फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

EXCLUSIVE: नवाजुद्दीन सिद्दीकी से मुलाकात, बोले- ‘साउथ वाले आंखें चौंधिया देते हैं, ये सिनेमा मुझे समझ नहीं आता’

विज्ञापन
1 of 8
नवाजुद्दीन सिद्दीकी - फोटो : अमर उजाला, मुंबई

नवाजुद्दीन सिद्दीकी ने मुंबई में गुरबत और शोहरत, दोनों दिन देखे हैं। वह दुनिया के इकलौते अभिनेता हैं जिनकी आठ फिल्में कान फिल्म फेस्टिवल तक पहुंचीं। अपने किरदारों को लेकर लगातार प्रयोग करते रहने वाले नवाजुद्दीन अपनी अगली फिल्म ‘हीरोपंती 2’ में एक ऐसा किरदार कर रहे हैं जिसका नाम ही लैला है। नवाजुद्दीन सिद्दीकी के निजी जीवन में भी सब कुछ ठीक ठाक हो चला है। हाल ही में उन्होंने मुंबई में एक आलीशान बंगला भी बनवाया है। हिंदी सिनेमा में कमजोर पड़ती कहानियों, दक्षिण भारत की फिल्मों के हिंदी में बढ़ते दबदबे और अपने अभिनय पर अपने गांव बुढ़ाना के असर पर नवाजुद्दीन सिद्दीकी से ‘अमर उजाला’ के सलाहकार संपादक पंकज शुक्ल ने ये खास मुलाकात की।

विज्ञापन

2 of 8
नवाजुद्दीन सिद्दीकी - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
हां, मेरे किरदार में एक ‘लहर’ है
फिल्म ‘हीरोपंती 2’ में मैंने अपने अभिनय के साथ नया प्रयोग किया है। इस किरदार में एक ‘लहर’ है जिसे आप स्त्रैण्य गुण कह रहे हैं। किरदार का नाम इसीलिए लैला है। मेरा मानना है कि एक अभिनेता को कभी प्रयोगों से नहीं घबराना चाहिए। अगर मैं अपने किरदारों के साथ प्रयोग नहीं करूंगा तो मैं रुक जाऊंगा और एक रचनात्मक व्यक्ति की नियति लगातार चलते रहना है। मेरे पास आने वाली तमाम कहानियों से मैं जानबूझकर ऐसे किरदार ही चुनता हूं जो मेरे भीतर के अभिनेता क लिए एक चुनौती पेश कर सकें। ऐसा नहीं कि मैं जो भी किरदार करता हूं, वैसे पहले किसी ने किए नहीं। सदाशिव अमरापुरकर भी ऐसा किरदार कर चुके हैं लेकिन मैं यही कोशिश करता हूं कि मैं जब अभिनय करूं तो वह किरदार मेरी सोच जैसा हो।
विज्ञापन

3 of 8
नवाजुद्दीन सिद्दीकी - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
दक्षिण का सिनेमा मुझे समझ नहीं आता
लोग अगर दक्षिण भारतीय फिल्में देख रहे हैं तो इसमें उन्हें कुछ न कुछ अच्छा ही लगता होगा। मुझसे पूछें तो मुझे इस तरह का दक्षिण भारतीय सिनेमा समझ नहीं आता। मैंने भी दक्षिण भारतीय फिल्में की हैं लेकिन ये चकाचौंध वाला सिनेमा मेरा सिनेमा नहीं है। मैं किरदारों पर ध्यान देता हूं। अभी जो फिल्में वहां की आ रही हैं, वे घटनाओं पर ध्यान देने वाली फिल्में हैं जिसमें हर पल दर्शकों को घटनाओं से विस्मित कर देने की कोशिश रहती है।

