हिंदी सिनेमा की कालजयी फिल्मों में शुमार ‘अंदाज’, ‘सीता और गीता’, ‘शोले’, ‘शक्ति’ और ‘सागर’ के निर्देशक रमेश सिप्पी आज अपना 79वां जन्मदिन मना रहे हैं।हिंदी सिनेमा के दिग्गज फिल्म निर्माता जी पी सिप्पी के बेटे रमेश सिप्पी ने अपने जन्मदिन पर ‘अमर उजाला’ के सलाहकार संपादक पंकज शुक्ल से इस लंबी बातचीत में अपनी हिट फिल्मों की मेकिंग के दिलचस्प किस्से तो सुनाए ही, साथ ही वह वाकया भी सुनाया जब ‘शोले’ के प्रीमियर पर उनकी बगल वाली सीट पर बैठे दिलीप कुमार दूसरी रील देखकर ही चौंक गए थे कि ये तो क्लाइमेक्स होना चाहिए था फिल्म। इंटरव्यू थोड़ा लंबा है लेकिन है बहुत ही रोचक, चलिए जानते हैं रमेश सिप्पी का सफरनामा... Shah Rukh Khan: 'पठान' की रिलीज से पहले मन्नत के बाहर फैंस का जमावड़ा, प्यार लुटाने के लिए ग्रिल पर चढ़े शाहरुख
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फिल्मः सजा
- फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई
रमेश जी, आपकी जन्मतिथि इंटरनेट पर 23 जनवरी 1947 मिलती है, इस लिहाज से तो आपका भी अमृत महोत्सव होना चाहिए..
नहीं, ये जानकारी सही नहीं है। मेरी पैदाइश कराची में हुई 1944 में। 1947 में बंटवारे के बाद हम बंबई आए थे। पिताजी (जी पी सिप्पी) को यहां आने के बाद चीजें समझने और परिवार को व्यवस्थित करने में थोड़ा समय लगा। इधर उधर के काम करने के बाद उन्होंने भवन निर्माण में काम शुरू किया और 1951 में पहली फिल्म बनाई, ‘सजा’। मिस्त्री ब्रदर्स, यानी कि फली मिस्त्री और जाल मिस्त्री उस फिल्म के कैमरामैन और निर्देशक थे। देवानंद हीरो थे और निम्मी हीरोइन। और, इसी फिल्म के सेट पर पहली बार मेरा सिनेमा से सामना हुआ। Kartik Aaryan: करण जौहर से झगड़े पर कार्तिक ने तोड़ी चुप्पी, बताई दोस्ताना 2 से बाहर होने की वजह
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रमेश सिप्पी
- फोटो : अमर उजाला, मुंबई
आपको कब महसूस हुआ कि आपको भी सिनेमा से इश्क हो रहा है?
जब मैं फिल्म ‘सजा’ के सेट पर गया तो छह-सात साल का था। उससे पहले मुझे कुछ पता नहीं था कि फिल्म क्या होती है, शूटिंग क्या होती है? महालक्ष्मी के फेमस स्टूडियो गया तो वहां जो माहौल था, उसने मुझे मोहित कर लिया। सोचने लगा कि ये क्या दुनिया है! सवाल भी उठे लेकिन किससे पूछूं, वहां सब लोग काम कर रहे हैं। ये भी नहीं कि प्रोड्यूसर का बेटा है तो अलग से ख्याल रखे कोई। सब तार इधर उधर बिखरे रहते। सुरक्षा के खास इंतजाम भी तब नहीं होते थे। स्कूल जाना प्राथमिकता थी उन दिनों लेकिन इसका असर ये हुआ कि अब जब भी मुझे मौका मिलता तो मैं भाग निकलता पिताजी के साथ। बस देखते देखते कहीं दिमाग में सिनेमा चलना शुरू हो गया। Pathaan: रिलीज से ठीक पहले पठान का विरोध तेज, गुजरात के सिनेमाघर में तोड़फोड़, पांच गिरफ्तार
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शहंशाह
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और, जो बतौर बाल कलाकार पहली बार आपने कैमरे का सामना किया, उसकी कोई तैयारी की थी आपने?
