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Raaj Shaandilyaa Interview: ‘पिताजी को चेक देखकर यकीन ही नहीं हुआ, बोले- राइटिंग में इतना पैसा कहां मिलता है!’

Sat, 28 May 2022 04:44 PM IST
मोहम्मद फायक अंसारी अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
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राज शांडिल्य - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
मायानगरी मुंबई सपनों की वह नगरी है जिसमें किस्मत आजमाने हजारों लोग रोज आते हैं। कुछ के सपने पूरे होते भी हैं। कुछ के सपने सारी उम्र गुजार देने के बाद भी पूरे नहीं होते। इसलिए मां बाप अपने बच्चों को पिक्चर सिनेमा के शौक से दूर ही रखते हैं। वे चाहते हैं कि उनके बच्चे डॉक्टर बनें इंजीनियर बनें और ना कुछ कर पाएं तो रेलवे में ही नौकरी कर लें। अरसे से कॉमेडी शोज लिखते रहे राज शांडिल्य के पिता भी यही चाहते थे। राज शांडिल्य फिल्म ‘ड्रीमगर्ल’ से निर्देशक बने और अब फिल्म ‘जनहित में’ जारी से फिल्म निर्माता बन गए हैं। पिता राजेंद्र शर्मा झांसी में रेलवे में काम करते थे और चाहते यही थे कि बेटे की नौकरी रेलवे में लग जाए तो कहीं भी आना जाना फ्री हो जाएगा।
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राज शांडिल्य - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
राज शांडिल्य कॉमेडी शोज के नंबर वन राइटर रहे हैं। पहले बाहर के लोग तो क्या घर वाले भी सीरियसली नहीं लेते थे कि झांसी जैसे शहर का कोई लड़का मुंबई जाकर सिर्फ लिखकर हजारों रुपये कमा सकता है। लेकिन उन्होंने कभी लेखन को अपना प्रोफेशन बनाने के बारे में सोचा नहीं था। राज शांडिल्य कहते हैं, ‘हमारे परिवार से ज्यादा हमारे भविष्य की चिंता हमारे मोहल्ले वाले और रिश्तेदारों को रहती हैं।’
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ड्रीम गर्ल की टीम के साथ राज शांडिल्य - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
राज बताते हैं, ‘पढ़ाई के साथ साथ मैं लेखन में हाथ आजमा रहा था लेकिन ये बात मैंने कभी अपने पिताजी को नहीं बताई। वह लेखन को शौक मानते थे और कहते थे इससे घर गृहस्थी थोड़े ही चल सकती है। स्कूल और कॉलेज में भजन और कहानी लिखने का शौक था। फिर ये सोचकर लिखता रहा कि इससे लोगों को हंसाता रहूंगा। लेकिन ‘लाफ्टर चैलेंज’ के पहले सीजन ने मेरी सोच बदल दी। मेरा लिखा देखकर लोग हंस रहे थे और इस बात के मुझे पैसे भी मिल रहे थे। यहां से मेरी सोच बदली कि क्यों न इसमें करियर बनाया जाए? ये उन दिनों की बात है जब मैं इंजीनियरिंग कर रहा था।’

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फिल्म जनहित में जारी की टीम - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
राज शांडिल्य इन दिनों के तमाम कलाकारों व लेखकों की तरह इंजीनियरिंग छोड़कर हिंदी सिनेमा में आए। वह बताते हैं, ‘पढ़ाई के दौरान मैं रेलवे में नौकरी के लिए इधर उधर इम्तिहान देने जरूर जाता था लेकिन यह सोचकर नहीं कि मुझे रेलवे में नौकरी मिल ही जाएगी। बल्कि यह सोचकर कर कि अलग अलग शहरों में जाकर अलग अलग लोगों से मुलाकात होगी। घूमने के साथ साथ उनसे कुछ सीखने को मिलेगा और पिताजी को तसल्ली हो जाएगी कि बेटा रेलवे में नौकरी के लिए कोशिश तो कर रहा है। मेरे पिताजी को रेलवे से इतना लगाव था कि उन्हें रेलवे का रूट तक बदलना पसंद नही था। एक बार मेरा आईटी नागपुर में एडमिशन हो गया तो पिताजी ने वहां से नाम कटवा कर भोपाल में इस लिए एडमिशन करवा दिया कि झांसी से भोपाल सीधे रूट में पड़ता है।’
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जनहित में जारी ट्रेलर लॉन्च इवेंट - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
फिर कैसे पता चला पिताजी को कि राज राइटर बन गए हैं? राज शांडिल्य बताते हैं, ''तब तक मेरे पिताजी को पता नहीं था कि मैं मुंबई आ गया हूं। जब मैंने उन्हें अपने पहले चेक के बारे में बताया तो उन्होंने पूछा कि मुंबई क्या कर रहे हो? मैंने कहां कि यहां मैं लेखन का काम कर रहा हूं और मुझे पहला चेक 22 हजार रुपये का मिला है तो उन्हें यकीन ही नहीं हुआ कि सिर्फ लिखकर कोई 22 हजार कमा सकता है। बोले, राइटिंग में इतना पैसा कहां मिलता है। उन्होंने इसकी फोटोकॉपी कराकर फैक्स करने तक को कहा। फिर फैक्स में मेरे नाम का चेक देखकर उन्हें किसी तरह तसल्ली हुई।’
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