हिंदी सिनेमा की गायिकी में जब जिक्र शब्बीर कुमार का आता है तो कहते हैं कि बस उनका नाम ही काफी है। 'कुली', 'बेताब', 'तेरी मेहरबानियां', 'प्यार झुकता नहीं' और 'मर्द' जैसी कई बड़े बजट की फिल्मों में एक से बढ़कर एक हिट गीत गाने वाले शब्बीर कुमार गुजरात से मुंबई आए। मोहम्मद रफी के गाए गाने आर्केस्ट्रा में सुनाकर लोगों का दिल बहलाते रहे और फिर एक दिन उन पर किस्मत ऐसी मेहरबान हुई कि फिर पीछे मुड़कर उन्होंने कभी नहीं देखा। 26 अक्टूबर 1954 को गुजरात के बड़ौदा (अब वडोदरा) में जन्मे शब्बीर कुमार से उनके जन्मदिन की पूर्व संध्या पर एक खास बातचीत।
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शब्बीर कुमार
- फोटो : अमर उजाला, मुंबई
क्या ये सच है कि गाना गाने से पहले आपका पेशा पेंटिंग था?
हां, मुझे फिल्मों में गाने का शौक कभी नहीं रहा। मैं तो पेंटिंग करता था। पेंटिंग करते समय रेडियो पर मोहम्मद रफी साहब के गाने सुनता था। मेरी उंगलियां उनका गाना सुनकर अपने आप चलने लगती थीं। रेडियो पर गाने सुनने -सुनते मुझे भी संगीत का शौक हो गया और दोस्तों की सलाह पर पर मैंने आर्केस्ट्रा में गाना शुरू कर दिया। मेरी आवाज को काफी पसंद किया गया। मैंने संगीत की कहीं से कोई तालीम नहीं ली है। मैं तो बस रेडियो पर रफी साहब, लता मंगेशकर और किशोर कुमार के गाने सुनकर गायक बन गया।
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शब्बीर कुमार, मोहम्मद रफी
- फोटो : अमर उजाला, मुंबई
ये भी किस्सा मशहूर है कि मोहम्मद रफी की कब्र में आपका पेन गिर गया था?
जब मोहम्मद रफी साहब का इंतकाल हुआ तो मैं बड़ौदा में था। मेरे पिता राजस्व विभाग में अधिकारी थे और बेहद ईमानदार अधिकारी थे। रफी साहब के निधन की खबर सुनकर मेरा बड़ा मन हुआ मुंबई आने का। मेरे बहनोई ने मुझे कुछ पैसे दिए। मैं जूनियर महमूद और जॉनी विस्की के साथ स्टेज शोज किया करता था। उन लोगों ने मुझे कब्र तक पहुंचने में मदद की। उनको उस वक्त दफन करने के लिए उतारा जा रहा था और न जाने कैसे रफी साब का पैर मेरे हाथ में आ गया। ठीक उसी वक्त पहली मेरी घड़ी टूटकर नीचे गिरी और फिर जेब से निकलकर कलम भी कब्र में गिर गया। शायद रफी साहब ने उसी कलम से मेरी तकदीर लिख दी।
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शब्बीर कुमार, उषा खन्ना
- फोटो : अमर उजाला, मुंबई
पहला मौका आप को कब मिला?
मुझे सबसे पहला मौका संगीतकार उषा खन्ना ने फिल्म 'तजुर्बा' में दिया। मैं 'एक शाम रफी के नाम' शो में गाने गाता था। वहां काम करने वाले एक साजिंदे ने मेरे बारे में उनको बताया। उषा जी बना बताए मेरे कार्यक्रम में मुझे सुनने आई और वहीं मुझे अपनी फिल्म में गाने का मौका दिया। यह फिल्म मुझे रफी साहब के गाए गाने की वजह से ही मिली और बाद धीरे-धीरे छोटी मोटी फिल्मों में मेरी गायकी का सफर शुरू हो गया।
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शब्बीर कुमार, मनमोहन देसाई
- फोटो : अमर उजाला, मुंबई
और, फिर आया सबसे बड़ा टर्निंग प्वाइंट यानी कि फिल्म 'कुली'...
'कुली' फिल्म के सभी गाने पहले रफी साहब ही गाने वाले थे। मनमोहन देसाई के दिल में रफी साहब के लिए बहुत इज्जत थी। वह उनको अपने पिता के समान मानते थे। वह अपने घर के मंदिर में भगवान की मूर्ति के पास रफी साहब की तस्वीर रखते थे। रफी साहब के इंतकाल के बाद वह 'कुली' के गानों के लिए रफी साहब जैसी आवाज वाले गायक की ही तलाश कर रहे थे।
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लक्ष्मीकांत प्यारेलाल के साथ शब्बीर कुमार
- फोटो : अमर उजाला, मुंबई
फिर आपकी एंट्री कैसे हुई?
