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प्रधानमंत्री मोदी की बायोपिक की कहानी कितनी सच्ची, कितनी काल्पनिक

Wed, 03 Apr 2019 12:17 PM IST
विजय जैन एंटरटेनमेंट डेस्क, अमर उजाला
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PM Modi biopic poster - फोटो : file photo

कश्मीर के बर्फीले इलाके में सैनिकों की टुकड़ी के साथ पुल पर सबसे आगे एक व्यक्ति हाथ में तिरंगा उठाए चल रहा है, यह संवाद बोलने से ठीक पहले उस व्यक्ति पर चरमपंथी गोलियों की बौछार करते हैं। सैनिक उनपर जवाबी कार्रवाई करते हैं और वह व्यक्ति घुटनों के बल बैठ जाता है मगर तिरंगे को झुकने नहीं देता है।
यह ढाई मिनट के फिल्मी ट्रेलर का सबसे दमदार सीन है और हाथ में झंडा उठाए वह व्यक्ति प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हैं। आम चुनावों से पहले इस फिल्म ने देश में राजनीतिक तूफान खड़ा कर दिया है।

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PM Modi biopic poster - फोटो : amar ujala

लोकसभा चुनावों के पहले चरण की वोटिंग से ठीक पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की बायोपिक 'पीएम नरेंद्र मोदी' को सिनेमाघरों में रिलीज करने की योजना है। 05 अप्रैल को इसकी रिलीज डेट रखी गई है लेकिन इससे पहले विपक्षी पार्टी कांग्रेस ने इस फिल्म की रिलीज पर कड़ी आपत्ति जताई है। 

पार्टी का आरोप है कि इसका निर्माण भाजपा ने करवाया है और वो इसे पार्टी की ओछी राजनीति करार दे रही है। हालांकि फिल्म से भारतीय जनता पार्टी से किसी तरह से जुड़ी नहीं है लेकिन इसके मोदी का किरदार निभा रहे विवेक ओबेरॉय बीजेपी समर्थक रहे हैं। इस महीने की शुरुआत में ट्रेलर लॉन्च के मौके पर एक सवाल के जवाब में उन्होंने पार्टी के एक चुनावी नारे, 'मोदी है तो मुमकिन है' को दोहराया था।

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modi biopic - फोटो : social media

फिल्म प्रोमोशन से जुड़े कई कार्यक्रमों में भाजपा के वरिष्ठ नेता शिरकत करते नजर आए हैं। निर्वाचन आयोग इस बात की जांच कर रहा है कि फिल्म रिलीज से आचार संहिता का उल्लंघन तो नहीं हो रहा है। फिल्म के प्रोड्यूसर ने आयोग से कहा है कि इसके निर्माण में उनका पैसा लगा है। लेखक और निर्माता संदीप सिंह ने एक इंटरव्यू में कहा कि वो "एक महान व्यक्तित्व" की कहानी देश को बताना चाहते हैं ताकि लोग "इससे प्रेरणा ले सकें।"
उन्होंने बीबीसी से कहा, "मुझे राजनीति, राजनेताओं या फिर किसी भी पार्टी से कोई लेना-देना नहीं है, अगर वो (विपक्षी राजनेता) एक फिल्म से डरते हैं तो क्या वो अपने काम के प्रति आश्वस्त नहीं हैं जो उन्होंने अपने देश और अपने राज्यों के लिए किया है।"

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पीएम मोदी बायोपिक - फोटो : इंस्टाग्राम

