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Rakesh Roshan Interview: दोस्तों की प्रतिक्रिया देख बदला कोई मिल गया का अंत, कृष 4 के लिए चाहिए हजार करोड़

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राकेश रोशन, कोई मिल गया - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
73 साल के हो चुके अभिनेता, निर्माता, निर्देशक राकेश रोशन इन दिनों अपनी अगली फिल्म ‘कृष 4’ को लेकर उधेड़बुन में हैं। कहानी, पटकथा, विचार सब तैयार है। बस राकेश रोशन इस उम्र में आकर ऐसी फिल्म बनाने के लिए मानसिक रूप से तैयार नहीं है जो हॉलीवुड सुपरहीरो की फिल्म के मुकाबले किसी भी तरह दोयम हो या फिर उनकी फिल्म के चक्कर में फिल्म वितरकों या प्रदर्शकों का किसी तरह कोई नुकसान हो। ‘कृष 4’ बनी तो ये फिल्म अपने बेटे ऋतिक रोशन का करियर पटरी पर लाने के लिए बनाई उनकी फिल्म ‘कोई मिल गया’ की तीसरी सीक्वल होगी और 8 अगस्त 2003 को रिलीज हुई फिल्म ‘कोई मिल गया’ की रिलीज के इसी हफ्ते 20 साल पूरे हो रहे हैं। इसी सिलसिले में ‘अमर उजाला’ के सलाहकार संपादक पंकज शुक्ल ने की राकेश रोशन से ये खास मुलाकात।
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कोई मिल गया - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
राकेश जी, फिल्म ‘कोई मिल गया’ का विचार कैसे आया?
विचार यही था मेरे पास कि ऋतिक जो है वह मानसिक रूप से एक कमजोर युवा है और उसका बर्ताव बच्चों जैसा है। फिर एक एलियन आता है। उससे दोस्ती हो जाती है और एलियन उसे जाते जाते शक्ति देकर जाता है, उसे ठीक कर जाता है..ये एक आइडिया था। चूंकि ऋतिक के किरदार का छोटे बच्चों जैसा उसका व्यवहार है तो जाहिर है कि दोस्त भी उसके छोटे ही होंगे। ये अपने आप ही सब बनता गया। फिर बच्चे भी आ गए। टैलेंटेड बच्चे आ गए। मैंने ऑफिस में बुलाया सब बच्चों को। सब बड़े टैलेंटेड बच्चे मिले मुझे। ऋतिक का रोल बहुत चैलेंजिंग था। ऐसे रोल हॉलीवुड में बहुत सारे कलाकारों ने किए हैं लेकिन बच्चों के साथ कभी नहीं किया। एक तुलना भी थी कि कि ऋतिक ठीक कर रहा है या ओवरएक्टिंग कर रहा है। बच्चों के साथ एक्टिंग करना मुश्किल होता है। बहुत मुश्किल से पिक्चर बनाई थी तो ऋतिक एकदम से कैरेक्टर में था तो मुझे मुश्किल नहीं हुई।
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ऋतिक रोशन, राकेश रोशन - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
ऋतिक के साथ जब आपने फिल्म का पहला विचार साझा किया होगा तो उनकी पहली प्रतिक्रिया क्या थी?
उसका पहला ही रिएक्शन था, इट इज वेरी गुड, लेट्स गो अहेड विद इट। मुझे याद है कि दिल्ली में वह फिल्म ‘यादें’ की शूटिंग कर रहा था तो मैंने उसे फोन किया सुबह 8 बजे कि ऐसा एक आइडिया आया है रात को। कैसा लगा? तो सुनते ही उसने कहा बहुत अच्छा। क्या होता है कि सामने वाले से अच्छा रिस्पांस आता है तो उत्साह बढ़ जाता है तो फिर मैंने इसे अपनी राइटिंग टीम को सुनाया। दोस्तों को सुनाया। फिर आहिस्ता आहिस्ता इस पर काम आगे बढ़ता गया। स्क्रीनप्ले, स्टोरी कुछ 15 दिन में बन गई क्योंकि नई कहानी थी। जब भी हम कोई नहीं कहानी बनाते हैं तो उसमें दिक्कत क्या होती है कि हम कोई भी सीन सोचते हैं तो रिएक्शन आता है कि ये तो फलां पिक्चर में आ चुका है। फिर हम हम चेंज करते हैं तो चेंज करना बड़ा मुश्किल होता है क्योंकि जैसे गाने हैं। रोमांटिक गाने हैं तो वही। उनके नए बोल भी लिखवाने हैं। बोल तो वही हैं तो कितने नए गाने लिखवा लेंगे? कितनी नई धुनें बना लेंगे? इसमें क्या था कि ये कहानी नई थी तो ये अपने आप बुनती चली गई ऐसी कोई पिक्चर पहले आई नहीं तो इसका कोई रेफरेंस जैसा था नहीं।

