43 साल पहले एक फिल्म आती है 'शोले' और कामयाबी का इतिहास रच जाती है। जिसके एक-एक डायलॉग, एक-एक किरदार जेहन में बस जाते हैं। साल दर साल इन किरदारों का रंग गाढ़ा होता जाता है। न जय-वीरू का याराना भूलता है, न बसंती का अंदाज। चुप-चुप सी रहने वाली राधा भी मन में गहरे तक छाप छोड़ जाती है। मगर, यह भी बेहद दिलचस्प है कि इन किरदारों को जीवंत करने वाले पात्र जब सिनेमाई धरती से उतरकर सियासत के आंगन में पहुंचे तो वहां भी अलग छाप छोड़ी।