संगीतकार लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल जी ने मेरे बारे में सुन रखा था कि गुजरात का कोई लड़का है जो रफी साहब की आवाज में गाता है। हालांकि, दोनों यही चाहते थे कि 'कुली' के सभी गाने किशोर कुमार गाएं। ये मनमोहन देसाई की जिद थी कि किसी नए गायक से गवाया जाए जो रफी साहब जैसा गाता हो। उन्होंने बहुत सारे गायकों के ऑडिशन लिए। मुझे भी बुलाया गया। मेरी आवाज को टेस्ट करने के लिए उन्होंने सबसे पहले कुली का गीत 'हज का महीना' गवाया था। मुझे लगा कि लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल जी दोबारा नहीं बुलाएंगे लेकिन वह गाना उनको पसंद आया और एक-एक करके सात गाने फिल्म के गवा लिए।
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शब्बीर कुमार, कुली
- फोटो : अमर उजाला, मुंबई
और, इस फिल्म के शीर्षक गीत की भी कुछ अद्भुत कहानी रही है, वह क्या है?
इस फिल्म का टाइटल सॉन्ग 'सारी दुनिया का बोझ हम उठाते हैं' लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल जी का मान रखकर मनमोहन देसाई ने किशोर कुमार से गवाने की इजाजत दे दी थी। किशोर कुमार जी ने फिल्म का टाइटल सॉन्ग गाया भी लेकिन उस समय उनकी आवाज थोड़ी थकी हुई थी। ये हुआ कि इसे दोबारा रिकॉर्ड नहीं किया जाएगा बल्कि सिर्फ किशोर कुमार को बुलाकर इसी संगीत पर उनकी आवाज डब कर ली जाएगी। लेकिन, इसके बाद उनको समय ही नहीं मिला और फिर मनमोहन देसाई के इसरार करने पर मुझे ही ये गाना भी गाना पड़ा जिसे बाद में फिल्म में शामिल किया गया।
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शब्बीर कुमार, मर्द
- फोटो : अमर उजाला, मुंबई
और, अमिताभ बच्चन पर फिल्माया गया कोई ऐसा गीत, जिसे लेकर आपको परेशानी हुई हो?
जब भी मैं कोई गीत रिकॉर्ड करता था तो उस गाने को घर ले जाता था और घर के लोग उसे एक साथ बैठकर सुनते थे। फिल्म 'मर्द' का गीत ‘बुरी नजर वाले तेरा मुंह काला’ मैं रिकॉर्डिंग के बाद घर नहीं ले गया। ऐसे ही बहाना बना दिया कि बस नहीं ला पाया। वजह ये थी कि इस गाने के बोल में ‘साला’ शब्द का इस्तेमाल हुआ है। वैसे तो बीवी के भाई को यही बोलते हैं, लेकिन हमारे यहां इसे गाली ही माना जाता है। और, ये गाना मैं सारे घरवालों के सामने बजाने की हिम्मत ही नहीं कर पाया। आप गाना सुनेंगे तो भी आपको लगेगा कि जब ये शब्द आता है तो मेरी आवाज सकुचा सी जाती है।
लता मंगेशकर और अन्य के साथ शब्बीर कुमार
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और, पहली बार लता मंगेशकर के साथ गाने का अनुभव कैसा रहा?
लता जी के साथ पहली बार फिल्म 'बेताब' में 'बादल यूं गरजता है' गाया। पंचम दा (आर डी बर्मन) बोले, लता जी आ रही हैं। तुम डरना नहीं। तू शेर है और शेर की तरह की दहाड़कर गाना। उनको क्या समझाता कि मेरी क्या हालत हो रही है? लताजी जब अपनी लाइन गाती थीं तो मैं सिर्फ उनकी ही लाइन सुनता था और अपनी लाइन गाना भूल जाता था। जिनकी आवाज अब तक रेडियो पर सुनता आ रहा था, उनकी आवाज साक्षात अपनी बगल से सुन रहा था। लता जी मेरी घबराहट समझ गई और उन्होंने पंचम दा से कहां कि पांच मिनट ब्रेक लेते हैं। उन्होंने चाय मंगवाई। मेरे बारे में पूछा। जब उनको लगा कि मेरी घबराहट दूर हो गई तब गाने की रिकॉर्डिंग की।