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सैयामी खेर ने क्यों कहा, बहुत कम वफादार होते हैं शहर के युवा

Thu, 15 Sep 2016 07:46 PM IST
अमित कर्ण/अमर उजाला, मुंबई
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सैयामी खेर
'मिर्जिया' से दो स्टार संतान बॉलीवुड में दस्तक दे रहे हैं। एक अनिल कपूर के बेटे हर्षवर्द्धन कपूर। दूसरी गुजरे जमाने की अदाकारा उषा किरण की पोती सैयामी खेर। तन्वी आजमी उनकी बुआ और शबाना आजमी मौसी हैं। सैयामी के पिता भी मॉडल और उनकी मां पूर्व मिस इंडिया रह चुकी हैं, मगर उन्होंने सैयामी को ग्लैमर की चकाचौंध से दूर रखने का फैसला किया। लिहाजा वे मुंबई की बजाय नासिक में रहे। सैयामी महाराष्ट्र के लिए स्टेट लेवल पर बैडमिंटन खेल चुकी हैं। फिर सैयामी कैसे ग्लैमर जगत में आईं, पढिए उनकी जुबानी। 

आगे पढ़ें नौ महीने लगे सैयामी से साहिबां बनने में 
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सैयामी खेर ने क्यों कहा, बहुत कम वफादार होते हैं शहर के युवा

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सैयामी खेर और हर्षवर्धन कपूर
नौ महीने लगे सैयामी से साहिबां बनने में 
' मिर्जिया' में कास्टिंग होने के बाद भी मेरा सफर लंबा रहा। मुझे नौ महीने लगे सैयामी से साहिबां बनने में। दिल्ली में दिलीप शंकर जी के यहां तीन महीने एक्टिंग वर्कशॉप की। वह मेरे लिए बहुत बड़ा अनुभव था। मेरी क्रिएटिविटी यानी रचनात्मकता में काफी इजाफा हुआ। मैं सोच के स्तर पर बहुत अमीर हुई, इसलिए भी यह फिल्म मेरे लिए बहुत स्पेशल है।

चार महीने की वर्कशॉप खत्म कर मैं मुंबई आई तो दो-तीन और स्क्रीन टेस्ट बचे हुए थे। तब तक यह तय नहीं हुआ था कि मैं फिल्म में हूं कि नहीं, क्योंकि दिल्ली वाली वर्कशॉप में मेरे साथ एक और लड़की थी। बहरहाल मैंने मुंबई में राकेश ओमप्रकाश मेहरा सर से कहा कि अगर मैं फिल्म के लिए फाइनल होती हूं ठीक, वरना कोई बात नहीं।
वह इसलिए कि वर्कशॉप से मुझे काफी कुछ सीखने को मिला है। उसके लिए मैं सबों की आभारी रहूंगी। 

अागे पढ़ें : किसने दिए सैयामी को एक्टिंग के टिप्स
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सैयामी खेर ने क्यों कहा, बहुत कम वफादार होते हैं शहर के युवा

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शबाना आजमी और सैयामी खेर
शबाना मासी से मिले टिप्स 
इश्क के तो तीन गवाह हैं। मेरी मेहनत का एक गवाह रब तो है ही। मैंने अपना सफर शुरू करने के लिए लंबा सफर तय किया है। मिर्जिया से दो साल पहले तक मैं स्ट्रगलिंग एक्टर थी। आरामनगर इलाके में लाइन में लगकर ऑडिशन दिया करती थी। खार से रोजाना अंधेरी इलाके के प्रॉडक्शन हाउस के चक्कर लगाती थी। ढेर सारी ऑडिशन के बाद मुझे साउथ की एक फिल्म मिली। वहां मेरी ऑन द जॉब ट्रेनिंग हुई।

