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Satish Kaushik Old Interview: मैं कॉमेडियन कहे जाने पर आपत्ति जताता हूं, जब अमर उजाला से बोले सतीश कौशिक

Thu, 09 Mar 2023 09:43 AM IST
ज्योति राघव अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
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होली के जश्न में शामिल सतीश कौशिक - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
अभिनेता सतीश कौशिक का गुरुवार की सुबह सुबह एकाएक चले जाना हिंदी फिल्म जगत और उनके प्रशंसकों के लिए किसी सदमे की तरह रहा। सतीश कौशिक से यूं तो तमाम मुलाकातें और बातें हुई हैं और हर बार वह जब मिले तो हंसकर ही मिले। लोग उनको बेस्ट कॉमेडियन कहते तो वह बस मुस्कुराकर रह जाते। फिर कहते, ‘मैं अपने नाम के साथ जुड़े कॉमेडियन शब्द को बहुत ज्यादा गंभीरता से नहीं लेता। मुझे लगता है कि अभिनेता एक अभिनेता ही होता है। अगर वह कोई कॉमेडी का किरदार करता है तो उसको कॉमेडियन थोड़े ही कहेंगे। वह तो अभिनेता ही होता है।
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सतीश कौशिक - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
किरदारों की खूबसूरती ये है
सतीश कौशिक को हिंदी सिनेमा के वे दिन बहुत सुनहरे लगते जब कहानियों का फोकस सिर्फ हीरो या हीरोइन पर नहीं होता था। एक मुलाकात में उन्होंने कहा था, ‘हिंदी फिल्मों में 70, 80 और 90 के दशक में जो खांचे बने होते थे, उन्हें भरने का काम हम करते थे। उस हिसाब से मैं मानता हूं कि मेरे किए वह सभी अभिनेताओं के ही किरदार रहे, न कि कॉमेडियन के। मैंने फिल्मों में जितने भी कॉमिक किरदार किए हैं, वह हमेशा किरदारों से जुड़े रहे। चाहे वह मेरा कैलेंडर का किरदार हो, उसके हावभाव और पारिवारिक विशेषताओं के चलते वह पूरा एक किरदार था। वह सिर्फ हंसाने के लिए कुछ नहीं करता था। 'साजन चले ससुराल' का मुथुस्वामी, 'बड़े मियां छोटे मियां' का शराफत अली, 'हसीना मान जाएगी' में मेरा संवाद, ‘आइए तो सही, बैठिए तो सही’, यह सभी किरदार अभिनय से ही जुड़े रहे।’
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सतीश कौशिक-अमिताभ बच्चन - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
कॉमेडियन कहे जाने पर मुझे एतराज
कैलेंडर के अलावा सतीश कौशिक का दूसरा सबसे मशहूर किरदार रहा पप्पू पेजर का। इस बारे में एक बार चर्चा चलने पर उन्होंने कहा था, ‘मेरा जो पप्पू पेजर का किरदार है वह कोई कॉमेडियन का किरदार नहीं था। वह किरदार कुछ ही मिनटों का था लेकिन उसने पूरी फिल्म के बीच में दर्शकों पर एक प्रभाव छोड़ा। तो, वह भी पूरा एक किरदार ही था। इसलिए मैं अपने आपको कॉमेडियन कहलाने पर कड़ी आपत्ति जताता हूं। पुरानी फिल्मों में जो भी ह्यूमर के बादशाह हुआ करते थे, उनमें जॉनी वॉकर साहब, महमूद भाई जान थे। मेरे हिसाब से यह सबसे बड़े स्टारों में से एक थे। वह बड़े बड़े अभिनेताओं से ज्यादा फीस लेते थे। उसका कारण यह है कि वह दर्शकों से आसानी से मिलजुल जाते थे और उनके काम को देखकर दर्शकों को खुशी मिलती थी, आराम सा मिलता था। तो, उनको कॉमेडियन कहना गलत है। हीरो को तो कोई कॉमेडियन नहीं बोलता? अब अमिताभ बच्चन को कोई कॉमेडियन बोलेगा? बाद में भी जितने अभिनेताओं ने कॉमेडी करना शुरू कर दी। तो, क्या उन्हें कॉमेडियन कहना शुरू कर दिया गया? 

