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सोशल मीडिया पर 'डांसिंग स्टार' बने अंकल, जानिए कहां गए 'नंबर वन हीरो' गोविंदा

Sun, 03 Jun 2018 06:18 PM IST
बीबीसी, हिंदी
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संजीव श्रीवास्तव और गोविंदा
अभिनेता गोविंदा के गाने 'मय से न मीना से न साकी से' पर डांस करते वीडियो से भोपाल के एक प्रोफेसर साहब सोशल मीडिया स्टार हो गए हैं। 46 साल के इलेक्ट्रॉनिक्स के प्रोफेसर संजीव श्रीवास्तव असल जिंदगी में भी गोविंदा के फैन हैं।

ऐसे में मेरे मन में ख्याल आया कि कभी हीरो नंबर वन रहे गोवंदा अब आखिर हैं कहां? गोविंदा का जो गाना वायरल हुआ है वो 1987 में आई फिल्म 'खुदगर्ज' का है। राकेश रोशन पहली बार इस फिल्म में निर्देशन कर रहे थे। फिल्मों में नए-नए आए गोविंदा के लिए भी ये बहुत अहम फिल्म थी। उनकी फिल्म 'लव 86' एक साल पहले ही हिट हुई थी और गोविंदा अपने आप को जमाने में लगे थे।
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खुदगर्ज फिल्म का पोस्टर
'खुदगर्ज' हिट रही...
फिल्म के इस हिट गाने को याद करते हुए गोविंदा ने एक मजेदार किस्सा सुनाया था। उन्होंने बताया, "मैं अपने भांजे को लेकर वैष्णो देवी की चढ़ाई पर गया था। उसे सर पर बैठाया था। इसके बाद से मेरे पैर सूज गए थे।"

"फिल्म की शूटिंग एक दिन के लिए टालनी पड़ी लेकिन अगले दिन हमने शूटिंग की और सिर्फ छह घंटों में नीलम और मैंने ये गाना शूट किया जो सुपरहिट हुआ।" "मैं और नीलम ने कई स्टेज शो में भी इस पर परफॉर्म किया। मैं ये गाना सिर्फ राकेश रोशन के प्रति अपने सम्मान के चलते शूट किया था।"

फिल्म 'खुदगर्ज' हिंदी में हिट रही और बाकी भाषाओं में इसका रीमेक भी बना। तमिल में खुद रजनीकांत ने इसमें काम किया, तेलुगू में वेंकटेश ने और उड़िया में मिथुन ने।
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गोविंदा मां और भाई के साथ
गोविंदा का परिवार
बात गोविंदा की चली है तो उनके पिता थे अपने जमाने के एक्टर अरुण कुमार अहूजा और मां थी निर्मला देवी। अरुण कुमार ने 40 के दशक में कोई 30-40 फिल्मों में काम किया।

महबूब खान ने उन्हें अपनी फिल्म 'औरत' में मौका दिया था जो बाद में 'मदर इंडिया' के नाम से महबूब खान ने दोबारा बनाई। उनकी मां निर्मला देवी बनारस की रहने वाली बेहद उम्दा शास्त्रीय गायिका थीं जो अपनी ठुमरी के लिए जानी जाती थीं और कई फिल्मों में गाया भी लेकिन एक फिल्म के निर्माण में जबरदस्त घाटे के बाद गोविंदा के पिता को अपना बंगला छोड़ मुंबई में विरार आकर रहना पड़ा और यहीं से उन्हें विरार का छोकरा का नाम मिला। घर की हालत ज्यादा अच्छी न थी।

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'तन-बदन' से ब्रेक मिला...
गोविंदा कॉमर्स में ग्रेजुएट थे और नौकरी के लिए कई जगह गए और ताज में तो उन्हें नौकरी के लिए रिजेक्ट कर दिया गया। पर गोविंदा की किस्मत में तो हीरो बनना लिखा था। उन्हें 80 के दशक में पहले एलविन नाम की एक कंपनी का विज्ञापन मिला और जल्द ही 'तन-बदन' फिल्म में हीरो बनने का मौका। हीरोइन थी दक्षिण की खुशबू।

फिल्म 'लव 86' से जो उन्हें कामयाबी मिलनी शुरू हुई तो 90 का दशक आते-आते वो इंडस्ट्री में छा गए। 90 के दशक में तीनों खानों के अलावा अगर कोई था जो बॉक्स ऑफिस पर उनका मुकाबला कर रहा था तो वो गोविंदा थे।

कॉमिक टाइमिंग
एक समय था जब गोविंदा की साल में 8 से 9 फिल्मों तक रिलीज होती थी और पैसा भी कमाती थीं। उनकी कमाल की कॉमिक टाइमिंग, खास डायलॉग और पंच लाइन जो उनके लिए ही लिखे जाते थे, उनके रंग बिरंगे चटखदार कपड़े, कमाल का उनका डांस- ये सब काफी थे बॉक्स ऑफिस पर आग लगाने के लिए। 