बताता हूं ये वाकया भी। हुआ क्या कि उस दिन मैं सेट पर था और जिस बच्चे को ये किरदार करना था, वह ठीक से कर नहीं पा रहा था। तो ये हुआ कि कोई और ढूंढ लो। अभिनेता रंजन के बचपन का रोल था। एक सीन या कहें कि एक शॉट था। दो शब्द का मेरा संवाद था, ‘अम्मी अम्मी’ और जाकर मुझे मां का किरदार कर रहीं अचला सचदेव से लिपट जाना था। लेकिन, मुझे कभी अभिनय का चस्का नहीं लगा। फिर एक और फिल्म बनी थी, ‘भाई बहन’। उसमें मैंने गली के गुंडे जग्गू दादा का रोल किया। रंगीन पट्टियों वाली गंजी और गले में गांठ वाला रूमाल। रास्ते पर आवारागर्दी करनी थी, दो तीन सीन थे तो कर लिए। लेकिन ये कभी ख्याल नहीं आया कि मुझे अदाकारी ही करनी है। मुझे कैमरे के पीछे का काम जादुई लगता था।
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मेरे महबूब
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तो निर्देशन में कभी किसी के सहायक भी रहे आप?
कैमरे के पीछे काफी काम किया मैंने। फिल्म निर्माण की जिम्मेदारियां संभाली। निर्देशन में भी हाथ बंटाता था। लेकिन, आधिकारिक तौर पर पूछें तो मैं निर्देशक एच एस रवैल का सहायक बना फिल्म ‘मेरे महबूब’ के सेट पर। वहां मैं उनका सातवां और आखिरी सहायक था। सारा काम करता था। साधना जी के चप्पल उठाए हैं मैंने। दो चार दिन का काम था। एक गाना था। बाकी सब डैडी की फिल्मों के सेट्स पर ही सीखा। 50 के दशक में डैडी काफी फिल्में बना चुके थे। फिर 60 के दशक में आई एस जौहर के साथ जुड़कर उन्होंने खूब काम किया। ‘जौहर महमूद इन गोवा’ में जो सहायक निर्देशक थे, डी आर ठक्कर, उनको मैं देखता रहा कि क्या करते हैं। और, एक खलिश मियां थे जो संवादों पर नजर रखते और उर्दू में लिखकर संवाद कलाकारों को देते थे। फिर हमारी अगली फिल्म शुरू हो गई ‘मेरे सनम’, आशा पारेख और बिस्वजीत के साथ। उसकी आउटडोर शूटिंग में काफी कुछ सीखा। हम लोग इस फिल्म की शूटिंग करने मनाली गए थे लेकिन वहां बारिश लगातार होती रही तो सारे ट्रकों को लेकर हम कश्मीर निकल गए। काफी काम हो गया। गाने वाने सब शूट हो गए। कुछ सीन्स हो गए। फिर आकर बंबई में काम किया। ये दोनों फिल्में 1965 में रिलीज हुई और दोनों सुपरहिट रहीं। फिर और फिल्में बनीं। राजेश खन्ना जिस कंपटीशन में जीते उसे आयोजित करने वाली संस्था यूनाइटेड प्रोड्यूसर्स में डैडी भी थे। राजेश खन्ना के के साथ हमारी पहली फिल्म थी ‘राज’, तो उनसे भी मेल मुलाकात होती रही।
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ब्रह्मचारी
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और कब लगा आपको कि अब आप खुद भी तैयार हैं फिल्म निर्देशित करने के लिए?
