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Sameer Anjaan: 30-40 गाने सुनने के बाद संगीतकार ने फेंक दी डायरी, उषा खन्ना ने इस गाने से दिया पहला ब्रेक

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सीएम योगी आदित्यनाथ, समीर - फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई
बनारस के शीतला पांडे को आप जानते हैं? नहीं जानते? लालजी पांडे को तो जानते होंगे। इनको भी नहीं जानते तो खैर कोई बात नहीं। जानेंगे भी कैसे, दोनों ने अपने असली नाम से लोगों को कम ही सलाम किया। उनके दुनिया तक जो गीतों के जरिये पैगाम पहुंचे, वे पहुंचा दोनों के फिल्मी नामों के माध्यम से। जी हां, लालजी पांडे यानी अनजान जिनका हिंदी सिनेमा के चोटी के गीतकारों में नाम रहा है और शीतला पांडे यानी समीर जिन्होंने अपने चार दशक के करियर में इतने गाने लिख डाले कि उनकी नाम गिनीज बुक ऑफ रिकॉर्ड्स में दर्ज हो चुका है। अपने जन्मदिन पर उन्होंने ‘अमर उजाला’ से इस खास मुलाकात के लिए कुछ समय निकाला और अपने बनारस से मुंबई आने, मुंबई में बार बार बेइज्जत होने और फिर इसी मुंबई शहर का एक सफल गीतकार बनकर दिखाने की जो दास्तां सुनाई, वह भावुक कर देने वाली है। आप भी पढ़िए..
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समीर - फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई
समीर जी, पहली बार कब लगा कि आपकी रुचि काव्य में हो रही है?
मैं छठवीं या सातवीं कक्षा में आया तो कुछ कुछ लिखकर दोस्तों को सुनाता रहता। वे तारीफ करते तो मेरा भी हौसला बनता। स्कूल खत्म करके कॉलेज में आया तो वहां पहली बार हमारी मंडली बनी। फिर, हमने एक संस्था बना ली और शनिवार, रविवार को छुट्टी में गोष्ठियां करनी शुरू की। इसके बाद कवि सम्मेलनों, मुशायरों की बारी आई। आकाशवाणी और दूरदर्शन पर भी मौका मिलने लगा।
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समीर - फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई
मतलब, गीतकार बनने की राह आपने कॉलेज के दिनों में ही पकड़ ली?
बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से मैंने बीकॉम किया है। पिताजी की मंशा थी कि मैं कुछ भी बनूं लेकिन गीतकार न बनूं। शायद इसलिए उन्होंने मुझे साहित्य न पढ़ाकर कॉमर्स पढ़ाया। बीकॉम के बाद मैंने एम कॉम किया। दादा शिवनाथ प्रसाद जी बैंक में नौकरी करते थे और रामलीला के बहुत बड़े कलाकार थे। रामायण का ऐसा कोई पात्र नहीं जिसे उन्होंने न निभाया हो। कला हमारे परिवार की रगों में हैं। हमारे परदादा राजाराम शास्त्री बहुत बड़े ज्ञाता थे। महाराजा बनारस ने उनके शास्त्र ज्ञान से खुश होकर उन्हें 52 बीघा जमीन दान दी तो हमारे पुरखे गोरखपुर छोड़कर वाराणसी आ गए थे।

