रूप कुमार राठौड़
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आपके पिता पंडित चतुर्भुज राठौड़ ध्रुपद के मशहूर गायक रहे हैं, विरासत में उनसे आपको क्या क्या मिला?
संगीत में मेरी पहली संगत तबला से हुई। डैडी ने ही इसके लिए मुझे प्रेरित किया। अल्ला रक्खा खां, किशन महाराज, शांता प्रसाद, जाकिर हुसैन आदि उस समय के जितने भी बड़े तबला वादक थे, सबको देख-सुनकर ही मैंने तबला बजाना सीखा है। तबला वादक रूप में मेरी शुरुआत अनूप जलोटा के भजन 'ऐसी लागी लगन' से हुई। उनके तमाम भजनों जैसे, 'जग में सुंदर है दो नाम,' 'रंग दे चुनरिया' में मैंने ही तबला बजाया है। पंकज उधास की गजलों मसलन, 'घुंघरू टूट गए', 'जरा आहिस्ता चल', 'सोने जैसा रंग है तेरा' में जो तबला सुनाई देता है, उसकी थाप भी मेरी ही है।