1965 में हमारी फिल्म शुरू हुई ‘ब्रह्मचारी’ शम्मीजी के साथ। शम्मीजी से पहले से भी मेल मुलाकात चल रही थी। लेकिन इसी फिल्म के सेट पर एक दिन मैंने उनसे पूछा कि मेरे पास एक कहानी है उसमें काम करेंगे आप? उन्होंने कहा, रमेश! पता है तुम्हें, मुझे किसलिए जानते हैं लोग। नाच गाना। ये सब। याहू बॉय की इमेज है मेरी। मैंने कहा, ये तो ठीक है, लेकिन वह तो सब आप कर चुके हैं। कुछ अलग करते हैं। उन्होंने कहानी सुनने के बाद कहा, हां! कुछ बात है। मैं उस समय 24 साल का था जब उनसे मेरी बात हुई और 25 साल का था तब मैंने अपनी पहली फिल्म ‘अंदाज’ लॉन्च कर दी। डैडी को बताया कि मैंने शम्मीजी के साथ एक फिल्म की बात की और उन्होंने हां भी कर दी है।
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अंदाज
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और आपके डैडी की प्रतिक्रिया क्या थी तब? उनका कितना साथ मिला अपनी पहली फिल्म बनाने में?
डैडी तो शायद चाह भी यही रहे थो तो वह बोले, वेरी गुड। लेकिन, तब तक मैंने सिर्फ शम्मीजी से बात की थी। फिल्म ‘अंदाज’ में हीरोइन के लिए मैं नूतन को लेना चाह रहा था लेकिन डैडी का कहना था कि जोड़ी तो ठीक है लेकिन इसमें ताजगी लानी चाहिए। नूतन के साथ वह ‘लाइट हाउस’ बना चुके थे। उनकी बात में मुझे दम लगा। तब तक हेमा मालिनी की पहली फिल्म राज कपूर जी के साथ ‘सपनों का सौदागर’ रिलीज हो चुकी थी। वह लंबी भी थीं और आकर्षक भी। लेकिन, उन दिनों वह इस फिल्म के निर्माता बी अनंतस्वामी के साथ एग्रीमेंट से बंधी हुई थीं। मासिक वेतन मिलता था उनको और इस दौरान जो वह फिल्म साइन करती थीं, उसका बड़ा हिस्सा अनंतस्वामी को जाता था। फिर दोनों के बीच ये भी समझौता हुआ कि महीने के 15 दिन अनंतस्वामी के पास रहेंगे और 15 दिन हेमा मालिनी अपने हिसाब से काम कर सकेंगी। डैडी ने अनंतस्वामी से बात की। उनका मानना था कि अगर हम शूटिंग के लिए डेट्स अनंतस्वामी के जरिए लेंगे तो दिक्कत नहीं होगी। हेमा मालिनी को जब कहानी सुनाई तो उन्होंने पूछा, मैं कर सकूंगी ये किरदार? मैंने अभी अभी तो करियर शुरू किया है और एक बच्चे की मां का रोल, ये हो पाएगा। लेकिन, फिल्म के विषय ने उन्हें मोहित कर लिया था। तो फिल्म शुरू हुई और ये फिल्म बनने के दौरान हमारे बीच आपसी समझ काफी अच्छी हो गई।
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अंदाज
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और राजेश खन्ना..?
राजेश खन्ना को तो हमने ही लॉन्च किया था तो वह तो घर के ही थे। ‘राज’ के बाद उनके साथ दूसरी फिल्म भी हमने बनाई, ‘बंधन’। मुमताज के साथ थी ये फिल्म। ‘ब्रह्मचारी’ में भी हमने मुमताज को लिया था, उसका वो गाना, ‘आजकल तेरे मेरे प्यार के चर्चे हर जुबान पर.. ’ बहुत लोकप्रिय हुआ था। तो इस तरह मेरा करियर शुरू हुआ और किस्मत कहिये या कि कुछ और। मेरी पहली फिल्म ‘अंदाज’ रिलीज होते होते राजेश खन्ना सुपरस्टार बन गए। जनवरी 1969 में मैंने फिल्म शुरू की थी तब उनकी कुछ फिल्में आ रही थीं और लोग उन पर गौर भी कर कर रहे थे और उसी साल बाद में ‘आराधना’ रिलीज हो गई। यहीं से राजेश खन्ना की उड़ान सातवें आसमान की तरफ निकल गई। तब तक हमारी फिल्म भी आ गई। 1971 में ही ‘आनंद’ भी रिलीज हुई थी और हमारी भी। संयोग ये भी कि इन दोनों फिल्मों में उनके किरदार की मौत हो जाती है।
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सीता और गीता के सेट पर हेमा मालिनी के साथ रमेश सिप्पी
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तो अंदाज सुपरहिट हुई। उसकी सक्सेस पार्टियां हुई होंगी और तभी आपने शुरू कर दी ‘सीता और गीता’?