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समीर अपने पिता अनजान के साथ - फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई
जब पिताजी आपके गीतकार बनने के खिलाफ थे तो आप मुंबई कैसे आ गए?
पहले तो मैं बता दूं कि मेरे पिताजी भी मुंबई आना नहीं चाहते थे। लेकिन, वह बीमार पड़े तो बताया गया कि समंदर किनारे की हवा उनकी संजीवनी बन सकती है। इधर, एमकॉम करने के बाद दादाजी की प्रतिष्ठा के चलते मुझे सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया में नौकरी मिल गई। कहां मैं मुशायरों और कवि सम्मेलनों में मिलने वाली तालियों से प्राणवायु पाने वाला और कहां ये बैंक की नौकरी? बस, दो दिन में ही बैंक की नौकरी से इस्तीफा दे दिया। मां से 500 रुपये लेकर काशी एक्सप्रेस में बैठा और 6 अप्रैल 1980 को मुंबई की धरती को प्रणाम करने यहां आ गया।
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समीर - फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई
और, सीधे अपने पिताजी से मिलने गए होंगे? 
नहीं, पिताजी से मिलने की हिम्मत ही नहीं थी। उनको तो मेरे गीतकार बनने पर ही एतराज था। मैं मलाड पश्चिम में मालवनी की एक चाल में रहने लगा। उन दिनों की यादें मुझे अब भी अंदर तक सिहरा देती हैं। अच्छे घर परिवार में पला बढ़ा। कभी किसी चीज की तकलीफ नहीं। यहां न खाना ठीक से मिल रहा था और न रहने को। यकीन करेंगे आप कि मैंने इस शहर में सुबह सुबह हाथ में डिब्बा लेकर शौच के लिए भी लाइन लगाई है।
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समीर व उनके पिता अनजान - फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई
अरे, फिर पिताजी को कब पता चला कि उनका होनहार पुत्र मुंबई में है? 
मां ने उनको चिट्ठी लिखकर बता दिया। पिताजी ने एक रिश्तेदार को भेजकर मुझे बुलवाया। उनको भी लगा कि लड़का जिद्दी है मानेगा नहीं तो उन्होंने कहा कि इस शहर को समझना जरूरी है। उन्होंने ढेर सारे गुरुमंत्र दिए जो मेरे काम अब भी आते हैं। वह उम्र ऐसी होती है जब अक्सर बाप-बेटे की बनती नहीं है। लेकिन, बाद में समझ आता है कि पिता हमेशा अपने बेटे को जमाने की तकलीफों से बचाने को ऐसा करते हैं। जब मुझे थोड़ी बहुत दुनियादारी आ गई तो उन्होंने मुझे आजाद कर दिया। पहले पहल मैंने संगीतकार चित्रगुप्त (संगीतकार आनंद- मिलिंद के पिता) का सानिध्य पाया। उनके लिए भोजपुरी के 117 गाने लिखे। उसी दौरान आनंद और मिलिंद से दोस्ती हुई। हम सब मिलते और गाने बना बनाकर जमा करते जाते। संयोग से उनको इसी दौरान 'कयामत से कयामत तक' मिल गई। फिल्म सुपरहिट हुई।
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आनंद मिलिंद और लता मंगेशकर के साथ समीर - फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई
आनंद, मिलिंद से इतनी गहरी दोस्ती और अपनी पहली फिल्म 'कयामत से कयामत तक' में उन्होंने आप पर दांव नहीं लगाया, ये क्या बात हुई?
मैं बताता हूं। 'कयामत से कयामत तक' उन दिनों के मशहूर निर्माता नासिर खान के बेटे मंसूर खान ने बनाई। उनका जिस शॉर्ट फिल्म से टेस्ट लिया गया, उस वीडियो फिल्म 'अनबर्टो' में मैंने भी दो गाने लिखे थे। 'कयामत से कयामत तक' के लिए मंसूर खान को ग्रीन सिग्नल मिला तो कहानी वगैरह तय होने के बाद संगीत की बात आई। नासिर साहब ने तब आर डी बर्मन और मजरूह सुल्तानपुरी के नाम आगे कर दिए। मंसूर को अपनी टीम में युवा लोग चाहिए थे। तो बीच का रास्ता ये निकला कि संगीतकार और गीतकार में एक मंसूर की पसंद का होगा और एक नासिर साब का। मंसूर ने संगीतकार चुने और गीतकार के तौर पर मजरूह सुल्तानपुरी आ गए। और, ये फिल्म के लिए बहुत सही हुआ। मजरूह साब ने उस फिल्म में युवाओं को ध्यान में रखते हुए कमाल गाने लिखे हैं।

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समीर-नदीम-श्रवण - फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई
और, फिर आई आमिर खान, माधुरी दीक्षित स्टारर ‘दिल’ की बारी..
कम लोगों को ही पता होगा कि फिल्म 'दिल' में पहले नदीम-श्रवण संगीतकार थे। 'कयामत से कयामत तक' हिट हुई तो आमिर खान ने आनंद-मिलिंद को फिल्म में लेने की शर्त रख दी। आमिर खान ने दोनों को मिलने के लिए महबूब स्टूडियो बुलाया। मैं भी साथ चला गया। वहां फिल्म निर्देशक इंद्र कुमार और निर्माता अशोक ठकेरिया आए हुए थे। बातों के बीच आनंद ने बतौर गीतकार मेरा परिचय कराया। सबने मेरे गाने सुने, उन्हें अच्छे लगे और बस 'दिल' से शुरुआत हो गई। फिल्म सुपरहिट हुई तो मैं भी सुपरहिट हो गया। उसके बाद तो उस दौर की 90 प्रतिशत फिल्में मेरे ही पास आने लगीं। 