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राकेश रोशन - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
लेकिन कहा तो जाता है कि स्टीवन स्पीलबर्ग की फिल्म ‘ईटी’ (एक्स्ट्रा टेरेस्ट्रियल) से इस फिल्म का संदर्भ लिया गया है..
नहीं, रेफरेंस उसका नहीं है। एलियन जरूर आया है और बच्चे के साथ रहता है बस उतना ही है और कुछ नहीं है..
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राकेश रोशन - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
सचिन भौमिक, रॉबिन भट्ट और हनी ईरानी जैसे दिग्गज लेखकों ने इसे लिखा, एक एक करके अगर उनका योगदान गिनें तो कुछ विशेष याद आता है आपको?
हर पिक्चर में मेरी लेखक बहुत बड़ा रोल प्ले करते हैं. क्योंकि वह जानते हैं मुझे किस तरह की कहानी दिखानी है परदे पर। वे किसी और डायरेक्टर के साथ काम करेंगे  तो उनको पता है कि उनको किस तरह का काम चाहिए और मुझे भी पता है कि अगर मैंने ये सीन सोचा है कोई चीज डाली है इनके सामने ये तो किस तरह का रेस्पॉन्स करेंगे। तीनों का काम अलग अलग पिन प्वाइंट करना तो बड़ा मुश्किल होगा लेकिन ये टीम वर्क है। सचिन भौमिक जी का जो शब्दकोश था वह कमाल का था। कोई भी पिक्चर का आप नाम ले लीजिए तो या उनकी खुद की लिखी होगी या फिर उन्होंने उसको खूब पढ़ा होगा। उससे बहुत मदद मिलती थी हमको। हनी जी थीं। मैंने एक महिला को इसलिए रखा राइटर क्योंकि वह भावनाएं समझती हैं। रॉबिन भट्ट भी अपने साथ बहुत सारा अनुभव लेकर आए। वह चुटकी बजाते ही समस्या का हल निकाल लेते थे।
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कोई मिल गया - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
जब आपने कहानी पूरी की और आपने रेखा को अप्रोच किया मां के रोल के लिए तो बताते हैं कि वह मना करतीं तो आपके पास कोई बैकअप प्लान नहीं था..
जी हां, ये था। मैंने इसलिए रेखा जी के लिए सोचा था कि मुझे एक मॉडर्न लड़की मां के रोल में चाहिए थी जो पढ़ी लिखी हो, जो ऐसे बच्चों को संभाल सकती हो। मैंने रेखा जी एक दोस्त की तरह बुलाया। मुझे भी लगता था कि वह ये फिल्म नहीं करेंगी। मैंने कहा कि मैं एक कहानी बना रहा हूं आप सुनिए और बताइए आपका रिएक्शन। तो उन्होंने पूरी कहानी सुनी और उनकी पहली प्रतिक्रिया यही थी कि मैं करूंगी ये रोल। मैंने कहा कि कौन सा रोल तो उन्होंने कहा कि तुमने मुझे मां के रोल के लिए बुलाया है ना!
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राकेश रोशन, ऋतिक रोशन - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
ऋतिक की अगर बात करें तो ‘कहो ना प्यार है’ से लेकर उसके बाद की फिल्मों में एक लवर बॉय की जो इमेज बनी थी उनकी उसे आपने यहां एकदम चकनाचूर कर दिया..
मैं हमेशा अलग तरह की फिल्में बनाता हूं। आप देख लें मैंने ‘खुदगर्ज’ बनाई। उसके बाद सीधा ‘खून भरी मांग’ बनाई। मैं जब इसे बना रहा था तो लोग कहते थे कि ये पिक्चर चलेगी नहीं क्योंकि एक पत्नी अपने पति को मार रही है। मैंने कहा कि अगर पति ने गलत किया है तो क्यों नहीं मारेगी? तो जब मैंने ‘कहो ना प्यार है’ बनाई तो मुझे पता था कि ऋतिक एक्टर बहुत अच्छा है। अगर मैं उसकी एक्टिंग एबिलिटी बताऊं, ऐसे रोल दूं उसको कि वो दुनिया को बताए कि एक्टर्स ये भी कर सकते है। चैलेंज मेरे लिए भी था और ऋतिक के लिए भी था। जब चैलेंज होता है तो आप ज्यादा सतर्क होकर काम करते हैं। ऋतिक ने बहुत मेहनत की। ऋतिक का जब मैंने पहला शॉट लिया जिसमें वह स्कूटर चला रहा है और रास्ते पर बाजार से आ रहा है और कुछ गुंडे उसे रोकते हैं तो जिस तरह से उसने स्कूटर चलाया और जिस तरह से उसने शॉट दिया तो मैं समझ गया कि ये हो जाएगा काम।