नहीं, उसके पहले ही इस फिल्म की सारी बात हुई। मुमताज से भी बात कर ली थी। उस वक्त ऐसा लगता था कि उनका अनुभव और उनका अभिनय दोनों दमदार हैं और फिल्म के लिए वह सही रहेंगी। लेकिन, उनके पास फिल्में उन दिनों बहुत ज्यादा थी और उनकी डेट्स की समस्या आ रही थी। हीरोइन को डबल रोल करना था और अगर डेट्स नहीं मिली तो दिक्कत हो जाएगी। तो एक दिन जब फिल्म ‘अंदाज’ की डबिंग चल रही थी। तो मैंने कंट्रोल पैनल पर लगे माइक से पूछा। मैं इधर बैठा था और हेमा मालिनी उधर दूसरे कमरे में डबिंग कर रहीं थी। तो मैंने माइक पर ही पूछा कि फिल्म करेंगे आप एक और। तो उनका भाव ऐसा था कि एकाएक ये कैसा सवाल है डबिंग के दौरान? हालांकि उनका जवाब था कि बिल्कुल करेंगे, लेकिन क्या करना है? फिर बीच में ब्रेक हुआ तो बैठकर मैंने बात की और कहानी का विचार बताया तो फिर उनका वही सवाल था, कर सकूंगी मैं ये किरदार?
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शोले के सेट पर धर्मेंद्र के साथ रमेश सिप्पी
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और, इसी फिल्म ‘सीता और गीता’ से धर्मेंद्र से आपकी मुलाकात हुई...
हां, हरिभाई (संजीव कुमार) से भी बात हो गई। हरिभाई के साथ हमने काम किया था। लेकिन, धरमजी के साथ नहीं किया था। दोनों तैयार हो गए। ‘अंदाज’ की शूटिंग के बीच में 1970 में सलीम जावेद हमारे साथ आ गए। ‘हाथी मेरे साथी’ रिलीज होने से पहले की ये बात है। ‘सीता और गीता’ बनाने का विचार मुझे फिल्म ‘राम और श्याम’ देखकर आया था। ‘अंदाज’ रिलीज होने के कोई पांच साल पहले। ये फिल्म देखते हुए मुझे फिल्म तो बहुत बढ़िया लगी लेकिन मुझे लगा कि एक आदमी इस तरह दबा हुआ कुछ अजीब सा लगता है। अगर इसकी जगह लड़की हो तो। लेकिन, उस वक्त मैंने सोचा कि ये फिल्म अभी अभी बनी है तो इसे तुरंत बनाना ठीक नहीं होगा। इसको कुछ बाद में करते हैं। लेकिन, वह विचार मेरे साथ बना रहा। सलीम-जावेद को जब मैंने ये विचार बताया तो वे बोले ये तो फटाफट बन जाएगी। एक और फिल्म उन्हीं दिनों अंग्रेजी में रिलीज हुई थी इसी विचार से मिलती जुलती। उसकी जानकारी भी मैंने सलीम-जावेद के साथ साझा की।
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शोले
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और, उसके बाद ‘शोले’! ये फिल्म आपने हेमा मालिनी को ‘सीता और गीता’ की मेकिंग के दौरान ऑफर की?