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समीर-उदित नारायण - फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई
अच्छा, ये बताइए कि आपका लिखा वह पहला गाना कौन सा है जिसे किसी संगीतकार ने संगीतबद्ध किया?
मैं नाम नहीं लेना चाहता लेकिन उन दिनों के एक संगीतकार के यहां मेरा अक्सर आना जाना लगा रहता था। पिताजी के अच्छे दोस्त भी थे। डी एन नगर में रहते थे, एक दिन मैं उनके यहां अपनी डायरी लेकर चला गया। मैंने उसको तीस चालीस गाने सुनाए। उन्होंने गाने सुनने के बाद बहुत खरी खोटी सुनाई और मेरी डायरी तीसरे मंजिल से नीचे फेंक दी। मेरे तो पैरों के नीचे से जमीन खिसक गई। मैंने डायरी उठाई और वहीं सामने से बस पकड़कर संगीतकार उषा खन्ना के यहां चला गया। बहुत दुखी मन से उन्हें सारी बात बताई। उनको मैंने उस दिन सिर्फ चार गाने सुनाए और उन्होंने उसमें से दो गाने तुरंत ओके कर दिए। इस तरह से मुझे पहली फिल्म मिली, 'बेखबर'। गाना था, 'गोरी परेशान है, काली परेशान है..’।

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समीर-अमिताभ बच्चन - फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई
अच्छा आपके पहले ब्रेक की तो बात हो गई, ये जानने में भी आपके तमाम प्रशंसकों को दिलचस्पी होगी कि आपको कब समझ आया कि आपके पिताजी इतने बड़े गीतकार हैं?
जहां तक मुझे याद है मैंने पिताजी का लिखा जो पहला गाना सुना था वह था फिल्म 'नमस्ते जी' का गाना। फिर और गानों में पिताजी का नाम आने लगा लेकिन फिल्म 'बंधन' का गीत 'बिना बदरा के बिजुरिया कैसे चमके' ऐसा हिट हुआ कि मुझे भी अपने पिताजी की शोहरत समझ आने लगी। कुछ और फिल्मों के भी उनके गाने हिट होते रहे लेकिन अमिताभ बच्चन स्टारर फिल्म 'डॉन' ने एकदम से उनकी पोजीशन फिल्म जगत में बदल दी।

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समीर, ऋषि कपूर - फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई
तो अनजान का बेटा होने का आपको फायदा मिला हिंदी फिल्म जगत में?
पिताजी का नाम मेरे लिए वरदान और अभिशाप दोनों रहा। वरदान इसलिए रहा कि लोगों ने मुझे इज्जत दी। अभिशाप इसलिए कि लोग मेरी तुलना पिताजी से करने लगे। जैसा अभिषेक बच्चन और कुमार गौरव के साथ होता रहा। पिताजी ने एक बार मुझे लक्ष्मीकांत प्यारेलाल से मिलवाया। दोनों बहुत साफ दिल इंसान थे, बोले, ‘अनजान जी मुझसे तो कह दिया। किसी और से मत कहिएगा। एक बात याद रखिए बाप की दुकान बाप की होती है और बेटे की दुकान बेटे की होती है। अगर इसके अंदर माद्दा है तो मुझे मुखड़ा सुनाकर इंप्रेस करे।’ उसके बाद मैं चार साल लगातार उनके पास जाता रहा। लिखता रहा, सुनाता रहा। और, एक दिन वह मौका आ ही गया जब उन्होंने मुझे पहली बार फिल्म 'लव 86' में एक गाना लिखने का मौका दिया। मेरा मानना है कि जीवन की लड़ाइयां तो खुद ही लड़नी पड़ती हैं।

