पूजा कुमार अमेरिका फिल्मों का चर्चित भारतीय चेहरा हैं। वह साउथ में फिल्में करती रही हैं और जल्द ही कमल हासन के साथ हिंदी में नजर आएंगी। पूजा की मां लखनऊ से हैं और पिता देहरादून से। वह हर साल भारत आती हैं। इन दिनों वह फिल्म 'विश्वरूपम-2' के सिलसिले में यहां हैं। इस फिल्म और अमेरिका में भारतीय फिल्मों की पहचान को लेकर पूजा कुमार से रवि बुले की विशेष बातचीत...
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pooja kumar and kamal haasan
-आप अमेरिका में रहती हैं। वहीं की फिल्में करती हैं। कमल हासन की विश्वरूपम में कैसे आईं? - उन्होंने मेरी कोई अमेरिकी फिल्म देखी और मैनेजर से कॉन्टेक्ट किया। अमेरिकी मैनेजर ने मुझसे पूछा कि क्या आप उन्हें जानती हैं, वह एक फिल्म में आपको लेना चाहते हैं। मैंने कहा बिल्कुल जानती हूं और उनके साथ काम करूंगी। फिर कमल सर से बात हुई तो उन्होंने बताया कि हम न्यूयॉर्क, लंदन और इंडिया में शूटिंग कर रहे हैं। मैंने कहा कि मुझे तमिल नहीं आती तो बोले कोई बात नहीं, हम फिल्म को दो भाषाओं तमिल और हिंदी में बना रहे हैं। आप सब समझ जाएंगी। इसके बाद एक मुलाकात में उन्होंने पांच मिनट मुझे रू-ब-रू देखा और सब फाइनल हो गया।
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pooja kumar
-'विश्वरूपम-2' भारत में स्थित है। पिछली फिल्म से कहानी कैसे आगे बढ़ी है? - पहले भाग में जो विलेन (राहुल बोस) था, वह अमेरिका से भाग कर भारत आ गया है। कमल सर और मैं उसके पीछे हैं। विलेन ने बम अलग-अलग शहरों में लगाए थे उनमें से एक भारत में अभी फटने वाला है। आप पहली फिल्म में देख चुके हैं मैं न्यूक्लियर साइंटिस्ट हूं। इंडिया में बम को पानी के अंदर छुपाया गया है। मैं उसे ढूंढने में कमल सर की मदद करके डिफ्यूज करती हूं। मैंने अंडरवाटर एक्शन सीन खुद किए क्योंकि स्कूबा डाइविंग जानती हूं।
-अमेरिका में रहते हुए आप इंडियन सिनेमा से कितना कनेक्ट रहती हैं? - बहुत अधिक। पैदाइश भले अमेरिका में हुई परंतु डीएनए तो इंडियन है।
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pooja kumar
-वहां भारतीय और अमेरिकी दर्शकों द्वारा इंडियन फिल्मों को कैसे देखा जाता है? - हिंदी की सितारों वाली फिल्में ज्यादातर अमेरिकी-भारतीय देखते हैं। अमेरिकी दर्शकों का एक वर्ग इंडियन फिल्मों में दिलचस्पी लेता है लेकिन उन्हें इंडिपेंडेंट सिनेमा की तलाश रहती है। उन लोगों को आज भी यह बात हैरान करती है कि आखिर कैसे इंडियन फिल्मों में कहानी के बीच में गाना शुरू हो जाता है। डांस होने लगता है।
-क्या वह इस नाच-गाने वाली पहेली को सुलझाना चाहते हैं? - मुझे नहीं लगता कि वे इसे सुलझा पाएंगे क्योंकि दोनों की संस्कृतियों में फर्क है। यही बात देखिए कि हमारे यहां शादियां रंग-बिरंगी और संगीत से सजी होती हैं। जबकि वहां शादियां कम होती जा रही हैं। इतना जरूर है कि इंडिया में बन रही रीयलिस्टिक फिल्मों से धीरे-धीरे वे कनेक्ट हो रहे हैं। जैसे वहां 'लंचबॉक्स' बहुत पसंद की गई।
