी। उस फिल्म के हीरो प्रेम किशन थे और फिल्म में भी उनका नाम प्रेम था। तो हमने सोचा कि क्यों न हम इस फिल्म में भी हीरो का नाम प्रेम रखें। तो ऐसे हमने हीरो का नाम प्रेम रखा जो बाद में भी चलता ही रहा। 

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main prem ki diwani hoon - फोटो : social media
आपके करियर में एक अखबार की क्या भूमिका रही है?
अखबार से ज्यादा कहानियां हमें कहीं नहीं मिलतीं। मेरी फिल्म विवाह की कहानी एक अखबार की कटिंग से ली गई। मेरी फिल्म 'मैं प्रेम की दीवानी हूं' कम चली तो मेरा आत्मविश्वास थोड़ा हिल गया था। मैं अपने पिताजी के पास गया और उनसे पूछा कि अब क्या बनाऊं? उन्होंने मुझे अखबार की एक कटिंग दी और फिर हमने उससे फिल्म 'विवाह' बनाई। उस पेपर की कटिंग आज भी मेरे पास सुरक्षित रखी हुई है क्योंकि इस अखबार की कटिंग ने ही मुझे बतौर निर्देशक जीवनदान दिया।

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सूरज बड़जात्या - फोटो : सोशल मीडिया
आजकल के बच्चे फेसबुक और इंस्टाग्राम के शौकीन हो गए हैं। 'दादी अम्मा दादी अम्मा मान जाओ' से वह खुद को कितना जोड़ पाएंगे?
मेरे पिताजी का सपना था कि 75 साल के बच्चों के लिए कुछ बनाया जाए क्योंकि ये बड़े तो हो जाते हैं, लेकिन बच्चों की तरह प्यार और दुलार चाहिए। टीवी पर इन बुजुर्ग बच्चों के लिए कुछ नहीं है। हमारे शो का उद्देश्य है कि दादा और दादी अपने पोते और पोतियों से बातचीत कर सकें और उससे भी जरूरी है कि नौजवान लोग इसे देखें और समझें कि उनके जीवन में सबसे बड़े परामर्शदाता दादा-दादी ही हैं। बच्चों और अभिभावकों में संवाद घट रहा है। अब माता पिता सिर्फ उनकी सफलता को लेकर बात करते हैं। बच्चा तनाव में आ जाता है कि कामयाब नहीं हुआ तो क्या होगा? पहले जब दादा दादी साथ होते थे तो बच्चा उनके पास बैठक कर खुद को ऊर्जावान महसूस करता था। ये धारावाहिक हमने एक साल की मेहनत से लिखा है और इसमें पूरे परिवार को साथ लेकर चलने की हमारी कोशिश है।
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