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कोई मिल गया की शूटिंग के दौरान - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
और, फिल्म की हीरोइन के लिए प्रीति जिंटा ही आपकी पहली और आखिरी पसंद थी? इसका जिक्र मिलता है कि आपने ऐश्वर्या राय और करीना कपूर का नाम भी संभावितों की सूची में रखा था।
नहीं नहीं, प्रीति जिंटा ही पहली पसंद थीं। और, उसका रोल बहुत कठिन था क्योंकि रोमांटिक रोल तो है नहीं। उम्र उसकी वही है लड़के की लेकिन है दिमाग लड़के का बच्चा। उसको कैसे ट्रीट करना है, कैसे उसके साथ डायलॉग बोलना, कैसे उसको समझाना, बहुत कठिन रोल था। फिर वो गाना था, इधर चला मैं उधर चला तो गाने के हिसाब से सिचुएशन भी कठिन थी। तो गाने के हिसाब से जो लड़का है वो तो इश्क मोहब्बत ये शब्द इस्तेमाल नहीं करेगा वो तो सिंपल वर्ड यूज करेगा।

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कोई मिल गया की शूटिंग के दौरान - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
लेकिन, फिल्म ‘कोई मिल गया’ का सबसे अच्छा गाना जो मुझे लगता है वह है ‘कच्चा नहीं कुछ भी, पक्का नहीं कुछ भी, होता है जो कुछ भी, सब खेल है.. ’, ये जो जीवन अध्यात्म को सहज शब्दों में समझाने वाले गाने आपकी फिल्मों में होते हैं, उसके लिए कितना वक्त गीतकारों के साथ गुजारते हैं?
बहुत ध्यान देते हैं गानों पर। अगर बोल न हों तो गाने का कोई मतलब नहीं रह जाता। गाने के बोल ऐसे होने चाहिए जो फिल्म की भावना को प्रतिबिंबित करें। पिक्चर की कहानी को आगे बढ़ाएं अपने बोलों से। हम गानों के बोलों पर बहुत ध्यान रखते हैं। कोई भी सिचुएशन हो हम चाहते हैं कि या तो आदमी फिलॉसफिकल हो या फिर कोई ऐसी बात करे जो हमारी कहानी को भी आगे बढ़ाए और लोग गाने को समझें भी। आजकल जो गाने होते हैं तो मुझे बहुत समझ में नहीं आते। क्या कहना चाह रहे हैं ये भी समझ नहीं आता। बोल सुनाई भी नहीं देते। हम लोग बोल की वॉल्यूम हमेशा ऊपर रखते थे। संगीत तो बस साथ देने के लिए होना चाहिए गाने में।

