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75 Years Of Aag: नायाब निर्देशन, कलात्मक सिनेमैटोग्राफी, मुकेश की आवाज, ऐसे बनी राज-नरगिस की कालजयी फिल्म ‘आग’

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आग - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो , मुंबई

बीती सदी के सबसे बड़े शोमैन कहलाए राज कपूर ने जब अपनी खुद की फिल्म निर्माण कंपनी आरके फिल्म्स खोली तो खुद उन्हें भी अंदाजा नहीं रहा होगा कि एक दिन उनकी ये कंपनी उनके वारिस संभाल ही नहीं पाएंगे। अपने पिता पृथ्वीराज कपूर का नाम रोशन करने के लिए मुंबई शहर में आज से ठीक 75 साल पहले सिनेमा में निर्देशन और निर्माण का एक ऐसा सूरज भी चमका था जिसके आभामंडल ने हिंदी सिनेमा को न सिर्फ एक नई दिशा दी बल्कि सामाजिक सरोकारों से जुड़ी फिल्मों की एक नई गंगा भी बहाई। कपूर खानदान भले आरके फिल्म्स की पहली फिल्म ‘आग’ को भूल चुका हो। भले इस फिल्म की असली रील अब राष्ट्रीय फिल्म संग्रहालय में अपनी सूरत संवरने के इंतजार में हो। लेकिन, सच यही है कि आग में झुलसे एक युवक की दर्द भरी कहानी को सुने जमाने को 75 साल पूरे हो गए। 6 अगस्त 1948 को रिलीज हुई फिल्म ‘आग’ हिंदी सिनेमा को लेकर सरकारी उदासीनता की भी बानगी है। अब न आरके स्टूडियो है और न ही मुंबई शहर में राज कपूर की बतौर निर्माता-निर्देशक बनाई पहली फिल्म का कोई जश्न ही हो रहा है।

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आग का सेंसर सर्टिफिकेट - फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई
राज कपूर की बतौर निर्माता, निर्देशक पहली फिल्म मुंबई शहर तब बंबई हुआ करता था। पृथ्वीराज कपूर का थियेटर में बड़ा नाम था और उनके बड़े बेटे रणबीर राज कपूर ने फिल्मों में कदम रख दिया था। बतौर अभिनेता उसे लोग राज कपूर कहकर बुलाते। अभी 24 साल के भी नहीं हुए थे राज कपूर कि उन्होंने खुद फिल्म निर्देशन की कमान संभालने की अपनी इच्छा पिता के सामने जाहिर की। फिल्म ‘नील कमल’ में राज कपूर के भोले चेहरे पर जमाना फिदा हो चुका था। पिता की अनुमति मिली तो राज कपूर ने पिता की नाटक कंपनी के लिए काम करने वाले लेखक इंदर राज आनंद को अपने साथ लिया और पिता की नाटक कंपनी के नाटकों के लिए संगीत रचने वाले राम गांगुली को भी। फिल्म की कहानी और संगीत पर एक साथ काम शुरू हुआ। राज कपूर को अपने मन मुताबिक फिल्म बनानी थी लिहाजा वह खुद ही निर्माता भी बन गए। हां, बतौर निर्माता उन्होंने अपना नाम रणबीर राज कपूर ही रहने दिया और फिल्म के सेंसर सर्टिफिकेट पर भी उनका यही नाम लिखा है। फिल्म बनी और खूब सराही गई।
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आग - फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई

सिनेमैटोग्राफी की पाठशाला बनी फिल्म ब्लैक एंड व्हाइट में बनी इस फिल्म में सिनेमैटोग्राफर वी एन रेड्डी ने अपना कमाल का हुनर दिखाया है। रेड्डी भारतीय फिल्मों में सिनेमैटोग्राफी का बड़ा नाम रहे। छाया और प्रकाश का उनका अद्भुत संयोजन, कलाकारों के चेहरों के भाव दिखाने के लिए कैमरे का उनके बिल्कुल करीब तक चले जाना और दो एक्सट्रीम क्लोज अप का एक के बाद एक परदे पर आना, सब कुछ बिल्कुल अनोखा था। राज कपूर ने फिल्म ‘आग’ के लिए बेहतरीन टीम संजोई थी। वी एन रेड्डी का काम बाद में दर्शकों ने ‘बैजू बावरा’, ‘कश्मीर की कली’ व ‘पूरब और पश्चिम’ जैसी फिल्मों में भी देखा। लेकिन, उनको सिनेमैटोग्राफी में प्रयोग करने की जो छूट राज कपूर ने फिल्म ‘आग’ में दी, वह एक निर्देशक और एक सिनेमैटोग्राफर की संगत की हिंदी सिनेमा की अद्भुत मिसाल है।

