किसी इंसान के अपनी जड़ों से एक दिन यूं ही एकाएक कट जाने की जो टीस जिंदगी भर साथ रहती है, उसे समझना हो तो हिंदी सिनेमा के प्रतिष्ठित फिल्मकार बिमल रॉय के बेटे जॉय की किताब ‘रैम्बलिंग्स ऑफ ए बांद्रा बॉय’ उसका एक सजीव दस्तावेज है। सजीव इसलिए क्योंकि जॉय बिमल रॉय ने इसमें जो कुछ लिखा है, वह उन्होंने खुद महसूस किया है और इस लिखे का दर्द, उल्लास और उत्साह सब कुछ उन्होंने इस किताब में ज्यों का त्यों दर्शकों के सामने परोस दिया है, ‘जोल खाबर’ की तरह। ये कॉफी टेबल बुक भी है और नहीं है। है तो इसलिए क्योंकि इसे बनाया किसी कॉफी टेबल बुक की तरह ही है और नहीं इसलिए क्योंकि अपने आकार प्रकार की सहूलियत के चलते ये किताब बजाय कॉफी टेबल बुक पर पड़ी रहने के सफर में खुद को साथ ले जाने की मनुहार खुद करती चलती है।