नहीं, ये दोनों फिल्में ओवरलैपिंग फिल्में नहीं थीं.। ‘सीता और गीता’ बन गई। रिलीज हो गई। हिट हो गई। सवाल था कि अब आगे क्या करेंगे? तय ये हुआ कि जो भी करें कि हटकर करें। ये बहुत आसान होता है कि एक फिल्म चल गई तो उसके बाद भी कुछ ऐसा ही करें। लेकिन, मैंने हमेशा इस चुनौती को स्वीकार किया कि मेरी अगली फिल्म मेरी पिछली फिल्म से बिल्कुल हट कर हो। मुझे उन दिनों एक माहौल नजर आया कि ऐसा वातावरण हो। वेस्टर्न फिल्में देखते थे उस वक्त। डकैत हों। हमारे यहां उन दिनों चंबल घाटी के डकैतों के चर्चे थे। स्क्रिप्ट बनाते वक्त हमने सब रख दिया कि डकैत हों और ये सब हो। सलीम-जावेद के पास भी एक आइडिया था। एक स्टोरी लाइन थी चार लाइन की जो उन्होंने मनमोहन देसाई को सुनाई थी। उन्होंने हां भी कह दिया था लेकिन वह इसे बनाने को लेकर सहज नहीं थे क्योंकि ये उनके टाइप की फिल्म नहीं थी। सलीम-जावेद ने वह विचार मुझे सुनाया। तब उन्होंने ये नहीं बताया था कि मन मोहन देसाई इसे बनाने को उत्सुक नहीं है या कि वह इसे बनाने को लेकर सहज नहीं है। उन्होंने मुझे कहानी का खाका सुनाया कि एक पुलिस ऑफिसर है जो एक डकैत को पकडता है। उस वक्त गब्बर वगैरह नाम कुछ नहीं तय था। और वह डकैत आकर उसके पूरे परिवार को मार देता है। पुलिस अफसर ये दो लड़कों को बुलाता है जिनके साथ कहीं उनकी मुलाकात हुई थी। एक बात और तब उनकी कहानी में ये किरदार पुलिस ऑफिसर का न होकर एक आर्मी ऑफिसर का था। उनके साथ दो लड़के थे जो शरारती थे और अनुशासन से जिनका कोई लेना देना नहीं था। जब ऑफिसर के हाथ कट जाते हैं तो वह दोनों लड़कों को बुलाता है। ये आउटलाइन था। मुझे विचार पसंद आया और मैंने इस पर हां कर दी। इसके बाद सलीम-जावेद ने मनमोहन जी को ‘चाचा भतीजा’ की कहानी सुना दी और ये फिल्म वहां से निकाल ली, इस तरह ‘शोले’ बन गई।
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शोले के सेट पर अमिताभ बच्चन और धर्मेंद्र के साथ रमेश सिप्पी
- फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई
सबसे पहले आपने ‘शोले’ की कहानी किस कलाकार को सुनाई?
मेरा ख्याल है कि मैंने धरम जी को सुनाई थी क्योंकि वही उस वक्त के नंबर वन स्टार थे। लेकिन कहानी के किरदारों को लेकर वह थोड़ा भ्रम में थे। उनका ऐसा विचार होता कि मैं अगर वीरू हूं तो फिर जय कौन है और ये ठाकुर कौन है? उन्होंने पूछा कि मैं ठाकुर का रोल कर लूं। मैंने कहा कि आपको करना है तो कर लीजिए। किसी को तो करना है। आप कर लीजिए। फिर उन्होंने कहा कि गब्बर का किरदार भी काफी आकर्षक है। तब मैंने उनसे कहा कि ये सब छोड़िए, ये देखिए कि हेमा मालिनी किसको मिलेगी। इस पर वह फिसल गए कि हां, ये बात तो ठीक है। रीयल हीरो तो वही है जिसको हीरोइन मिलेगी। मेरा ये कहना मेरे लिए फायदेमंद हुआ। उनका रोल भी बहुत मजबूत था और उन्हें पसंद भी था लेकिन उनको थोड़ा सा ये डर था कि एक तरफ ठाकुर, दूसरी तरफ गब्बर, फिर जय। तो कहीं मैं कुछ ज्यादा दब तो नहीं जाऊंगा। ये होता है कलाकारों में। और ये प्राकृतिक है। हेमाजी से जब मैंने ‘शोले’ की बात की तो पहले ही बता दिया कि ये ‘सीता और गीता’ नहीं है। सोलो भी नहीं है। रोल कमाल का है, आप कर लें तो अच्छी बात होगी। उन्होंने बस यही कहा कि ठीक है, जो भी आपको ठीक लगे।
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शान
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मैं कही पढ़ रहा था कि आपका ये मानना रहा है कि फिल्म ‘शान’ अगर ‘शोले’ से पहले आई होती तो उसकी कहानी कुछ और होती, ऐसा क्यों लगा आपको?
