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बंटवारे से पहले पृथ्वीराज कपूर ने लिखा था ये नाटक, 75 साल पहले ऐसे पड़ी थी पृथ्वी थिएटर की नींव

Sun, 03 Nov 2019 11:07 AM IST
Mishra Mishra मुंबई टीम, अमर उजाला
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Prithviraj Kapoor - फोटो : मुंबई टीम, अमर उजाला
नेटफ्लिक्स की सीरीज माई नेक्स्ट गेस्ट के हालिया एपिसोड में नजर आए फिल्म अभिनेता शाहरुख खान भले भारत में सिनेमा का उद्भव 30 के दशक को बताते हों, लेकिन सच यही है कि सिनेमा की शुरुआत भारत में उससे कई साल पहले हुई। और, सिनेमा की शुरुआत से लेकर अब तक कोई परिवार अगर अब भी सिनेमा में सक्रिय है तो वह है कपूर खानदान। इस परिवार की सिनेमा में शुरुआत पृथ्वीराज कपूर से मानी जाती है जिन्हें भारत सरकार ने 1972 में सिनेमा के सबसे बड़े राष्ट्रीय सम्मान दादा साहब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित किया।
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ranbir kapoor - फोटो : amar ujala
कपूर खानदान के पहले अभिनेता पृथ्वीराज कपूर की जयंती 3 नवंबर को कपूर परिवार हर साल सादगी से मनाता रहा है। सिनेमा के साम्राज्य पर लगातार राज करते रहे कपूर खानदान के वारिस रणबीर कपूर कहते हैं, “पृथ्वीराज जी के हाथों हमारे परिवार ने सिनेमा घुट्टी में पिया। उनके बनाए रास्ते पर हमने कई बाग लगाए हैं। मेरा बहुत मन करता है कैमरे के पीछे जाने का और उनकी विरासत में एक नया पौधा लगाने का। मुझे इंतजार है श्री 420 या जागते रहो जैसी किसी स्क्रिप्ट का, जो मुझे निर्देशक की जिम्मेदार संभालने को मजबूर कर दे।”
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Prithviraj Kapoor - फोटो : सोशल मीडिया
कपूर परिवार का हर सदस्य पृथ्वीराज कपूर का नाम सुनते ही नतमस्तक हो जाता है। घुमंतू थिएटर चलाने के दौर में वह सिनेमा में तब आए जब सिनेमा भारत में घुटनों के बल चलना सीख रहा था। 22 साल के थे पृथ्वीराज जब वह 1928 में अपनी एक रिश्तेदार से थोड़ा सा कर्ज लेकर फैसलाबाद से बंबई आए। वकालत की पढ़ाई बीच में ही छोड़ वह अभिनेता बने और भारत की पहली बोलती फिल्म आलम आरा में काम करने से पहले वह एक मूक फिल्म सिनेमा गर्ल में भी काम कर चुके थे। मुगले आजम में अकबर का किरदार हिंदी सिनेमा के कालजयी किरदारों में शुमार है। महज 38 साल की उम्र में उन्होंने समंदर किनारे एक आलीशान पृथ्वी थिएटर खड़ा कर दिया था।

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shashi kapoor
इसी पृथ्वी थिएटर में एक मुलाकात के दौरान शशि कपूर ने बताया था, “पृथ्वी थिएटर जनता की आवाज की प्रतिध्वनि है। मेरे पिता की तब हर लेखक से एक की दरख्वास्त होती थी कि जो भी लिखो वो ऐसा लिखो कि उसमें आज का भारत दिखे। इसका दर्द दिखे। इसकी सोबहत दिखे और इसकी मुश्किलात दिखें। जब तक हम इन पर खुलकर बात नहीं करेंगे, इनका हल निकाल नहीं पाएंगे।” कम लोगों को ही पता होगा कि बंटवारे से दो साल पहले पृथ्वीराज कपूर ने एक नाटक तैयार किया था दीवार, और इस नाटक में वह सब कुछ बयां कर दिया गया था जो बंटवारे के वक्त बाद में सबके सामने हकीकत बनकर आया।
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prithviraj kapoor
पृथ्वी थिएटर पर लगातार शोज करने वाले मशहूर नाट्य निर्देशक ओम कटारे इसके आगे की कहानी बताते हैं, “दीवार दरअसल भारतीय रंगमंच की सबसे मशहूर चतुष्पदी का पहला नाटक है। बंटवारे से ठीक पहले पृथ्वीराज जी ने एक और नाटक रचा, पठान जिसमें हिंदुओं और मुसलमानों के बीच तब बढ़ रही नफरत को पाटने की बात की गई थी। इसके अलावा गद्दार और आहुति भी उसी दौरान लिखे गए। आहुति भारतीय रंगमंच का पहला नाटक है जिससे स्त्री विमर्श की शुरुआत होती है। यह पहला भारतीय नाटक है जिसमें महिलाओं के अधिकारों की बात की गई और उनके शोषण के खिलाफ आवाज उठाई गई।”

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