4 of 8
नवाजुद्दीन सिद्दीकी - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
लेखन में बदलाव की जरूरत
हिंदी सिनेमा के लेखन में बदलाव की जरूरत का मैं भी समर्थक हूं। मेरा मानना है कि हाल के दिनों में फिल्मों को लिखने वाले किरदारों पर ध्यान कम दे रहे हैं। वे संवाद लिख रहे हैं, कहानी और पटकथा पर उनका ध्यान उतना नहीं है। लेखकों को किरदारों के अतीत, उनकी भाषा शैली, उनके हावभाव और उनकी शख्सीयत के कारकों पर ध्यान देना चाहिए। कोई किरदार कुछ कर रहा है तो क्यों कर रहा है, ये बहुत जरूरी है। जैसे ‘शोले’ में गब्बर का पहनावा, उसके चलने का ढंग, उसके नशा करने का तरीका, उसका अपना है। उसने ये सब क्यों अपनाया, उसके कारण हैं।
विज्ञापन

5 of 8
नवाजुद्दीन सिद्दीकी - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
गलतियां जीवन का सबक हैं
मैं ये मानता हूं कि किसी भी किरदार को करते समय हर कलाकर पूरी मेहनत करता ही है। किसी किरदार में ढल जाना ही अभिनय है लेकिन कई बार ये कोशिशें नाकाम भी हो जाती हैं। हमसे जीवन में भी गलतियां होती हैं। अभिनय में भी हो जाती हैं। पर मेरे लिए ये गलतियां जीवन का सबक हैं। मैं उनको दोहराने से बचता हूं। गलतियां इंसान को बेहतर बनाती हैं, बशर्ते कि ये दोहराई न जाएं।
विज्ञापन

6 of 8
नवाजुद्दीन सिद्दीकी - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
बुढ़ाना मेरे भीतर बसता है
अभिनय हम अपने आसपास के लोगों को देखकर सीखते हैं। मैं इसीलिए अपने जन्मस्थान बुढ़ाना (मुजफ्फरनगर, उत्तर प्रदेश) को कभी नहीं भूलता। मेरी अभिनय यात्रा में मेरे गांव के वहां के आसपास के लोगों का बहुत बड़ा योगदान हैं। मैंने उन लोगों के हावभाव, जीवन शैली, रहन सहन से बहुत कुछ सीखा है। मैं अपने अभिनय में भी इन्हें दोहराने की कोशिश करता हूं। देखकर सीखने जैसा दूसरा कुछ नहीं है। बुढ़ाना मेरे भीतर बसता है और ये मेरे भीतर के कलाकार को लगातार कुछ न कुछ सिखाता रहता है।
विज्ञापन

7 of 8
नवाजुद्दीन सिद्दीकी - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
सोने के लिए एक कोना काफी है
मेरा नया घर दरअसल मेरी शख्सीयत का ही दूसरा हिस्सा है। मैंने इसमें बुढ़ाना की ही झलक दिखाने की कोशिश की है। वहां की स्थापत्य कला को मैं अपने साथ ले आया हूं। अदाकारी के अलावा वास्तुशिल्प मेरा दूसरा शौक रहा है। लेकिन, एक खास बात जो मैं आपसे साझा करना चाहता हूं, वह ये कि विलासिता मुझे भाती नहीं है। मैं चाहकर भी विलासितापूर्ण जीवन नहीं जी सकता। बड़े बड़े आलीशान कमरों के मुलायम गद्दों पर मुझे अब भी नींद नहीं आती। मैं अपनी कोठी में भी एक छोटे से कमरे में जाकर ही सो पाता हूं। मुझे लगता है कि सोने के लिए एक कोना ही काफी है, इतने बड़े कमरे की क्या जरूरत?
विज्ञापन

8 of 8
नवाजुद्दीन सिद्दीकी - फोटो : bestquotesphotos
बच्चों पर पसंद नहीं थोपूंगा
हम सामाजिक जीवन जीते हैं। कलाकार भी सामाजिक प्राणी ही होता है और आसपास होने वाली गतिविधियों का उस पर भी असर होता है। इसी तरह एक कलाकार की शख्सीयत का असर उसके बच्चों पर भी पड़ता है। मेरे बच्चे बड़े होकर क्या बनेंगे, ये तय करने का अधिकार मुझे नहीं है। मैं अपनी पसंद उन पर कभी नहीं थोपूंगा। उन्हें जीवन में कुछ बनाने के लिए मैं कभी अतिरिक्त कोशिश भी नहीं करूंगा। मेरा साथ उनके फैसलों को लेकर होगा, लेकिन जो भी फैसला होगा, वह उनका अपना होगा।
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें