लिखना भले ही शैलेंद्र का शौक रहा हो लेकिन घर की बढ़ती जिम्मेदारियों को देखते हुए उन पर पैसे कमाने का भी दबाव बढ़ने लगा। जेल से छूटने के बाद उनके पिता ने उनसे काम धंधा करने के लिए कहा। जिसके बाद वो लिखना छोड़कर रेलवे की नौकरी करने लगे। पहले उनकी पोस्टिंग झांसी में हुई बाद में वो मुंबई पहुंचे। शैलेंद्र रेलवे में नौकरी भले ही कर रहे थे लेकिन उनका मन नहीं लग रहा था। उन्हें जैसे ही काम से खाली वक्त मिलता वो पेड़ के नीचे बैठकर कविताएं लिखने लगते थे। उनके दोस्त उनसे कहते थे 'काम करो काम, लिखने से घर नहीं चलेगा।'