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Om Raut Exclusive: ‘जुरासिक पार्क’ देख डायरेक्टर बनने का किया फैसला, ‘आदिपुरुष’ पूरी रामकथा नहीं है

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ओम राउत - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
महाराष्ट्र के एक सेनानी की गाथा को दुनिया भर में ‘तानाजी द अनसंग वॉरियर’ के नाम से पहुंचा देने वाले निर्देशक ओम राउत अब भगवान राम की वह गाथा बनाने निकले हैं जिसमें मर्यादा पुरुषोत्तम से पहले वह हैं ‘आदि पुरुष’। इरफान खान के साथ बाल कलाकार के तौर पर अपना करियर शुरू करने वाले ओम राउत ने इस मेगा बजट फिल्म और अपनी सिने यात्रा को लेकर ये एक्सक्लूसिव बातचीत की पंकज शुक्ल से।
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ओम राउत - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
ओम, सिनेमा ने आपको सबसे पहले कब प्रभावित किया और ऐसा क्या हुआ आपकी आंखों के सामने कि आपने सिनेमा को ही अपना जीवन मान लिया?

सिनेमा मेरा सपना बचपन से रहा। लेकिन, इसको मूर्तरूप देने की मैंने ठानी निर्देशक स्टीवन स्पीलबर्ग की फिल्म ‘जुरासिक पार्क’ देखने के बाद। मुझे लगा कि ये जो परदे पर डायनासोर चल रहे हैं, उन्हें वैसे तो बनाना मुमकिन नहीं है लेकिन क्या ये तकनीक होगी जिससे ये सब भी हो सकता है। तो मैंने फिल्मकार बनने से पहले इंजीनियर बनने का फैसला किया और वह सब सीखा जो सिनेमा में मेरे काम आ सके। इंजीनियर कौन होता है? वही ना जो किसी समस्या का सीढ़ी दर सीढ़ी हल तलाशता है। यही काम एक निर्देशक का है। हम अपनी समस्या कहानी के तौर पर पहले सोच लेते हैं, फिर उसे परदे पर फिल्म के तौर पर पेश कर देना ही हमारी ही बनाई इस समस्या का हल है।
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तानाजी द अनसंग वॉरियर - फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई
इंजीनियरिंग के बाद अमेरिका जाकर सिनेमा सीखना कितना काम आया?

अमेरिका मैं इसी मकसद से गया था कि लौटकर यहां ‘जुरासिक पार्क’ जैसी भव्य फिल्में बना सकूं। वहां गया तो था पढ़ाई करने लेकिन सिनेमा पढऩे के बाद वहां नौकरी भी मिल गई तो कुछ दिन वहां रहकर मैंने जिंदगी जीने का उनका नजरिया भी सीखा। काम करने में उनका समर्पण सीखा। साल 2010 तक मैंने वहां खूब काम किया और फिर वहां से वापस भारत लौटा। मुझे तो ये समझ आता है कि सिर्फ बेवकूफ लोगों को किसी तरह के प्रशिक्षण की जरूरत नहीं होती। मेरी ट्रेनिंग ही मेरी नींव का पत्थर बनी। आज जो कुछ मैं कर पा रहा हूं सब उसी सीख के कारण।

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तानाजी द अनसंग वॉरियर - फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई
सीख तो आपको अभिनेता इरफान खान से भी मिली होगी। आप दोनों के ही करियर की शुरुआती फिल्म रही ‘करामाती कोट’…

उफ़..! क्या किस्सा छेड़ दिया आपने। मेरे रोंगटे खड़े हो गए हैं। मैं बचपन से ही थिएटर करता था और तभी अजय कार्तिक सर ने बोला कि आ जाओ फिल्म करते हैं लीड रोल है। तब मुझे लीड रोल वगैरह तो समझ आता नहीं था लेकिन मुझे सिनेमा समझना था तो मैं पहुंच गया। वहां इरफान खान मिले। इरफान खान होने का मतलब क्या होता है ये उनका काम देखकर समझ आया। मेरे और उनके साथ में सीन नहीं थे। उनका भी काम बहुत ज्यादा नहीं था लेकिन लाइव ट्रैफिक में जिस तरह उन्होंने फिल्म में वह सड़क पार करने का सीन किया है, वह उनका अपनी कला पर नियंत्रण और खुद पर भरोसा दिखाता है। इरफान बहुत ही सहज और सरल इंसान शुरू से रहे हैं।
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तानाजी द अनसंग वॉरियर - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
आपने भारत लौटने के बाद सैटेलाइट के जरिए सिनेमा वितरित करने वाली कंपनी यूएफओ में भी सीनियर पोजीशन पर काम किया और फाइनली ‘तानाजी’। तकनीक और कहानी के इस संयोग के बारे में कुछ बताइए?