हां, रिलीज के बाद में ऐसा लगा क्योंकि जब ‘शान’ रिलीज हुई ‘शोले’ के बाद तो लोगों को ऐसा लगा कि इसमें वह ‘शोले’ वाली बात नहीं है। ‘शोले’ सिनेमाघरों से उतरी ही थी फिल्म ‘शान’ से। तो ये मेरा बाद का विचार था कि ‘शान’ अगर पहले बन जाती तो शायद इसका हश्र अलग होता। ये भी जादुई फिल्म लगती। ताजी लगती। उसका असर अलग होता और उसके बाद जब ‘शोले’ आती तो... लेकिन कौन जानता है कि क्या होता? इतिहास तो अब वही वही है जो है..
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शोले की स्टारकास्ट के साथ जी पी सिप्पी और रमेश सिप्पी
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‘शोले’ को लेकर मेरा एक सवाल ये भी था कि इतनी कामयाब फिल्मों की विरासत को लेकर जब पारिवारिक विवाद होते हैं तो इनके रचनाकार को कितना कष्ट होता होगा?
वो बात क्या करेंगे, उससे क्या मिलना है। आज हम जन्मदिन पर बात कर रहे हैं। तो उस अध्याय को रहने देते हैं।
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सागर
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अच्छा, डिंपल कपाड़िया की बात करते हैं, उनको कैसे तैयार किया आपने फिल्म ‘सागर’ के लिए?
फिल्म ‘सागर’ के वक्त ये बात मैंने सुनी कि वह फिल्में करना चाहती हैं और फिल्मों में वापस आना चाहती हैं। उन्होंने दो तीन बार कोशिश भी की थीं लेकिन फिर वापस हट गईं। तो एक तरह की आशंका तो थी, कहीं ऐसा न हो कि साइन करने के बाद वह न आएं। लेकिन, जब ये विचार जब मैंने जावेद साब के साथ साझा किया तो उन्होंने कहा कि अगर इनको लेते हैं तो फिर ऋषि कपूर को भी लेना चाहिए। ‘बॉबी’ के बाद दोनों का साथ लाना अच्छा रहेगा। तब तक जावेद अख्तर और सलीम खान अलग हो चुके थे। और, हम ये चर्चा कर ही रहे थे कि उसी साल आ गई कमल हासन की फिल्म ‘एक दूजे के लिए’। हमें लगा कि ये तो बड़ा ही जादुई कलाकार है। वह भी मान गए । हमें लगा कि इस लड़के में दम है तो एक अच्छा संयोजन बन गया। मैंने डिंपलजी से सीधे पूछ लिया था कि कहीं ऐसा न हो कि आप फिर पलट जाएं। तब उन्होंने कहा, नहीं, नहीं मैं वचन देती हूं कि ऐसा नहीं होगा। मुझे फोन भी आए इसके बाद कभी एफ सी मेहरा का तो कभी किसी का कि देखिए वह पलट जाती हैं। बीवी है उनकी..
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फिल्म अंदाज के सेट पर हेमा मालिनी और शम्मी कपूर के साथ रमेश सिप्पी
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मतलब राजेश खन्ना की तरफ इशारा था उनका, आपकी बात होती थी उन दिनों राजेश खन्ना से?
नहीं, थोड़ी सी हम दोनों के बीच दूरी आ गई थी। इसकी वजह भी मैं आपको बताता हूं। दरअसल ‘अंदाज’ के बाद हम एक फिल्म बनाने वाले थे। फिल्म की रिलीज पर हम बैंगलोर जा रहे थे और फ्लाइट में ही बात हुई कि अगली फिल्म बनाते हैं राजेश खन्ना और हेमा मालिनी को लेकर। उस वक्त एक विचार था मेरे पास। फिल्म का नाम था, ‘बिरजू चला लंदन’। राजेश को बात पसंद आई। हेमा ने भी कहा, ठीक है। लेकिन, फिर बात बनी नहीं। आगे चलकर। उस समय तक वह सुपर डुपर स्टार बन चुके थे। उनके बारे में तब तक तमाम बातें होने लगी थीं कि ये कैसे वो कैसे। फिर ये कहानियां भी सुनने में आ रही थीं कि टाइम पर नहीं आते हैं। तो मैं पतली गली से निकल गया कि इस सब झमेले में पड़ना ही क्यों..?