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राकेश रोशन - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
संगीत के प्रति रुचि तो आपको विरासत में मिली है आपके पिता रोशन इतने मशहूर संगीतकार हुए। अब आपके भाई राजेश रोशन उसे संभाले हुए हैं तो संगीत आपकी फिल्मों का केंद्रबिंदु रहा है..और, इसे फिल्म की कहानी के वातावरण के साथ सम में रहना जरूरी है, आप इसे कैसे हासिल करते हैं?
वो क्या होता है जब मैं फिल्म बना रहा होता हूं, जब मैं कहानी फाइनल करता हूं तो मैं जाकर पहले लोकेशन ढूंढता हूं। मुझे लगता है कि ये गाना मैं यहां पिक्चराइज करूंगा। इसके बाद यहां शूट करूंगा। फिर जब मैं म्यूजिक डायरेक्टर के साथ बैठता हूं तो उन्हें समझाता हूं कि मेरी लोकेशन ऐसी है। उनको उस वातावरण में ले जाता हूं विजुअली। उनको भी काम करने का उत्साह मिलता है। उसी से वह प्रेरित हो जाते हैं। उसी तरह गीतकार भी प्रेरित हो जाते हैं।

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कोई मिल गया - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
फिल्म ‘कोई मिल गया’ का अंत, मुझे बताया गया कि आपने दो सोचे थे। एक था जिसमें जादू रोहित को शक्ति देकर जाता है और दूसरे में वह शक्ति वापस लेकर चला जाता है, ऐसा किया था आपने?
पहले तो मैंने वही सोचा था कि जादू गया तो अपनी ताकत लेकर चला गया। मैं अपनी फिल्में रिलीज से पहले सब दोस्तों को दिखाता हूं। इंडस्ट्री के अच्छे अच्छे जो डायरेक्टर हैं जो प्रोड्यूसर हैं उनको दिखाता हूं और उनकी राय लेता हूं। एटम बम तो बना नहीं रहा हूं पिक्चर ही बना रहा हूं। मैंने देखा बहुत से लोग एंड में जाकर थोड़ा उदास हो जाते हैं। मैंने पूछा कि क्या हुआ तो कहने लगे कि ये एंड में...। फिर मैंने सोचा कि शायद उनको ये इसलिए लग रहा है कि जादू ताकत लेकर चला जाता है। फिर, मैंने दूसरा एंड शूट किया। और दोनों एंड दिखाए तो सबने दूसरे एंड को ओके किया।

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राकोश रोशन - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
क्या इस फिल्म में ऋतिक के पिता का रोल करने के लिए आपकी ऋषि कपूर से भी बात हुई थी? नाम तो जैकी श्रॉफ और अनिल कपूर के भी आते हैं..
नहीं, नहीं। ऐसा नहीं हुआ। इस किरदार के लिए कभी किसी से मेरी बात नहीं हुई। मैं रेखा को पूछ रहा था कि किसको लूं, किसको लूं, रोहित के पिता के किरदार के लिए तो रेखा ने ही कहा कि आप खुद क्यों नहीं कर लेते।

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राकेश रोशन - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
फिल्म में सबसे ज्यादा किस सीन को शूट करने में आपको परेशानी हुई।
सबसे ज्यादा परेशानी हुई थी जादू को शूट करने में क्योंकि जादू एक मैकेनिकल चीज थी, जिसे हम बाहर से कंट्रोल करते थे। वो रिमोट कंट्रोल से चलता था तो अगर ऋतिक यहां खड़ा है और वह उससे बातें कर रहा है तो उसकी आंखें उधर होनी चाहिए थी तो वह बाहर से कंट्रोल करते थे। लेकिन आंखें दोनों की मिलती नहीं थी तो उससे पहुत परेशानी होती थी। किसी सीन में रेखा ने यहां से बात की, ऋतिक ने वहां से बात की तो आंखें वहां जाना, सिर मुड़ना ये बड़ा मुश्किल होता था। कभी कभी कोई शॉट में दो तीन घंटे लग जाते थे। फिर मैंने शूटिंग का पैटर्न बदला। शॉट डिवीजन बदला। पिक्चर में पता नहीं चलता है लेकिन शूटिंग इस तरह से की कि परेशानी कम से कम हो।