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सतीश कौशिक- महिमा चौधरी- जावेद अख्तर - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
मेरा ओहदा बाकियों से थोड़ा अलग रहा
सतीश कौशिक ने ‘अमर उजाला’ के साथ अपनी इस बातचीत में ये भी कहा था, ‘कॉमेडी किरदारों को करने वाले अभिनेता बहुत गंभीर होते हैं। मैंने भी अपने जितने किरदार किए हैं, वह गंभीरता से किए हैं। लेकिन, वह कॉमेडी वाले किरदार थे। मैं उन्हें कॉमेडी नहीं, बल्कि ह्यूमर कहूंगा। मैं हमेशा फूहड़ कॉमेडी से बचता रहा हूं। मेरे जैसा कलाकार जब मंच पर सेल्समैन रामलाल जैसा किरदार निभाता है और लोगों को रुलाता है तो मेरे लिए यह बहुत बड़ी बात है। कॉमेडी से मैं फिर भी काफी हद तक बचा रहा हूं क्योंकि मैंने 15-20 फिल्में निर्देशित भी की हैं। मेरा ओहदा बाकियों से थोड़ा अलग था। मेरे हिसाब से लोगों को हंसाना, उनकी जिंदगी में खुशियां भरना, उन्हें गुदगुदाना, बहुत मुश्किल काम है।’
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सतीश कौशिक - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
'स्कैम 1992' में निभाया निगेटिव किरदार
सतीश कौशिक को इस बात का भी गिला रहा कि हिंदी सिनेमा ने उन्हें एक खांचे में फिट कर दिया। उन्होंने कहा था, ‘कॉमेडी के मामले में आज का समय बहुत बदल गया है। फिल्मों में कॉमेडी बहुत ही प्राकृतिक चीज हो गई है। आजकल किरदारों में ही ह्यूमर होता है। हो सकता है कि आज के दर्शक जबरदस्ती पैदा की जाने वाली कॉमेडी को स्वीकारें भी नहीं। मैंने जब फिल्म 'सूरमा' में दिलजीत दोसांझ के पिता का किरदार निभाया, वह कॉमेडी किरदार नहीं था। उससे लोगों के दिल टूटे। या मैंने अभी 'स्कैम 1992' में ब्लैक कोबरा यानी मनु मानिक का किरदार निभाया है। वह एक नकारात्मक किरदार है। मैं जो भी किरदार करता हूं, वह एक अभिनेता के तौर पर ही करता हूं। वह किरदार कॉमेडी का हो सकता है लेकिन मैं कॉमेडियन नहीं हूं।’
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सतीश कौशिक - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
मैं महमूद भाईजान का फैन
कलाकारों में सतीश कौशिक महमूद के बहुत बड़े प्रशंसक रहे। उन्होंने कहा था, ‘मैं महमूद भाईजान का बहुत बड़ा फैन रहा हूं। जब मैंने फिल्म 'साजन चले ससुराल' की थी और उसमें एक दक्षिण भारतीय का किरदार निभाया तो मुझे लगा था कि मेरा सपना पूरा हो गया। महमूद भाईजान ने 'पड़ोसन' फिल्म में एक दक्षिण भारतीय किरदार निभाया था। वह फिल्म मैंने दिल्ली के सदर बाजार में वेस्टर्न थिएटर में देखी थी। उस तरह का किरदार निभाना मेरे लिए बहुत बड़ी चुनौती थी। जब मैं फिल्म करके महमूद भाई जान से मिला, तब मैंने उन्हें बताया कि मैं जिंदगी में जो करना चाहता था, वह मुझे करने मिल गया है, हो सकता है कि मैं उनके दो फीसदी भी न कर पाया हूं। लेकिन, उन्होंने कहा कि नहीं नहीं, तुमने बहुत अच्छा किया है। महमूद भाईजान की जो कॉमिक टाइमिंग थी, उनकी संवाद बोलने की जो अदा थी और वह जिस तरह दर्शकों के सामने शब्दों के साथ खेलते थे, वह कमाल था। कैमरे के सामने भी बहुत आरामदायक महसूस करते थे। उनसे डांस करवा लो, उनसे गाना गवा लो। उनकी 'कुंवारा बाप' फिल्म कोई भूल सकता है? क्या उसे देखकर उन्हें कोई कॉमेडियन कह सकता है? वह एक हीरो थे और कभी-कभी उन्हें हीरो से भी ज्यादा तवज्जो मिलती थी।