न तो वे आमिर खान की तरह चॉकलेटी हीरो थे, न सलमान की तरह उनकी बॉडी थी, न शाहरुख की तरह रोमांटिक इमेज न अक्षय कुमार जैस एक्शन। फिर भी गोविंदा का अपना अलग स्वैग था या कहिए उस समय उनका अच्छा वक़्त चल रहा था।

उनकी कॉमिक टाइमिंग ऐसी थी कि जब 1998 में फ़िल्म 'बड़े मियाँ छोटे मियां' आई तो बहुतों को ऐसा लगा कि एकबारगी गोविंदा ने अमिताभ बच्चन तक को पछाड़ दिया है।
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कामयाब फ़िल्मों का सिलसिला...
वैसे 90 के दशक में फूहड़ता और डबल मीनिंग वाले गानों का आरोप भी उनपर लगा जिनपर आज के दौर पर अच्छा ख़ासा बवाल हो सकता है लेकिन ये गोविंदा ही थे जो बे सिर पैर वाले डायलॉग को भी अपनी ख़ासियत बना लेते थे -मसलन, "दुनिया मेरा घर है, बस स्टै़ंड मेरा अड्डा, जब मन करे आ जाना, राजू मेरा नाम है और प्यार से मुझे बुलाते हैं कुली नंबर वन।"

या फिर कादर ख़ान के साथ फिल्म 'दूल्हे राजा' में उनकी राजा भोज और गंगू तेली वाली बतकहियां। 'हीरो नंबर वन', 'हसीना मान जाएगी', 'दीवाना मस्ताना', 'कुली नंबर वन', 'साजन चले ससुराल', 'हद करदी आपने', 'शोला और शबनम'- वे 90 के दौर की हिट मशीन थे।

निर्देशक करते थे घंटों इंतजार
निजी ज़िंदगी की बात करें तो गोविंदा ने करियर के शुरुआती दिनों में ही सुनीता से लव मैरिज की। लेकिन एक साल तक उन्होंने इस शादी को छिपाए रखा क्योंकि उन्हें लगता था कि शायद इससे उनकी लोकप्रियता पर असर पड़ेगा। लेकिन ऐसा कुछ नहीं था।

वैसे गोविंदा अपनी लेट लतिफ़ी के लिए भी जाने जाते हैं और निर्देशक कई बार घंटों इतज़ार किया करते थे। 'पान सिंह तोमर' बनाने वाले तिग्मांशु धूलिया एक बार फ़िल्म शूटिंग के लिए लंदन आए हुए थे। उनसे मुलाक़ात हुई तो उन्होंने बताया कि वे गोविंदा के बड़ै फ़ैन हैं और वो एकमात्र स्टार हैं जिनके साथ काम करने के लिए वे उनके आगे पीछे घूमे।
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राजनीति में करियर
गोविंदा धीरे-धीरे 'हीरो ऑफ द मासिज़' यानी आम लोगों के हीरो बन गए। लेकिन उनकी ये ख़ासियत उनकी कमज़ोरी भी बन गई। डेविड धवन और पहलाज निहलानी जैसे निर्देशकों का साथ तो उन्हें मिला पर यश चोपड़ा, करण जौहर, सुभाष घई जैसे निर्देशकों के साथ वो कभी काम नहीं कर पाए। साल 2000 के बाद से जहां शाहरुख़, आमिर, सलमान, ऋतिक का सितारा बुंलद होने लगा, गोविंदा आज ख़ुद को रिइन्वेंट नहीं कर पाए और रेस में पिछड़ गए। 

साल 2004 में राजनीति में गए पर वहां भी 2008 तक आते आते मैदान छोड़ दिया। मणि रत्नम की रावण जैसी फ़िल्म भी उनके करियर को उबार नहीं सकी हालांकि उन्होंने स्वर्ग और हत्या जैसी फ़िल्मों में गंभीर रोल किए हैं और उनकी तारीफ़ भी हुई थी।

गोविंदा के गानों पर थिरकते लोग
कुछ लोगों को लगता है कि गोविंदा फ़िल्म इंडस्ट्री के अंडर 'रेडिट एक्टर' हैं जिनके हुनर का इस्तेमाल ठीक से नहीं हो पाया तो कुछ उन्हें सीमित अभिनेता मानते हैं। पिछले 10 सालों में उनकी कई फ़िल्में आईं और ग़ायब हो गईं।  

उनकी आख़िरी फ़िल्म आई थी पिछले साल- 'आ गया हीरो' जिसमें वे अपने पुराने रूप के आस पास भी नज़र नहीं आते। वैसे अगले महीने ही वो फ़िल्म 'फ्राई डे' में नज़र आएंगे। सुना है पहलाज निहलानी ने उन्हें विजय माल्या के रोल के लिए 'रंगीला राजा' में साइन किया है।

वैसे आज भी पार्टियों में उनके गानों पर लोग थिरकते मिल जाएंगे-चाहे 'अखियों से गोली मारे' हो या 'चलो इश्क़ लड़ाएं' हों। भोपाल के प्रोफ़ेसर का वायरल वीडियो इसकी एक मिसाल है और इन दिनों की यादगार भी जब गोविंदा वाकई हीरो नंबर वन हुआ करते थे।
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