मैं भारत में आत्मनिर्भर सिनेमा बनाना चाहता हूं जिसके लिए हमें कहीं और न जाना पड़े।  ‘तानाजी’ की परिकल्पना भी यही है। मैंने इस फिल्म की कहानी पर बहुत विस्तार से काम किया। हर सीन की पूरी चित्रकथा तैयार की। ये काम कोई डेढ़ दो साल तक चला। फिर मैं इसे दिखाने अजय सर के पास गया। उन्होंने सब कुछ सुना और समझा। वह यह भी समझ पाए कि इस तरह के सिनेमा के लिए उनका बतौर निर्माता भी फिल्म में शामिल होना जरूरी है। उन्होंने मुझसे बस इतना कहा, ‘जो कुछ भी तुमने मुझे ये समझाया है, ये सब मुझे परदे पर दिखना चाहिए।’
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लोकमान्य - फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई
आपने बतौर निर्देशक अपनी पहली फिल्म ‘लोकमान्य’ बनाई, दूसरी ‘तानाजी’ और अब ‘आदिपुरुष’। क्या बचपन में सुनी सारी कहानियां आप एक एक करके बना रहे हैं?

मेरे पिता जी (भरतकुमार राउत) महाराष्ट्र टाइम्स के संपादक रहे, राज्यसभा सदस्य रहे। माता जी (नीना राउत) ने भी मराठी टेलीविजन के लिए बहुत काम किया है। मैंने जो कुछ सीखा इन्हीं दोनों से सीखा है। दोनों के आशीर्वाद से सीखा। मेरा बचपन हिंदुस्तानी इतिहास के तमाम किरदारों की कहानियां पढ़ते सुनते बीता। अब मैं ये कहानियां दूसरों को सुनाना चाहता हूं और मेरा इन्हें सुनाने का माध्यम सिर्फ सिनेमा ही है।
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आदिपुरुष - फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई
‘आदिपुरुष’ की परिकल्पना का आधार क्या है? परदे पर राम बनने की कोशिशें अरुण गोविल के बाद तमाम कलाकारों ने कीं, प्रभास में आपको ऐसा क्या दिखा जो राम जैसा है?

पहले तो मैं ‘आदिपुरुष’ के बारे में बताता हूं। ये राघव का नाम है। श्रीराम का नाम है। उनका जीवन चरित्र ऐसा है कि पूरी रामचरित मानस लिखनी पडी। मुझमें ऐसी सामर्थ्य नहीं है कि ये पूरी कथा मैं दोहरा पाऊं। मैंने इस गाथा का एक अध्याय चुना है जिससे कि लोगों को उनकी विचारधारा का ज्ञान हो सके। यह राघव के जीवन की एक घटना है। प्रभास को इस चरित्र ने खुद चुना है। लोग कहते हैं कि वह अखिल भारतीय सितारे हैं। लेकिन मुझे उनकी देहयष्टि, उनका शरीर सौष्ठव और उनकी भाव भंगिमाएं इस चरित्र के लिए बिल्कुल उचित लगीं।
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आदिपुरुष - फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई
और, उनकी आखें? सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ की ‘राम की शक्ति पूजा’ में जिनका विवरण है?

बिल्कुल। वह अपने आप पर भरोसा कि 108वां कमल कम है तो मां तो मुझे राजीव नयन कहती हैं। ये नयन ही इस कमल की कमी पूरी कर देगा। क्या भाव है, अहा! प्रभास की आखें ऐसी ही हैं। उनमें ममता और आक्रोश दोनों दिखता है, जब जहां जिसकी जरूरत हो। प्रभास को इस चरित्र में लेने का यही सबसे बड़ा कारण भी है और कारक भी। बाकी चरित्रों के कलाकारों का भी हम धीरे धीरे नाम खोलते जाएंगे। जैसे अभी सैफ अली खान कहानी के मुख्य खलनायक के तौर पर आ चुके हैं। फिल्म ‘आदिपुरुष’ की तकनीकी टीम मेरी पूरी तकरीबन वही रहेगी जिसने मेरे साथ ‘तानाजी’ में भी काम किया।

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