अभी तो फिल्म का ट्रेलर ही लॉन्च हुआ है, सिनेमाघरों में फिल्म का रिलीज होना बाकी है, इससे पहले ही कुछ आलोचक इसे प्रोपेगेंडा मूवी करार दे रहे हैं। हिंदुस्तान टाइम्स के फिल्म आलोचक राजा सेन ने बीबीसी से कहा, "फिल्म रिलीज की टाइमिंग इसे संदिग्ध बनाती है. जनवरी में इसकी शूटिंग शुरू हुई और अप्रैल में यह रिलीज हो रही है। चुनावों से पहले इसे रिलीज करना (मोदी की) छवि को भुनाने की कोशिश है और फिल्म की यह भी कोशिश होगी कि वो उस छवि का प्रचार करे जो वो चाहती है।" प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बारे में दावा किया जाता है कि वो बचपन में रेल गाड़ियों में चाय बेचते थे और वहां से उन्होंने देश के प्रधानमंत्री पद तक की यात्रा की है। वो दक्षिणपंथी हिंदू संगठन आरएसएस से भी जुड़े रहे हैं और 13 साल तक गुजरात के मुख्यमंत्री भी रहे। उनकी व्यक्तिगत अपील और सख्त हिंदू राष्ट्रवादी नेता की छवि ने पार्टी को लोकप्रियता दिलाई है।

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modi biopic - फोटो : social media

कई आलोचकों को ट्रेलर का वो सीन चौकाता है जिसमें नरेंद्र मोदी 2002 में हुए गुजरात के दंगों के बाद परेशान और दुखी दिख रहे हैं। दंगों में मारे गए अधिकतर मुसलमान थे। दंगों के वक्त नरेंद्र मोदी राज्य के मुख्यमंत्री थे और उन पर आरोप है कि उन्होंने इसे रोकने के लिए उचित कदम नहीं उठाए थे।
इसके बाद अमरीका ने उन्हें वीजा भी देने से इनकार कर दिया था। हालांकि 68 साल के मोदी हमेशा इन आरोपों को गलत बताते रहे हैं। पत्रकार और 2013 में मोदी की जीवनी लिखने वाले नीलांजन मुखोपाध्याय कहते हैं, "यह मोदी के जीवन की एक काल्पनिक कहानी है।

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नीलांजन मुखोपाध्याय ने मोदी पर जो किताब लिखी है उसका नाम है 'नरेंद्र मोदीः द मैन, द टाइम्स।' वो कहते हैं कि जिस सीन में नरेंद्र मोदी सैनिकों के साथ हाथों में तिरंगा लिए चरमपंथियों का मुकाबला कर रहे हैं, वो पार्टी की मौजूदा राजनीतिक भावना से उनके अतीत को जोड़ने की कोशिश कर रहा है। वो कहते हैं, "इसके विपरीत उन पर आरोप लगे हैं कि दंगों के दौरान मुख्यमंत्री कार्यालय ने मुश्किल घड़ी में सही कदम नहीं उठाए।"
1992 में मोदी बतौर बीजेपी कार्यकर्ता तत्कालीन पार्टी अध्यक्ष मुरली मनोहर जोशी के साथ उस दक्षिण से उत्तर तक चली उस यात्रा में शामिल हुए थे जिसका समापन कश्मीर घाटी में तिरंगा फहराने के साथ हुआ था। मुखोपाध्याय ने कहा कि इस काफिले पर फायरिंग भी हुई थी मगर पंजाब में सिख चरमपंथियों की ओर से।
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वो कहते हैं कि पाकिस्तान विरोधी भावना और कठोर कश्मीर नीति मोदी और बीजेपी के चुनाव अभियान के केंद्र में है। ऐसे में प्रधानमंत्री को कश्मीर में चरमपंथ के खिलाफ जंग में आगे खड़ा दिखाने से देश में काफी लोगों पर असर पड़ेगा।
"वर्तमान के हिसाब से ढालने के लिए उनके इतिहास को बदला जा रहा है।" निर्माता संदीप सिंह ने माना कि भले ही इस फिल्म के घटनाक्रम सत्य घटनाओं पर आधारित हैं मगर उन्हें "थोड़ा सा काल्पनिक रूप दिया गया है।" उन्होंने कहा, "हमें यह सुनिश्चित करना था कि दर्शकों को परिस्थिति, दृश्य, फ़िल्म और कैरक्टर सब पसंद आएं।"