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सतीश कौशिक - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
डेविड धवन के साथ कीं 16 फिल्में
सतीश कौशिक का फिल्म निर्देशक डेविड धवन के साथ लंबा सफर चला। सतीश कौशिक बताते, ‘मैंने उनके साथ 16 फिल्में की हैं। डेविड अपने सभी चरित्र किरदारों को निभाने वाले को भी हीरो मानता था। चाहे वह कादर खान हों, सतीश कौशिक हों, अनुपम खेर हों, जॉनी लीवर हों, चाहे वह शक्ति कपूर हों। डेविड को लगता था कि यही किरदार हैं जो उनकी फिल्मों में सबसे ज्यादा ताकत भरते हैं। वैसे कहानी मुख्य तौर पर हीरो और हीरोइन की होती है लेकिन ये कलाकार ऐसे हैं जो दर्शकों में फिल्म देखने की रुचि पैदा करते हैं। ह्यूमर एक ऐसी चीज होती है जो छोटे से छोटे अनपढ़ गंवार आदमी के दिमाग में भी आराम से उतर जाती है। अगर हम उन्हें खुश करने में कामयाब रहे तो हमारी फिल्म भी कामयाब मानी जाती है। मैंने 'जाने भी दो यारो' जैसी फिल्म में काम किया है और उसके संवाद भी लिखे हैं। आप ऐसे ही अंदाजा लगा सकते हैं कि मेरा ह्यूमर से कितना पुराना नाता रहा है? और अब तो मुझे ऐसे किरदार ऑफर हो रहे हैं जो मैंने पहले कभी नहीं किए।’
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सलमान-सोहेल और अरबाज खान के साथ सतीश कौशिक - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
'गाइड' देखने पर हुई घर में पिटाई
और, सिनेमा से अपने शौक के बारे में भी वह बातें करते बहुत उत्तेजित हो जाते थे। उनका कहना था, ‘मैं शुरुआत से ही फिल्मों का महाशौकीन रहा। सिनेमाघर जाना, फिल्में देखना, मम्मी की गुल्लक और तकिए के नीचे से पैसे निकालकर ले जाना, 'गाइड' फिल्म देखना और फिर मार खाना। मैंने 'गाइड' फिल्म देखने के लिए मम्मी के तकिए के नीचे से पांच रुपये चुरा लिए थे। फिर जब मैं घर वापस आया और उन्हें पता चला कि मैंने ऐसा काम किया है तो फिर मेरी बहुत पिटाई हुई। लेकिन, मुझे लगता है मैंने उन पैसों से जो फिल्म 'गाइड' देखी उससे मेरी उस पिटाई की पूरी तरह से सिकाई भी हो गई। वह फिल्म मेरे दिमाग में छप गई और वहीं से एक निर्देशक बनने का मेरे दिमाग में बीज पैदा हो गया।’
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सतीश कौशिक - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
धरमजी दुनिया के एक संपूर्ण आदमी
महमूद के अलावा जिस दूसरे कलाकार को सतीश कौशिक बहुत चाहते रहे, वह हैं धर्मेंद्र। धर्मेंद्र के बारे में सतीश कौशिक का कहना था, ‘मैं धरम जी का भी बहुत बड़ा फैन था। मुझे लगता था कि वह दुनिया के एक संपूर्ण आदमी हैं। वह एक अच्छे पिता, एक अच्छे भाई, एक अच्छे दोस्त, एक अच्छे बेटे और एक अच्छे पति। सारी विशेषताएं उनके अंदर थीं। जब उनकी फिल्म 'फूल और पत्थर' आई थी तब हमने पहली बार देखा था कि किसी आदमी ने पर्दे पर शर्ट उतार कर सीन किया हो। जब वह मीना जी को उठाकर नाचते हैं। धरम जी को तो देख कर ऐसा लगता था जैसे यह हमारे घर के आदमी हैं। अभी कुछ होगा तो मदद करने चले आएंगे।’

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