वह टिपिकल साउथ फिल्म थी, जिसमें अदाकारा महज शो पीस के तौर पर होती हैं। उसका फायदा यह हुआ कि मेरी हिचक टूट गई। शबाना मासी ने मुझे सलाह दी थी कि साउथ की फिल्में भी करो। वे कैमरे के सामने आप की सारी हिचक दूर कर देती हैं। बहरहाल उसके बाद एकाध हिंदी फिल्मों के ऑडिशन हुए, मगर बात नहीं बनी। किस्मत शायद मेरे लिए कुछ और ही चीज प्लान कर रही थी। वे मेरी पारी का आगाज ' मिर्जिया' से ही करवाना चाहते थे। 

आगे पढ़ें : किसकी फैन हैंं सैयामी खेर 

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गुलजार
गुलजार साहब के थे दस्तख्त
''राकेश सर वैसे तो बड़े गंभीर इंसान हैं, मगर उतने शरारती भी हैं। उन्होंने वर्कशॉप से लेकर मुंबई प्रवास तक मुझे नहीं बताया कि मैं ही फिल्म में हूं। बल्कि यह कहकर डराते भी रहे कि अगर मेरा सेलेक्शन नहीं हुआ तो भी मैं उसे दिल पर न लूं, क्योंकि एक्टिंग से लेकर घुड़सवारी आदि सीखने को जो मिला। मुझ जैसी मासूम, उनकी बातों पर यकीन करती रही।

आखिरकार जब उन्होंने मुझे पहली बार स्क्रिप्ट पेपर दिया तो मैं भौंचक्की रह गई। पेपर की आखिर में बहुत बड़ा नाम लिखा हुआ था। खुद गुलजार साहब का। उनकी कविताओं की तो मैं फैन हूं। ''

आगे :  रिलीज से पहले जानें मिर्ज्या की कहानी सैयामी की जुबानी 
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सैयामी खेर ने क्यों कहा, बहुत कम वफादार होते हैं शहर के युवा

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सैयामी खेर
-दो फिल्में कर ली मैंने मिर्जिया में 
मिर्जिया की कहानी अतीत और वर्तमान के चक्कर काटती रहती है। आज के जमाने मे सुचि की कहानी चल रही है। अतीत में समान पलों पर ही साहिबान की भी किस्सागोई चल रही है। दर्शक इसे पुनर्जन्म का मामला न मानें। सुचि और साहिबान अलग शख्सियत हैं। हां, अतीत दोनों को एक धागे में पिरोए हुए है। सुचि राजस्थान में है। आजाद ख्याल वाली है। बड़ी हिम्मती है। टिपिकल छुई-मुई लड़की नहीं है।

साहिबान राजसी ठाठ में पली-बढी लड़की है। मजबूत कद-काठी है उसकी। कंधे चौड़े हैं उसके। विशालकाय प्रतीत होती है तो साहिबान जैसी दिखने के लिए मुझे चार महीने लगे। मसल्स मजबूत किए। दोस्त तो मुझे पहलवान पुकारने लगे थे। पहले सुचि वाले किरदार की शूटिंग हुई। उसके चार महीने बाद साहिबान की। ऐसा लगा कि हमने दो अलग फिल्में शूट कर लीं। बहरहाल दोनों दौर में मेरे किरदार का प्रेम त्रिकोण है। 

आगे : गुलजार के लिए क्या हैं सैयामी 
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गुलजार
गुलजार साहब से मिली तारीफ
''फिल्म की शूटिंग के दो सालों के दरम्यान उनसे कभी मिलने का मौका नहीं मिला। दो हफ्ते पहले उनसे मुलाकात हुई। गीतकार स्वानंद किरकिरे ने उनके ऊपर एक प्ले किया था। वह भी गुलजार साहब ने ही लिखा था। प्ले के बाद मैं जाकर गुलजार साहब से मिली।