 

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modi biopic - फोटो : amar ujala
कांग्रेस और अन्य पार्टियों ने तर्क दिया है कि फिल्म को चुनाव के दौरान रिलीज नहीं किया जाना चाहिए। इस फिल्म के अलावा 10 एपिसोडों वाली 'मोदी: जर्नी ऑफ अ कॉमन मैन' स्ट्रीमिंग प्लैटफॉर्म इरोज नाऊ पर अप्रैल में रिलीज होने वाली है। वेब सीरीज और फिल्म पीएम नरेंद्र मोदी इस तरह की अकेली कृतियां नहीं हैं। 
ऐसी कई फिल्में बनी हैं जो स्पष्ट तौर पर राजनीतिक हैं और वोटों पर असर डाल सकती हैं। मोदी से पहले प्रधानमंत्री रहे मनमोहन सिंह के जीवन पर आधारित "दि ऐक्सिडेंटल प्राइम मिनिस्टर" इसी साल जनवरी में रिलीज हुई थी और इसकी कड़ी आलोचना भी हुई थी। इसे कुछ लोगों ने कांग्रेस की छवि पर प्रहार के तौर पर देखा।
एक और फिल्म- उरी- दि सर्जिकल स्ट्राइक में भारत के 2016 के उस कथित सैन्य अभियान का नाट्य रूपांतरण दिखाया था जिसे आर्मी बेस पर हमले के बाद पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर में अंजाम दिया गया था। इस देशभक्ति वाली फिल्म का मकसद भी मोदी की राष्ट्रवादी छवि में इजाफा करना था।

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इस फिल्म के जारी होने के छह हफ्ते बाद भारत ने कश्मीर के पुलवामा में सुरक्षाबलों पर एक और हमला होने के बाद पाकिस्तान में हवाई हमले किए थे। अब बीजेपी के समर्थकों के बीच 'सर्जिकल स्ट्राइक' एक नारा बन गया है। बीते गुरुवार को अपनी एक रैली में प्रधानमंत्री ने कहा कि उनके अंदर ही "जमीन, हवा और अंतरिक्ष में सर्जिकल स्ट्राइक करने की हिम्मत थी।" मगर फिल्म निर्माता सत्ताधारी सरकार की ही खुशामद में नहीं जुटे हैं. 'माई नेम इज रागा' एक ऐसी फिल्म है जो मोदी के मुख्य प्रतिद्वंद्वी और कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के जीवन के बारे में है। फिल्म के निर्देशक इसे एक 'कमबैक' यानी शानदार वापसी की प्रेरक कहानी के रूप में प्रचारित कर रहे हैं। ताकतवर क्षेत्रीय राजनेताओं पर भी इस साल कई फिल्में आईं। दशकों तक भारत की फिल्म इंडस्ट्री पर सेंसर बोर्ड का नियंत्रण रहा था और अति राजनीतिक फिल्में कम ही बना करती थीं। 
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पीएम मोदी बायोपिक - फोटो : इंस्टाग्राम
मगर सेन कहते हैं कि हाल के महीनों में जिस तरह से अचानक ऐसी फिल्में आई हैं यह बात 'बेहद अनोखी' है। सेन बताते हैं कि उनकी नजर में पीएम नरेंद्र मोदी जैसी फिल्मों का भले ही शहरी लोग मज़ाक उड़ा लें और मीडिया उनकी आलोचना कर ले मगर "ट्विटर पर वो ही अकेले नहीं हैं जो वोट देते हैं।"
वह कहते हैं, "मुख्य बात यह है कि शहरों से बाहर के या फिर देश के कम शिक्षा वाले हिस्सों में रहने वाले लोग अतिश्योक्ति भरे फिल्मी नजारे से प्रभावित हो सकते हैं।""क्योंकि लोगों के बीच यह धारणा है कि जो बात सच न हो, वह फिल्मों ने नहीं दिखाई जा सकती।"
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