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आग - फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई
खूब गुजरेगी जब मिल बैठेंगे दीवाने दो अभिनेता- निर्देशक टीनू आनंद और निर्माता बिट्टू आनंद के पिता इंदर प्रोगेसिव राइटर्स में शामिल थे, नाम भी तब वह सिर्फ इंदर राज ही लिखा करते थे। उनके पोते सिद्धार्थ आनंद को भी शायद अब अपने बाबा की लिखी ये पहली फिल्म याद न हो लेकिन, इसी ब्लैक एंड व्हाइट फिल्म में लिखा संवाद, ‘खूब गुजरेगी जब मिल बैठेंगे दीवाने दो’, आज तक तमाम विज्ञापनों में घुमा फिराकर इस्तेमाल का जाता है। फिल्म के संवाद बेहद मार्मिक हैं, खासतौर से वह दृश्य जिसमें घर छोड़कर निकला केवल नाम का युवा एक वीरान पड़े थियेटर में अपने माता पिता की याद कर एकल संवाद बोले जा रहा है, बोले जा रहा है, बोले जा रहा है और फिर थियेटर के मालिक के रूप में प्रेमनाथ नजर आते हैं। राजन नाम का यह किरदार केवल को न सिर्फ अपने यहां शरण देता है बल्कि उसे थियेटर कंपनी में अपना साझीदार बना लेता है।
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राज कपूर (आग) - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो , मुंबई
युवाओं के सीने में लगी आग की कहानी
फिल्म ‘आग’ दरअसल उस आग की बात करती है जो देश में फैली बेरोजगारी की युवाओं के सीने में लगी थी। देश तो आजाद हो गया था लेकिन अमीरों के घरों में अब भी बड़े हो रहे बच्चे आजाद नहीं थे। ये आग उन सामाजिक उसूलों की भी बात करती है जिसमें बेटे से अपने पिता की हर बात मानने की उम्मीद रहती है। और, ये आग इस बात की भी है कि आखिर बड़ा होने के बाद माता पिता अपने बच्चों को उनकी पसंद का करियर चुनने में मदद क्यों नहीं करते? यहां मामला एक बड़े सरकारी वकील का है, जिसका बेटा बचपन से ही नाटकों की तरफ आकर्षित हो जाता है।
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शशि कपूर - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो , मुंबई
शशि कपूर की पहली फिल्म में ही कमाल अदाकारी
राज कपूर के छोटे भाई शशि कपूर ने इसी फिल्म से अभिनय की बोहनी की और शुरू की करीब 20 मिनट फिल्म वह अपने कंधे पर उठाए भी रखते हैं। स्कूल जाते समय छोटे से केवल को निम्मी मिलती है। दोनों घर में बिना बताए रात को साथ नाटक देखने जाते हैं।  शशि कपूर यहां जिस तरह का अभिनय किया है, वह देखने लायक है। बालक शशि कपूर ने लंबे लंबे संवाद बिना किसी कट के बोले हैं। बहुत ही उम्दा अभिनय बालक शशि कपूर का। फिल्म में तीन हीरोइनें हैं और तीनों के नाम एक साथ परदे पर सबसे पहले आते हैं। फिर साथी कलाकारों के नाम आते हैं और अंत में लिखा आता है, ‘एंड राजकपूर’। टीम कैसे बनती है, कोई राजकपूर से सीखे। शाहरुख खान ने भले बरसों बाद इस चलन को अपनाने का फैसला किया हो लेकिन क्रेडिट्स में हीरोइनों का नाम सबसे पहले देने का चलन शुरू करने का श्रेय फिल्म ‘आग’ को दिया जा सकता है।
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राजकपूर, कामिनी कौशल - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो , मुंबई
जिंदा हूं इस तरह कि गम ए जिंदगी...
केवल का निम्मी के नाम के साथ जो रिश्ता बनता है, वह फिल्म ‘आग’ की जान है। उसे हर तरफ निम्मी नजर आती है। और, किस्मत देखिए कि उसे अलग अलग निम्मी मिलती भी हैं, लेकिन हर बार प्रेम कहानी का अंजाम वही कि दिल से आवाज आती है, ‘जिंदा हूं इस तरह कि गम ए जिंदगी नहीं, जलता हुआ दिया हूं मगर रोशनी नहीं..’। संजीदा गाना, बेहतरीन बोल और मुकेश की आवाज..। आगे चलकर राज कपूर ने मुकेश को ही अपनी आवाज बनाया और यह भी सच है कि जब मुकेश अचानक इस दुनिया से गए तो फिल्म ‘सत्यम शिवम सुंदरम’ की शूटिंग कर रहे राज कपूर के मुंह से बस इतना ही निकला, ‘मैंने अपनी आवाज खो दी है।’ मुकेश का पार्थिव शरीर जब अमेरिका से भारत लौटा था तो दसवां होने तक राज कपूर ने कोई काम नहीं किया और मुकेश के घर पर ही लगातार बने रहे।