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pooja kumar
-भारत में हर साल ऑस्कर पुरस्कार का सवाल खड़ा होता है। कई लोग मानते हैं कि ऑस्कर भारतीय फिल्मों को दुनिया में नई पहचान देगा।
- ऑस्कर को पहचान से नहीं जोड़ना है। हम लोगों को बस यह देखना है कि कहानियां रीयलिस्टिक हों, उन्हें देख कर कर आनंद आए। फिल्म बनाने का उद्देश्य यही होना चाहिए। यह लक्ष्य नहीं होना चाहिए कि ऑस्कर मिल जाए। हमारी फिल्मों में तर्क का अभाव है। देखते-देखते हीरो-हीरोइन यहां से वहां पहुंच जाते हैं। एक चीज करते-करते दूसरी करने लगते हैं। अगर हम कहानियों पर ध्यान देना शुरू करें और किरदार अच्छे से गढ़ें तो इससे हमारा सिनेमा आगे बढ़ेगा।
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pooja kumar
-हम काफी सिनेमाई छूट लेते हैं। ऐसा क्यों है कि अमेरिका समेत कोरियाई-चीनी सिनेमा भी हमसे आगे दिखता है? - वे किरदार और कहानी पर ध्यान केंद्रित करते हैं। हमारी फिल्में संस्कृति से जुड़ी हैं और हमें किसी चीज या सिलसिले का खत्म हो जाना पसंद नहीं है। जैसे आपके घर मेहमान आते हैं तो जाते वक्त उनसे कहा जाता है, फिर आइए या हम फिर मिलेंगे। जबकि पश्चिमी में आके-बाय चलता है। बात खत्म। शायद यही वजह है कि वे लोग कहानी को निर्णायक मोड़ पर खत्म कर देते हैं और हम कहानी का अंत नहीं कर पाते। यह हमारी कमजोरी है। हमारी संस्कृति में किसी चीज की विदाई नहीं है तो फिल्मों में भी कहानी का सही अंत नहीं हो पाता। जबकि हमारे यहां बहुत अच्छी कहानियां हैं। एक और समस्या हमारे यहां लेखकों की खराब स्थिति है। उन्हें न सम्मान दिया जाता है और न सुविधाएं।
-भारत के प्रति अमेरिका का नजरिया बदला है। वहां रहते हुए इस बदलाव को कैसे महसूस करती हैं? - पहले तो वहां लोगों को पता नहीं होता था कि भारत कहां है। उन्हें लगता था कि सारे भारतीय गरीब होते हैं। उनके पास घर तक नहीं होते। लेकिन इंटरनेट ने बहुत कुछ बदल दिया। उसके माध्यम से भारत की नई तस्वीर दिखी है। 1990 के दशक और उसके बाद बहुत सारे आईटी प्रोफेनशल भारत से वहां गए। वे भारतीय सिनेमा इंटरनेट पर ही देखते थे और उन्होंने अमेरिका में इसे लोकप्रिय बनाने में बड़ा रोल निभाया।
-अमेरिकी फिल्मों में आतंकवाद से लड़ाई खूब दिखती है। हॉलीवुड फिल्में मानवता पर बड़े संकट दिखाती हैं। सुपर हीरो बचाते हैं। क्या अमेरिकी मानसिकता में कोई बड़ा डर बैठा है, जो ऐसी फिल्में खूब बनती और देखी जाती हैं? - ऐसा नहीं है। मुझे लगाता है कि इस तरह का सिनेमा कॉमिक्स बुक के कारण है। जो वहां बहुत लोकप्रिय हैं। 1860 के दशक से जब अमेरिका में गृहयुद्ध हुआ, फिर दो विश्व युद्ध हुए, वियतनाम से युद्ध हुआ तब से वे लोग कॉमिक बुक्स पढ़ रहे हैं जिनमें युद्ध और मानवता पर संकट दिखाए जाते हैं। इन कॉमिक्स के नायक सुपर हीरो होते हैं जो लोगों को मुश्किल हालात से बचाते हैं। अत: वे लोग इन महानायकों से खुद को जोड़ कर देखते हैं। यह कहना सही नहीं कि उनके मन में आतंकवाद को लेकर कोई गहरा डर है, जो फिल्मों