मैंने अभी तक तैयार फिल्म नहीं देखी है, मगर गुलजार साहब पांच-छह बार पूरी मिर्जिया देख चुके हैं। लिहाजा मुझे देखते ही वे स्वानंद से कहने लगे, यह मेरी सुचि है। स्वानंद उनसे कहते कि नहीं यह सैयामी है। गुलजार साहब अपनी बातों पर अड़े रहे कि नहीं यह मेरी सुचि है। यह मेरे लिए बहुत बड़ा कौंप्लिमेंट था, क्योंकि मेरी मेहनत को खुद गुलजार साहब ने अप्रूव किया।''

आगे पढ़ें : सैयामी ने क्यों कहा वफादार नहीं होते शहरी युवा ऍ
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सचिन तेंदुलकर
-शहरी युवाओं में है कम वफादारी
मैं महाराष्ट्र के चिपनुई, बुलढाना जैसे दूर-दराज के इलाकों में ट्रेकिंग भी करती रही हूं। इस तरह मेरा वास्ता ग्रामीण व छोटे शहर के युवाओं से हुआ। मुंबई के पॉश इलाकों के युवाओं से तो है ही। शहरी और कथित एलीट क्लास के युवाओं में मैंने वफादारी में कमी महसूस की है। रिश्तों को लेकर उनकी नीयत में खोट होती है। छोटे शहरों के युवा आज भी रिश्तों को सबसे ज्यादा अहमियत देते हैं।

हरी युवाओं को सचिन तेंदुलकर से प्रेरणा लेनी चाहिए। उन्होंने व उनकी पत्नी ने अपने प्यार के लिए जो कुछ कुर्बान किया, वह बड़ी बात है। दोनों ने अलग-अलग पड़ाव पर परिवार के लिए अपना सब कुछ न्यौछावर कर दिया। दूर रहकर भी एक-दूसरे के प्रति वफादार रहे। तभी मैं सचिन को बहुत मानती हूं। उनकी कोई बुराई करे तो मैं उससे झगड़ पड़ती हूं। राकेश सर भी मुझे कभी-कभी चिढ़ाने को सचिन की बुराई करते तो मैं उससे भी लड़ पड़ती थी। 

आगे  : हर्षवर्धन की एक बुरी आदत के बारे में बता रहीं हैं सैयामी 

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हर्षवर्धन कपूर
गैजेट्स में घुसे रहते हैं हर्षवर्द्धन
हर्षवर्द्धन कपूर के साथ काम करने का अनुभव कमाल का रहा। उनकी मुस्कुराहट कमाल की है। दोनों दौर की शख्सियत को उन्होंने बड़ी खूबी से पर्दे पर पेश किया है। मिर्जा का किरदार निभाने के लिए उन्होंने घुड़सवारी और तीरंदाजी सीखने को पांच महीने दिए। उनकी शिद्दत पर्दे पर साफ नजर आएगी। वे बड़े केंद्रित इंसान हैं।

उनकी एक चीज मुंबइया युवाओं से मेल खाती है। वह यह कि वे भी उन युवाओं की तरह गेम्स और गैजेट्स में घुसे रहते हैं। 

आगे पढ़ें: किससे मिलती है सैयामी की मां की कहानी 
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पुलेला गोपीचंद और पीवी सिंधू
संधु से बड़े गोपीचंद 
मैं बैडमिंटन प्लेयर रही हूं। मेरे ख्याल से पीवी संधु से बड़ी उपलब्धि उनके कोच पुलेला गोपीचंद की है। वे पिछले 12 सालों से सुबह साढ़े तीन बजे उठते हैं और अपने स्टूडेंट्स को ट्रेनिंग देते हैं। उन्होंने पांच ऐसे बैडमिंटन प्लेयर देश को दिए हैं, जो वर्ल्ड लेवेल पर खेल रहे हैं। उनकी पत्नी की कहानी और मेरी मां की कहानी एक सी है। मेरी मां ने भी परिवार और बच्चों की खातिर अपने सपनों की तिलांजलि दी। 
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