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कृष - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
और स्पेशल इफेक्ट्स के कौन कौन लोग मददगार थे?
मार्क कोल्बे थे लॉस एंजेलिस के। उनसे पूरी पिक्चर डिस्कस की फिर उन्होंने स्पेसशिप बनाकर दिया मुझे। उस वक्त इसमें बहुत समय लगा मुझे। फिर जब मैं ऑस्ट्रेलिया गया जादू को बनाने के लिए तो पहली जिस कंपनी में गया तो कंपनी वाले पैसों की बात करने लगे। मुझे लगा कि ये कहानी भी नहीं सुन रहा और सीधे पैसों की बात कर रहा है। फिर मैं दूसरी कंपनी में गया तो उस कंपनी में पति पत्नी थे तो उन्होंने पूछा कि आपको कैसा एलियन चाहिए? मैंने कहा कि जो छोटा सा हो जिसकी आंखें बहुत प्यारी हों और बच्चों से घुल मिल सकें। मैंने दो घंटे उनको पूरी कहानी सुनाई। कहानी सुनने के बाद औरत की आंखों में आंसू थे। वह समझ गईं कि मुझे क्या चाहिए तो अगले दिन सुबह उन्होंने मुझे बुलाया और ड्राइंग दिखाईं कि हमने ऐसा ऐसा सोचा है। और, उन्होंने ठीक वही सोचा जो मेरे दिमाग में था।  

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कोई मिल गया - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
ये भी था कि उसमें एक एक्टर था कि जो जादू की ड्रेस पहनकर शूटिंग में हिस्सा लेता था, फिल्म की रिलीज के समय इसे लेकर बहुत चर्चे हुए थे..
नहीं, फिल्म में जादू का किरदार किसी एक्टर ने नहीं किया।

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राकेश रोशन - फोटो : सोशल मीडिया
निर्देशन की बात तो हो गई लेकिन बतौर निर्माता भी आपने इस फिल्म में बहुत बड़ा दांव खेला था..
हां, उस वक्त तो वाकई बहुत बड़ा दांव था क्योंकि ये वो वक्त था जब ऋतिक की बाहर की पिक्चरें कोई चल नहीं रही थीं। और मैं एक ऐसी पिक्चर बना रहा था ऋतिक के साथ जो कभी किसी एक्टर ने की नहीं। एक लड़का जो ‘कहो ना प्यार है’ में एक हीरो था और यहां मैने उसे मेंटली चैलेंज्ड बना दिया। जब पिक्चर बन रही थी तो मैं बहुत भरोसे के साथ बना रहा था ये पिक्चर। बाहर की पिक्चरें नहीं चलीं लेकिन मुझे यकीन था था कि ये पिक्चर चलेगी। इस पिक्चर में ऋतिक का नाम बहुत होगा। पर रिलीज के दो हफ्ते पहले, बाप का एक वो इमोशन जागा और प्रोड्यूसर डायरेक्टर पीछे रह गया। मैं यही प्रार्थना करता था कि ऋतिक ने इतनी मेहनत से काम किया है, सब बच्चों ने इतना काम किया, सबने इतनी मेहनत से काम किया है, ये पिक्चर का चलना जरूरी है। भगवान से प्रार्थना भी करता था। फिर मैंने डिस्ट्रीब्यूटर्स को कहा था कि ये फिल्म अलग किस्म की फिल्म है इसे आप 12 बजे के शो में लगाइएगा क्योंकि हर पिक्चर वह मेरी सुबह 2 बजे लगा देते थे, करण अर्जुन, कोयला ये सब आधी रात के बाद दो बजे रिलीज हुई फिल्में हैं। फिर मैंने कहा ‘कहो ना प्यार है’ 12 बजे ही लगाना क्योंकि नया लड़का है, नई लड़की है तो उसे भी सुबह 9 बजे के शो में लगा दिया। हालांकि शो हाउसफुल था। तो, मैंने ‘कोई मिल गया’ के एग्रीमेंट में लिखा लिया कि पहला शो 12 बजे ही होगा। रेगुलर शो में ही रिलीज होगी फिल्म। लेकिन सुबह 9 बजे फोन आ गया कि हमने लगा दी पिक्चर सीपी बरार में और पिक्चर हाउसफुल है, आप तो ऐसे ही घबरा रहे थे। मैंने कहा कि मैं घबरा नहीं रहा था। मैं तो आप लोगों की चिंता कर रहा था। फिर मुझे दो तीन फोन और आ गए। मुझे समझ नहीं आ रहा था कि पिक्चर को ओपनिंग लगी क्यों है? ऋतिक की लगातार कई पिक्चरें चली नहीं हैं। इसमें एक रोल ऐसा है जिसमें वह रेगुलर हीरो नहीं है, फिर ओपनिंग क्यों लगी? फिर मुझे ध्यान आया कि फिल्म का जब पहला प्रोमो आया था, उसमें ऋतिक एक छोटे से रॉक के ऊपर बैठा हुआ है और उदास है और एक ही शॉट है जिसमें कैमरा ऊपर जा रहा है, जा रहा है, जा रहा है और एक स्पेसशिप बीच में दिखाई देता है। मैंने सोचा कि ये कोई नई बात होगी जो लोगों को पसंद आ गई होगी। गाने हालांकि सब हिट हो चुके थे लेकिन फिर भी किसी हीरो की जब आठ नौ पिक्चरें नहीं चलती हैं तो लोगों ने लिखना शुरू कर दिया, वन फिल्म वंडर ऋतिक रोशन। येसब चिंता तो थी। इसका प्रीमियर भी मैंने नहीं किया था। अपनी एक ही फिल्म का प्रीमियर आज तक मैंने किया वह थी ‘खुदगर्ज’।