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समीर-अल्का याग्निक, अनु मलिक, हिमेश रेशमिया - फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई
पिताजी के अलावा भी किसी दूसरे गीतकार के मुरीद रहे आप?
मैं मजरूह सुल्तानपुरी और आनंद बख्शी का मुरीद रहा हूं। आसान शब्दों में बड़ी बात कैसे कही जाती है, मैंने इन दोनों से ही सीखा। इन लोगों के साथ बैठने और सीखने का मौका मिला, इसे मैं अपना सौभाग्य मानता हूं। जिस वक्त मैं आया, उस वक्त तमाम दिग्गज गीतकार सक्रिय थे। इन लोगों के बीच ही मुझे अपनी जगह बनानी थी। मैं संगीतकारों से मिलता था तो किसी को यकीन ही नहीं होता कि मैं लिख भी सकता हूं। मेरी कद काठी ही भगवान ने ऐसी बनाई कि लोगों को बच्चा सा दिखता था। लेकिन, मैंने हिम्मत नहीं हारी और फिर धीरे धीरे बात बनती गई। मैंने संगीतकारों की चार पीढ़ियों के साथ काम किया है। मेरी पीढ़ी के संगीतकार आए तो मेरा रास्ता कुछ आसान हुआ।

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समीर सीएम योगी के साथ - फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई
कभी किसी गाने पर कोई ऐसी बधाई मिली हो जो जीवन भर की यादगार बन गई?
मेरे समय के तो सारे सितारे रिकॉर्डिंग के समय ही गाने सुनकर खुश हो जाते थे और वहीं गले लगा लेते थे। राहुल रॉय तो 'आशिकी' के गाने स्टूडियो में ही सुन सुनकर पागल हो जाता था। एक किस्सा दिलचस्प है। मुझे जब दूसरा फिल्मफेयर पुरस्कार मिला तो गलती से मजरूह सुल्तानपुरी साहब मंच पर चले गए। पुरस्कार मुझे मिला था और मैं भी मंच पर पहुंचा। तो मैंने तुरंत मामला संभाला। मैंने कहा कि पहला फिल्मफेयर पुरस्कार मुझे अपने पिताजी के हाथों मिला था और तब मैंने कसम खाई थी कि दूसरा पुरस्कार जिन्हे मैं अपना गुरु मानता हूं, उनसे लूंगा। सौभाग्य देखिए कि आज मजरूह सुल्तानपुरी मंच पर हैं। इसके बाद वह पुरस्कार मैंने उनके हाथों लिया। सुनील दत्त साहब ने तब मुझे चिट्ठी भेजकर इसकी तारीफ की और लिखा कि तुमने अपने एक सीनियर की इज्जत रखी और अनजान साहब का नाम रोशन किया। 
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समीर अनजान - फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई
हिंदी सिनेमा के नामचीन गीतकारों की अगली पीढ़ी में शीर्षस्थ गीतकार बनने का खिताब आपके सिर सजा। असद भोपाली, मजरूह सुल्तानपुरी जैसे दूसरे गीतकारों के बेटों ने भी तो कोशिश की। क्या लगता है आपको कि गीतकारों की अगली पीढ़ी के बच्चे कायमाब गीतकार क्यों नहीं बन पाते हैं?  
इसकी बहुत सारी वजहें हो सकती है। अमिताभ बच्चन ने एक बार मुझे समझाया था कि सिर्फ आप अच्छा लिखते हैं, यह इस बात की गारंटी नहीं है कि आप सुपरहिट गीतकार हैं। आपका पढ़ा लिखा और अच्छा होना बहुत जरूरी है। आपको अच्छा दिखना भी बहुत जरूरी है। आप का व्यवहार अच्छा होना बहुत जरूरी है। आप की बुद्धि तीक्ष्ण होनी चाहिए और सबसे बड़ी बात आपके अंदर सफलता को पचाने की ताकत होनी चाहिए। अक्सर लोग दो गाने हिट हो जाने के बाद पागल हो जाते हैं। उन्होंने मुझे कामयाबी के 10 मंत्र दिए थे। ऐसे बहुत से गीतकार हैं जिनके सामने मैं खड़ा भी नहीं हो सकता था। लेकिन, उनको खराब आदतें लग गईं और उनकी इन खराब हरकतों ने उन्हें डुबो दिया।
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