पल्लवी जोशी
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो , मुंबई
‘कश्मीर फाइल्स’ से पहले आप लोग 'द ताशकंद फाइल्स' लेकर आए, इस फिल्म में भी ऐसी घटनाओं का जिक्र किया गया जिसके बारे में लोग बात करने से कतराते हैं, ऐसे संवेदनशील विषय पर फिल्म बनाने की प्रेरणा कहां से मिलती है?
पता नहीं, इसका जवाब देना सही होगा या नहीं, लेकिन मैं दे देती हूं। एक फिल्मकार के तौर पर हमारी सोच यही रहती है कि सिनेमा के माध्यम से ऐसे विषय को सामने लाना चाहिए, जो अछूते हों। लेकिन हमारे यहां के फिल्मकार सिर्फ औसत फिल्में बनाने के पीछे भागते हैं। हमारे यहां यहां इतनी सारी प्रतिभाएं भरी पड़ी हैं, आज के फिल्मकार उनका इस्तेमाल क्यों नहीं करते। लोग स्तरीय फिल्में बनाना भूल गए हैं। पहले तो ऐसा नहीं था, पहले के दौर की राज कपूर की फिल्में, देवानंद की फिल्में, राजेश खन्ना की फिल्में कमर्शियल होते हुए भी सार्थक होती थीं। उनमें सामाजिक सरोकार की कुछ ना कुछ बातें अवश्य ही होती थीं, लेकिन आज के दौर की फिल्में देखने के बाद तो ऐसा प्रतीत ही नहीं होता है कि सब लोग खुशहाल हैं और महलों में रहते हैं, लंदन और न्यूयॉर्क में जाकर बसते हैं। जैसे हमारे यहां की जैसे समस्याएं ही खत्म हो गई हैं। ये महलों में रहने वाले किरदार भारत की बानगी नहीं हैं।