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राकेश रोशन
और फिर इसका सीक्वल बनाने का ख्याल कैसे आया? फिल्म सुपरहिट होने के बाद या पहले से योजना थी?
नहीं, मैं फिल्म ‘लॉर्ड ऑफ द रिंग्स’ देख रहा था। पहली फिल्म खत्म की तो दूसरी फिल्म देखने लगा और रात 10 बजे मैंने फिल्म देखनी शुरू की थी, सुबह 6 बजे तक मैंने तीनो फिल्में देख लीं। मुझे लगा कि हम फ्रेंचाइजी तो बनाते हैं लेकिन कहानी को आगे लेकर क्यों नहीं जाते। मैंने सोचा कि जादू उसको पावर तो दे गया क्यों न इसका इस्तेमाल करें। फिर मैंने एक सुपरहीरो फिल्म बनाई और एकदम से उसे सुपरहीरो नहीं बनाया। आहिस्ते आहिस्ते मैंने दर्शकों को भरोसा दिलाया कि ये किरदार सुपरहीरो बन सकता है। वह नदियां लांघता है, पहाड़ों पर कूदता है और दादी ने उसको कसम दे रखी है कि तू बाहर ये नहीं करेगा। और, सर्कस में आग लग जाती है तो उसे बचाना भी है। वह अपना मुंह छुपाने के लिए वहीं पड़े एक मास्क को पहन लेता है।

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कृष 4 - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
अब?
अब तो सोच रहे हैं कि ‘कृष 4’ को कैसे बनाएं। विजुअलाइज सब कर लिया है लेकिन महंगी है फिल्म, तो वही सोच रहा हूं कैसे बनाएं, कैसे रिकवरी होगी क्योंकि मैं नही चाहता कि कोई और नुकसान में जाए। हमेशा मेरी खुशी यही रही कि मेरी फिल्म जो दिखाता है तो उसे भी दो पैसे की कमाई होनी चाहिए।
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राकेश रोशन - फोटो : इंस्टाग्राम
ये हॉलीवुड स्टूडियोज जो ‘शक्तिमान’ बनाने जा रहे हैं, ‘ब्रह्मास्त्र’ बना रहे हैं तो ये लोग भी तो आपके पास आते ही होंगे..
हां, सब आते हैं लेकिन आजकल बिजनेस इतना हो नहीं रहा सिनेमा घरों में। पता नहीं ये कोविड की वजह से या ओटीटी की वजह से ये कुछ मुश्किल कंपटीशन सा हो गया है। आजकल बच्चे हॉलीवुड फिल्में देखते हैं। उसे डिस्कस करते हैं। वो फिल्में बनाते हैं 400-500 मिलियन डॉलर की। हम बनाएंगे दो सौ या तीन सौ करोड़ रुपयों की। वह रिजल्ट हम दे पाएंगे या नहीं दे पाएंगे क्योंकि वह रिजल्ट देने के लिए हजार करोड़ खर्च करना पड़ेगा। हजार करोड़ खर्च करने की आज मेरी ताकत है, रिकवरी की ताकत है क्या, वह सब सोचना पड़ेगा। 

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