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EXCLUSIVE: सात मिनट में पढ़िए सौरभ शुक्ला के अभिनय के सारे गुरुमंत्र, एक एक कर किए सारे खुलासे

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सौरभ शुक्ला - फोटो : फाइल फोटो
सिनेमा में अभिनय के सिल्वर जुबली साल पार कर चुके सौरभ शुक्ल की पैदाइश भले गोरखपुर की हो, लेकिन सियासत उन्हें समझ नहीं आती। वह सिर्फ और सिर्फ सिनेमा समझते हैं, कैसे? समझा रहे हैं अमर उजाला के लिए पंकज शुक्ल के साथ हुई इस खास मुलाकात में।

आपको सिनेमा का शौक कैसे लगा?
सिनेमा का शौक हमें बचपन से ही लग गया। मेरा परिवार बड़ा विचित्र परिवार रहा है। पिता जी मेरे शत्रुघ्न शुक्ला आगरा घराने के मशहूर गायक और मां (जोगमाया शुक्ला) तो प्रथम तबला वादक थीं ही। दोनों को पिक्चर देखने का बड़ा शौक था। हम चार लोग, मैं, मेरा बड़ा भाई, मां और बाबा, हर संडे को सुबह मॉर्निंग शो में अंग्रेजी पिक्चर जरूर देखते थे। फिर घर आकर खाना वगैरह खाकर शाम को छह बजे एक हिंदी फिल्म का शो भी जरूर देखते थे। ये हमारा तय साप्ताहिक कार्यक्रम था, महीने में आठ फिल्में तो हम देखते ही देखते थे। मेरे कितने दोस्त थे जिन्होंने डेढ़-डेढ़ साल फिल्म नहीं देखी, जिनके पिताजी गर्व से कहते कि हमने 20 साल से पिक्चर नहीं देखी और देखने भी नहीं देते। लेकिन, हमारे घर में फिल्म का माहौल शुरू से रहा।
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सौरभ शुक्ला
आपने इतना सिनेमा देखा, आप खुद भी लेखक, निर्देशक हैं, आपको जब कोई किरदार मिलता है तो सिरा कहां से पकड़ते हैं?
मैं सबसे पहले पटकथा को लेकर चलता हूं। अपने जीवन से या आसपास के लोगों में उसका संदर्भ ढूंढता हूं। फिर जरूरत पड़ती है तो उसके दायरे से भी निकलकर पढ़ता हूं। उसकी पृष्ठभूमि देखता हूं। एक पटकथा में वे सारे सूत्र होते हैं जिनके आधार पर कोई कलाकार अपने किरदार की कल्पना कर सकता है। वही गीता है, वही बाइबल है। अपने आसपास के या जान पहचान के लोगों से भी कभी मदद मिल जाती है, जिनके साथ कभी ऐसा कुछ हुआ हो। हां, लेखक या निर्देशक होने का ये तो अंतर रहता है कि वह बाकी कलाकारों से अलग होता है। लेखक को अनुसंधान की आदत होती है। वह उसके पास एक अतिरिक्त गुण तो होता ही है।
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सौरभ शुक्ला
फिल्म ‘मैडम चीफ मिनिस्टर’ में जो याद रह जाने लायक किरदार हैं, उनमें से एक आपका भी गॉडफादर जैसा किरदार है मास्टरजी का। आप अपने निभाए किरदारों को यादगार बनाने के लिए अलग से क्या कुछ करते हैं?
इसको मैं अपनी खुशकिस्मती मानूंगा कि जिस तरह से मैंने चीजों को सोचा और जिस तरह से मैंने चीजों को निभाया, वह लोगों को पसंद आया। कहना चाहिए कि वह लोगों से जुड़ पाया। किसी भी किरदार को दर्शक जब पसंद करते हैं तो वह उस चरित्र में अपने जीवन की कुछ न कुछ छाप देखते हैं। अभिनय में सबसे पहले मैं अपने आप से जुड़ता हूं क्योंकि मैं भी एक आम इंसान हूं। मैं खुद से सवाल करता हूं कि क्या जनता इस किरदार को अपना सकेगी?