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घिरौंदा - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो , मुंबई
राम गांगुली के साथ नहीं बनी अगली फिल्म
ख़ैर, बात फिल्म ‘आग’ के बारे में हो रही थी। ‘आग’ आज भी एक दर्शनीय फिल्म है। समय का इसकी कहानी पर कोई असर नहीं हुआ है। इसका संगीत अब भी बेहद कर्णप्रिय है। मुकेश के जिस गाने का जिक्र मैंने ऊपर किया, ये वाला गाना बेहजाद लखनवी ने लिखा। बंटवारे के बाद बेहजाद पाकिस्तान चले गए थे और वहां बेहद मुफलिसी के दौर में उनका इंतकाल हुआ। फिल्म में मछुआरों पर फिल्माया गया एक गाना ‘देख चांद की ओर’ सरस्वती कुमार दीपक ने लिखा। फिल्म के संगीतकार राम गांगुली के साथ राज कपूर ने ‘आग’ की रिलीज के साथ ही एक और फिल्म ‘घिरौंदा’ भी बनाने की घोषणा की थी लेकिन बाद में दोनों की पटी नहीं और फिल्म ‘बरसात’ से शंकर-जय किशन को राज कपूर की फिल्मों का लंबे समय तक संगीतकार बनने का मौका मिला। बताते हैं कि ये दोनों इन्हीं राम गांगुली के सहायक हुआ करते थे।

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राज कपूर और नरगिस - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो , मुंबई
आधी फिल्म बीतने के बाद नरगिस और, अब बात फिल्म ‘आग’ की तीनों हीरोइनों की। बचपन में केवल को जो दोस्त निम्मी मिलती है और उसका दिल दुखाकर चली जाती है, उसी के दर्द में तड़पता केवल बार बार निम्मी की तलाश करता है। फिल्म के शुरू में वह कहता भी है कि अगर उसमें तीन कमजोरियां न होतीं तो उसकी कहानी कुछ और होती। और, इन कमजोरियों में शामिल है नाटक से उसका मोह और खूबसूरत लड़कियों की तरफ उसका झुकाव व उन पर भरोसा। सूरत और सीरत के द्वंद्व की इस कहानी के तमाम कलाकारों में इसकी हीरोइन कामिनी कौशल आज भी जीवित हैं। नरगिस की एंट्री आधी फिल्म बीत जाने के बाद होती है लेकिन बंटवारे में अपना सब कुछ खो चुकी एक बेनाम लड़की के तौर पर। जिस तरह फिल्म में उनकी एंट्री होती है, वह दृश्य मौजूदा दौर की हर हीरोइन को अभिनय की पाठ्यपुस्तक के रूप में देखना चाहिए। नरगिस और राज कपूर के दृश्य ही फिल्म को क्लाइमेक्स तक लाते हैं और दोनों के बीच फिल्माया गया एक एक सीन राज कपूर की निराली निर्देशन क्षमता का नायाब नमूना बन जाता है।

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बरसात - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो , मुंबई
चलते चलते...
आर के बैनर का लोगो फिल्म ‘आग’ में नहीं दिखता है क्योंकि तब तक ये बना ही नहीं था। कम लोगों को ही पता होगा कि आरके फिल्म्स का लोगो राज कपूर और नरगिस के एक बेहद रोमांटिक सीन से बाद में फिल्म 'बरसात' से लिया गया। नरगिस और राज कपूर की जोड़ी ने हिंदी सिनेमा को इसके बाद तमाम हिट फिल्में दीं। दोनों के बीच मोहब्बत की आग कैसे लगी होगी, इसे समझना हो तो फिल्म ‘आग’ देखना बहुत जरूरी है। राज कपूर ने इसी फिल्म में निगार सुल्ताना को उनके करियर का सबसे बड़ा ब्रेक दिया और इसी के बाद उनका करियर हिंदी फिल्मों में चल निकला था।

(ये लेख बौद्धिक संपदा अधिकारों के तहत संरक्षित है)
 
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