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शक्ति
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और, अमिताभ बच्चन के साथ आपने चार फिल्में कीं। जब भी कभी अमिताभ बच्चन की फिल्मों का जिक्र होगा तो आपकी फिल्मों का जिक्र उसमें आएगा ही। लेकिन, एक फिल्म इन सब में है ‘शक्ति’। इसके लिए कलाकारों का चयन करना कैसी चुनौती रही?
देखिए, जवानी के दिनों से मेरा एक सपना था कि एक फिल्म करनी है दिलीप कुमार के साथ। मुझे तो लगा कि कभी होगा नहीं लेकिन हो जाए तो कमाल हो जाए। उसी वक्त मुझे मेरे मन में ये था कि ‘मदर इंडिया’ जैसी कुछ फिल्म हो तो बात बनेगी नहीं तो मैं बनाऊं भी उनके साथ और बात न बने तो अच्छा नहीं होगा। मैंने सलीम-जावेद को साउथ में बनी एक फिल्म का विचार सुनाया। एक ईमानदार पुलिस अफसर की कहानी जिसका बेटा गलत रास्ते पर निकल जाता है। उसके राइट्स भी लिए थे हमने लेकिन जब वह स्क्रिप्ट बनी तो वह उससे बिल्कुल अलग हो गई सिवाय इसके कि कहानी अब भी पुलिस अफसर और उसके बेटे की ही थी। फिल्म के निर्माताओं मुशीर रियाज ने दक्षिण की उस फिल्म के अधिकार वापस कर दिए, यही फिल्म बाद में जितेंद्र को लेकर बनी। हमारी कहानी जब तैयार हुई तो हमें लगा कि इसमे पिता-पुत्र का द्वंद्व बहुत अच्छा रहेगा। लेकिन, तब तक अमिताभ बच्चन बहुत बड़े सुपरस्टार बन गए थे। वह हर तरह के किरदार कर रहे थे। वह एक तरह से वन मैन वैराइटी परफॉर्मर बन चुके थे। एक्शन से लेकर कॉमेडी, ड्रामा, ट्रेजेडी सब कर रहे थे। उनके नाम से घबराहट भी होने लगी। हम सबने सोचा कि चलिए किसी नए लड़के के बारे में सोचते हैं। कुछ नामों पर विचार भी हुआ लेकिन फिर घूम फिर कर रहा नहीं गया। मैंने कहा, चलिए पूछ लेते हैं। हमारी बात हुई तो उन्होंने कहा, ठीक है, कर लेंगे। दिलीप कुमार तब तक आ ही चुके थे। बाकी जो हुआ वह तो अब इतिहास है। एक ऐसा संयोग बना कि जो दोबारा फिर नहीं बना। एक ही फिल्म है जिस फिल्म में दोनों है। इस फिल्म से मुझे भी बहुत संतोष मिला। ‘शोले’ और ‘शान’ के बाद ‘शक्ति’! एक बार फिर ये सम्मोहन जैसा ही था...
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शक्ति के सेट पर अमिताभ बच्चन और दिलीप कुमार के साथ रमेश सिप्पी
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दिलीप कुमार को निर्देशित करना तो चुनौती भरा रहा होगा?