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सौरभ शुक्ला
ऐसा ही एक और किरदार मुझे याद आता है, जस्टिस सुंदरलाल त्रिपाठी...
ये कमाल की बात है कि मैं आज तक कोर्ट नहीं गया हूं। इस किरदार को निभाने में भी इस फिल्म के निर्देशक सुभाष कपूर काफी मददगार साबित हुए थे। उन्होंने अदालतों के बहुत सारे किस्से मुझे बताए थे। ‘जॉली एलएलबी’ से पहले हिंदी फिल्मों में जज को एक कार्डबोर्ड कैरेक्टर के तौर पर देखा जाता था, एक इंसान के तौर पर नहीं। लेकिन आखिर वह भी इंसान है। तो उसमें इंसानियत के सूत्र तलाशे गए कि सुंदरलाल त्रिपाठी रहता कहां होगा, तनख्वाह कितनी होगी? अमेरिका का जज तो है नहीं कि एक बंगला होगा और वहां एक उसका लैब्राडॉर होगा और चार पांच नौकर चाकर होंगे। नहीं, ऐसा जज वह है नहीं, वह तो आम जिंदगी जीने वाला जज है।
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सौरभ शुक्ला
निर्देशक अनुराग बासु का भी काफी लगाव रहा है आपसे। सुभाष कपूर और अनुराग दोनों अलग अलग तरीके के निर्देशक हैं, आपकी संगत कैसी रही उनके साथ?
बहुत अच्छी रही। अगर मैं सुभाष कपूर और अनुराग को देखूं तो दोनों की कार्यप्रणाली बहुत अलग है। अनुराग जिस तरह से फिल्में बनाते हैं, वह हमेशा कहानी में कुछ न कुछ खोजते रहते हैं। फिल्म बनाते वक्त भी ढूंढते रहते हैं, छोटी छोटी चीजें ढूंढते रहते हैं। सुभाष भी ये कहते हैं लेकिन सुभाष ये सब पहले खोजते हैं और फिर पटकथा लिखते हैं। पटकथा पूरी हो जाने के बाद वह ये दुनिया रचने निकलते हैं। अनुराग के साथ ऐसा होता है कि आप किसी यात्रा पर निकल तो गए लेकिन रुकना कहां है ये पता नहीं। रात फाइवस्टार होटल में भी हो सकती है और किसी ढाबे पर भी। उनके साथ यात्रा का एक अलग रोमांच है।
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सौरभ शुक्ला
और, रोमांच तो राजकुमार हीरानी की फिल्मों में भी बहुत होता है। वह हर बार आपको ज्योतिषी या भविष्यदृष्टा जैसा चरित्र ही क्यों देते हैं करने को?
संयोग कह सकते हैं इसे। ‘लगे रहो मुन्नाभाई‘ में तो मैं मेहमान भूमिका में हूं। हां, ‘पी के’ में तपस्वी महाराज का किरदार पूरी फिल्म में रहा। राजू अपने काम को लेकर बहुत सतर्क रहते हैं। कई कई साल वह अपनी पटकथा पर काम करते हैं। बहुत बारीकी से हर चीज की तैयारी करते हैं। थोड़ा बहुत कलाकारों को अपनी तरफ से जोड़ने की छूट रहती है, नहीं तो शूटिंग से पहले उनके पास सब तैयार होता है। राजू की मेकिंग सुभाष के काम करने के तरीके के करीब है। अनुराग बिल्कुल अतरंगे हैं। उनके साथ मेरा अनुभव वैसा ही रहा है जैसे मेरी पहली फिल्म बैंडिट क्वीन का रहा शेखर कपूर के साथ। बैंडिट क्वीन में बहुत सारी चीजें आवेग के साथ हो रही थीं।
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सौरभ शुक्ला
आप ‘बैंडिट क्वीन’ तक ले ही आएं हैं तो मुझे फिल्म ‘सत्या’ का कल्लू मामा भी याद आता है। किसी चरित्र को परदे पर पेश करने में उसकी वेश भूषा और उसके हाव भाव आदि तय करने में आपका योगदान कितना रहता है?
ये हाव भाव, वेश भूषा या बात करने का लहजा जो भी है ये सब भौतिक चीजें हैं जो बदलती रह सकती हैं। मैं किसी चरित्र पर काम करना शुरू करता हूं तो पहले तय करता हूं कि इस आदमी की सोच कैसी है? ये आंखों में आंखें डालकर बात कर सकने वाला शख्स है या नजरें चुराता है। हड़बडी में रहता है या शांत्तचित्त होकर सामने वाले की पूरी बात ध्यान से सुनता है और फिर उत्तर देता है। चलने का स्वभाव क्या  है, कप़ड़े पहनने के ढंग से भी चरित्र का पता चलता है, लेकिन रंगों का संयोजन भी सोच का ही हिस्सा है।

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Saurabh Shukla - फोटो : twitter
आपने तकरीबन सभी प्रमुख भारतीय भाषाओं के सिनेमा में अभिनय किया है। क्षेत्रीय भाषाओं में बंटा रहा भारतीय सिनेमा अब एक नया आकार ले रहा है, इसमें भाषाओं की सरहदें टूटने का कितना योगदान आप मानते हैं?
जीवन में ही अगर दूरियां हटेंगी तो जीवन बेहतर होता जाता है। एक जुमला सुनने में आता है, ग्लोबल सिटीजन है। उसका मतलब यही है कि आप दुनिया को समझ सकते हैं। दुनिया आपको समझ सकती है। तब, आपको समझ आता है कि दुनिया वैसी ही है जैसा मैं हूं। फिर क्या दूसरे का विरोध, और क्या दूसरों का प्यार! पहले आप कहते ये लोग ऐसे हैं फिर आपको समझ आता है कि आप भी तो किसी न किसी तरह के कैसे हैं! जीवन में अगर आपको विकसित होते रहना है तो भ्रमण करना बहुत आवश्यक है। नहीं तो आपको लगता रहता है कि साउथ इंडियन सांभर बहुत खाते हैं लेकिन आपने जाकर कभी देखा ही नहीं कि वे मीठा भी बहुत खाते हैं।
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Saurabh Shukla - फोटो : twitter
चलते चलते एक सवाल आपके लेखन व निर्देशन से, अरसे से आपके निर्देशन में कोई फिल्म नहीं आई, इसकी कोई खास वजह?
अभिनेता के तौर पर लोगों ने मुझे बहुत पसंद किया और मेरा बहुत समय बतौर अभिनेता ही काम करने में चला जाता है। फिल्म बनाते समय ऐसा होता है कि उस वक्त नौ दस महीने आप दूसरा कुछ नहीं कर सकते। इतना समय निकालना मेरे लिए मुश्किल हो जाता है। फिर फिल्म बनना अपने आप में एक टेढ़ी खीर तो है ही। इसके बावजूद मेरी लिखी और मेरी निर्देशित फिल्म जल्दी ही आप जरूर देखेंगे। जैसे ही मुझे इतना समय मिलेगा कि मैं अपने आप को एक फिल्म के लिए पूरी तरह से समर्पित कर पाऊं मैं जरूर ये करूंगा।

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