सिनेमा में अभिनय के सिल्वर जुबली साल पार कर चुके सौरभ शुक्ल की पैदाइश भले गोरखपुर की हो, लेकिन सियासत उन्हें समझ नहीं आती। वह सिर्फ और सिर्फ सिनेमा समझते हैं, कैसे? समझा रहे हैं अमर उजाला के लिए पंकज शुक्ल के साथ हुई इस खास मुलाकात में।
आपको सिनेमा का शौक कैसे लगा?
सिनेमा का शौक हमें बचपन से ही लग गया। मेरा परिवार बड़ा विचित्र परिवार रहा है। पिता जी मेरे शत्रुघ्न शुक्ला आगरा घराने के मशहूर गायक और मां (जोगमाया शुक्ला) तो प्रथम तबला वादक थीं ही। दोनों को पिक्चर देखने का बड़ा शौक था। हम चार लोग, मैं, मेरा बड़ा भाई, मां और बाबा, हर संडे को सुबह मॉर्निंग शो में अंग्रेजी पिक्चर जरूर देखते थे। फिर घर आकर खाना वगैरह खाकर शाम को छह बजे एक हिंदी फिल्म का शो भी जरूर देखते थे। ये हमारा तय साप्ताहिक कार्यक्रम था, महीने में आठ फिल्में तो हम देखते ही देखते थे। मेरे कितने दोस्त थे जिन्होंने डेढ़-डेढ़ साल फिल्म नहीं देखी, जिनके पिताजी गर्व से कहते कि हमने 20 साल से पिक्चर नहीं देखी और देखने भी नहीं देते। लेकिन, हमारे घर में फिल्म का माहौल शुरू से रहा।