कोई दिक्कत नहीं हुई। मैं कह सकता हूं कि पूरी फिल्में में कोई दिक्कत नहीं हुई। हमने सुनी थीं उनके बारे में तमाम बातें लेकिन ऐसा बिल्कुल नहीं हुआ। मुझे लगता है कि इसके पीछे फिल्म के दोनों दिग्गज कलाकारों के संयोग का भी कारण रहा होगा। मुझे याद है ‘शोले’ के प्रीमियर में मैं उनकी ठीक बगल वाली कुर्सी पर बैठा था। फिल्म में जैसे ही पहला ट्रेन सीक्वेंस आता है जिसमें गब्बर का गिरोह ट्रेन डकैती डालने आता है, उसे देखते ही उन्होंने कहा, ‘अरे, तो सेकंड रील ही है और ये तो क्लाइमेक्स आ गया। अब क्या करोगे। फिल्म को कैसे बांध कर रख सकोगे। इतना एक्शन और ये सब तो क्लाइमेक्स होता है पिक्चर का।’ Mumbai Film City: फिल्म सिटी को यूपी न जाने देने का एलान, दो साल में बनकर तैयार हो जाएगा 300 कमरों का होटल
और, एक आखिरी सवाल मिथुन चक्रवर्ती को लेकर। फिल्म ‘भ्रष्टाचार’ में जब आपने उनको लिया तो मिथुन के तमाम प्रशंसकों को यही लगा कि हां, अब मिथुन सुपरस्टार बन गए हैं क्योंकि उन्हें रमेश सिप्पी की फिल्म मिल गई है। आपने भी उनको उनकी स्टारडम की वजह से ही लिया?
दरअसल वह फिल्म शुरू हुई थी रेखा को लेकर क्योंकि उनका किरदार ही फिल्म का केंद्रीय किरदार है। और, फिर ये था कि मिथुन चक्रवर्ती अच्छे कलाकार तो थे लेकिन उनकी शोहरत डांस और एक्शन को लेकर ज्यादा थी। लेकिन, मैंने कुछ सीन जो उनकी फिल्मों के देखे थे, उससे मुझे लगा था कि ये अभिनेता अच्छा है। बाकी सब जो ये करता है वो तो ठीक है लेकिन कलाकार भी बहुत अच्छा है। मैं उस वक्त धारावाहिक ‘बुनियाद’ बना रहा था और उन दिनों लोगों की दिलचस्पी सिनेमाघरों में कम और टेलीविजन में ज्यादा हो गई थी। लोगों का सिनेमाघरों तक जाना कम हो गया था। तो मैंने सोचा कि एक पूरी तरह व्यावसायिक फिल्म बनानीचाहिए। तो जो धारावाहिक ‘बुनियाद’ के लेखक (मनोहर श्याम जोशी) थे उन्होंने एक कहानी की एक लाइन सुनाई कि एक पत्रकार है जो भ्रष्टाचार के खिलाफ जंग छेड़ती है। उस वक्त भ्रष्टाचार का एक माहौल भी चल रहा था तो बातें हो रही थीं काफी।
रमेश सिप्पी, किरण जुनेजा
- फोटो : अमर उजाला, मुंबई
मजबूत महिला किरदार और सामाजिक परिस्थितियों का अपनी फिल्मों से रिश्ता बनाने का सिलसिला आपका अपनी पहली फिल्म ‘अंदाज’ से ही रहा, ये सब एक सोची समझी रणनीति के तहत हुआ या कि बस दर्शकों से लगातार बने संबंध के चलते ऐसी कहानियां आप चुनते गए?
बिल्कुल सही नब्ज पकड़ी आपने। फिल्म ‘अंदाज’ मेरी पहली फिल्म थी लेकिन उसकी हीरोइन एक विधवा थी। अपने समय से काफी आगे की सोच की फिल्म थी वह पर दर्शकों ने उसे पसंद किया। और भी सारे महिला किरदार आप देखेंगे मेरी फिल्म में तो वे सब हमारे समाज के ही हिस्से जैसे हैं। हमारे आपके आसपास जो हो रहा होता है जब एक निर्देशक उससे रिश्ता बनाता है तभी सिनेमा का दर्शकों से भी रिश्ता बन पाता है। सलीम-जावेद का भी इसमें योगदान काफी रहा। जावेद मुझसे छोटे हैं, उनका भी जन्मदिन जनवरी में ही होता है तो हम लोगों के विचार काफी मेल खाते थे और इसीलिए हमारी बात बन गई। Tunisha Sharma Case: शीजान खान की बहन की तबीयत अचानक बिगड़ी, एक्टर की मां ने सोशल मीडिया पर बयां किया दर्द