मशहूर अभिनेता नसीरुद्दीन शाह और अभिनेत्री रत्ना पाठक की बेटी हीबा शाह का मानना है कि सच्चा कलाकार फिल्मों के लिए रंगमंच नहीं छोड़ सकता। थिएटर करके सुकून मिलता है। जो फिल्मों में करना है, थिएटर उसे सहज ही सिखा देता है। गोरखपुर के वनटांगिया गांवों में फिल्माई जा रही फिल्म 'सक्षम' की शूटिंग के सिलसिले में वह एक अप्रैल से शहर में हैं।
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फाइल फोटो
बुधवार को उनसे मुलाकात हुई तो परिवार से लेकर फिल्म, रंगमंच और समाज पर उन्होंने खुलकर बातें कीं। हीबा शाह ने पिता नसीरुद्दीन शाह की तुलना में मां रत्ना पाठक को व्यवस्थित बताया। बोलीं, दोनों से अलग-अलग चीजें सीखने को मिलीं। पिता ने सिखाया, जो करना है अपने आप करो। इससे स्वतंत्रता का भाव पैदा हुआ।
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कुछ करने के बाद गर्व का एहसास हुआ कि जो किया अपने बूते किया। बताया कि मां ने व्यवस्थित जीवन जीना सिखाया तो पिता ने अभिनय का पैशन (पसंदीदा शौक) जगाया। हीबा बोलीं, अभिनय में हर रोज कुछ नया सीखने को मिलता है। यही तो मजा है कलाकारी में। फिल्मों और रंगमंच की तुलना पर कहा कि थिएटर में शुद्धता है। रंगमंच में सुकून है तो फिल्मों में शोर।
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मार्डन लगे वनटांगिया गांव
हीबा शाह बोलीं, वह देश के कई पिछड़े गांवों को देख चुकी हैं। इनकी तुलना में वनटांगिया गांव मार्डन लगे। उन्होंने अचरज जताते हुए कहा कि यहां आकर पता चला कि इन गांवों में बिजली अभी-अभी आई है। सरकार ने इन गांवों को जिस तरह विकास से जोड़ा है, वह काबिल-ए-तारीफ है।
लैंगिक समानता ने प्रभावित किया
वनटांगिया गांव से लेकर गोरखपुर शहर तक हीबा शाह को लड़कियों की निडर आवाजाही और लड़कों के साथ खेलना प्रभावित कर गया। उन्होंने कहा कि यह देखकर काफी अच्छा लगा। यहां अन्य शहरों की तुलना में लैंगिक समानता का भाव लोगों में ज्यादा है।