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Naqsh Lyallpuri: नक्श लायलपुरी के लिखे गीत पर यूं चिपका गुलजार का नाम, बेटे ने किया दिलचस्प खुलासा

Fri, 24 Feb 2023 10:00 AM IST
मेघा चौधरी अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
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राजन लायलपुरी,नक्श लायलपुरी - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो , मुंबई
हिंदी सिनेमा के मशहूर गीतकार और शायर नक्श लायलपुरी का नाम बहुत ही सम्मान के साथ लिया जाता है। नक्श लायलपुरी का जन्म 24 फरवरी 1928 को पाकिस्तान के लायलपुर में हुआ था। जिसका नाम 1978 के बाद बदलकर  फैसलाबाद हो गया। 1947 में जब भारत का बंटवारा हुआ तो वह अपने  परिवार के साथ लखनऊ  आ गए। नक्श लायलपुरी ने अपने पूरे करियर में लगभग 145 संगीतकारों के साथ काम किया। उनकी सादगी और मीटर में गाने लिखने की कला से हर संगीतकार उनसे बहुत प्रभावित था। एक बार तो खय्याम साहब ने शर्त रख दी कि फिल्म खानदान  का दोगाना पहले  वहीं लिखेंगे। नक्श लायलपुरी ने कई कालजयी गीत लिखे हैं। नक्श लायलपुरी के जन्मदिन की पूर्व संध्या पर ‘अमर उजाला’ ने उनके बेटे राजन लायलपुरी से बातचीत की।
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नक्श लायलपुरी - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो , मुंबई
आप के डैडी का असली नाम जसवंत राय शर्मा है, उनका नाम नक्श लायलपुरी कैसे पड़ा ? 
डैडी को लिखने का शौक था, आमतौर पर जितने भी लेखक होते हैं अपना कोई ना कोई पेन नाम रख लेते हैं, तो डैडी ने अपना पेन नाम नक्श रखा लिया। नक्श  का मतलब एक छाप होता है। चूंकि पेन नाम के साथ जन्म स्थान का नाम जुड़ता है, उनका नाम लायलपुर पाकिस्तान  में हुआ था तो उन्होंने अपना पूरा नाम नक्श लायलपुरी रख लिया। पाकिस्तान में लायलपुर का नाम 1978 में बदलकर फैसलाबाद कर दिया गया।
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नक्श लायलपुरी - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो , मुंबई
विभाजन के बाद डैडी कब लखनऊ आये और फिर वहां से मुंबई ( बॉम्बे ) का सफर कैसे शुरू हुआ ? 
मेरे दादा जगन्नाथ शर्मा इंजीनियर थे। उनका ट्रांसफर इधर उधर होता रहता था, तो डैडी  ताऊ जी के साथ लायलपुर में रहे और दसवीं तक पढ़ाई वहीं पर की। जब विभाजन हुआ तो वहां से 250 आदमी साथ में पैदल ही निकले और लखनऊ पहुंचते पहुंचते सिर्फ 50 प्रतिशत लोग बचे। कुछ लोग रास्ते में बीमारी से मर गए तो कुछ लोग दंगे में मारे गए। दादा जी इंजीनियर थे तो लखनऊ में अपना एक छोटा सा प्लांट लगा लिया था।मेरे दादा जी चाह रहे थे कि डैडी साइंस पढ़कर इंजीनियर बने,दादा जी के बड़े भाई डॉक्टर थे वह भी चाह रहे थे कि डैडी इंजीनियर नहीं तो डॉक्टर बने। लेकिन डैडी की दिलचस्पी ना तो डॉक्टरी में थी और ना ही इंजीनियरिंग में। जब डैडी ने आर्ट लिया तो दादा जी ने उनकी पढ़ाई बंद करवा दी। इस तरह से 12वी के बाद डैडी की पढ़ाई छूट गई थी।

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नक्श लायलपुरी - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो , मुंबई
और, मुंबई( बॉम्बे) का सफर कैसे शुरू हुआ ? 
लखनऊ में डैडी को कोई काम जम नहीं रहा था।  जब वह आठ साल के थे तब दादी की मृत्यु हो गई और दादा जी  ने दूसरी शादी कर ली, सौतेली मां से डैड की जमती नहीं थी तो काम की तलाश में मुंबई(बॉम्बे) साल 1951 में आ गए। मुंबई में उनके एक मित्र प्रदीप नैय्यर रहते थे, उनको चिट्ठी लिखा करते थे। उनसे बात हुई होगी और उन्होंने मुंबई बुला लिया, वह फिल्म लाइन में असिस्टेंट डायरेक्टर थे। डैडी को लगा कि उनके संपर्क से कुछ काम मिल जाएगा, लेकिन जब डैडी यहां आए तो वह पूना 15-20 दिन की शूटिंग के लिए गए थे,वह मिले नहीं।
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नक्श लायलपुरी - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो , मुंबई
मुंबई आने के बाद पहला मौका फिल्म 'जग्गू' में कैसे मिला ? 
डैडी गीतकार बनने की सोचकर नहीं आए थे, यहां यह सोचकर आए थे कि कोई भी नौकरी मिलेगी तो कर लेंगे। यहां आने के बाद उन्होंने छोटी मोटी नौकरी कर ली, कुछ समय तक डाक विभाग में भी काम किया,  लिखने का शौक था ही। एक दिन उनकी मुलाकात राममोहन से हुई, डैडी ने उनके नाटक में गीत लिखे। राम मोहन निर्देशक जगदीश सेठी के असिस्टेंट हुआ करते थे।  उन्होंने जगदीश सेठी से मिलाया, तो जगदीश सेठी ने कहा कि जो भी गीतकार आते हैं, उनको हम सिचुएशन देते हैं जिसका गाना अच्छा होता है,उसका गाना रख लेते हैं। डैडी ने गाने लिखे और उस फिल्म में  फिल्म में डैडी के दो गाने सिलेक्ट हुए थे। पहला गाना 'अगर तेरी आंखों में आँखे मिला दूं' को आशा भोसले ने गाया था और उस गीत को संगीतबद्ध हंसराज बहल ने किया था। 
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नक्श लायलपुरी - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो , मुंबई
आप को कब लगा कि आपके पिताजी एक स्थापित गीतकार बन चुके हैं,उनका पहला गीत कौन सा सुना था आपने, वह किस फिल्म का गीत था?
जब से हमने होश संभाला और थोड़ी बहुत समझ हुई तो पहला गाना बी आर इशारा की फिल्म 'चेतना' का गाना था। इस फिल्म के गीत 'मैं तो हर मोड़ पर तुझको दूंगा सदा' को मुकेश जी ने गाया था और इस फिल्म के संगीतकार सपन जगमोहन थे।उस गीत से डैडी को काफी लोकप्रियता मिली, उसके बाद उनकी एक पंजाबी फिल्म 'जीजा जी' का गीत 'मैं कुंडल वलियन जुल्फान नू' मुझे बहुत पसंद आया था, वह गाना बहुत चला उसे बहुत सारे अवॉर्ड मिले। 
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बप्पी दा के साथ नक्श लायलपुरी - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो , मुंबई
डैडी  के साथ आप भी म्यूजिक सीटिंग पर जाते रहे होंगे,पहली बार किस म्यूजिक सीटिंग पर गए,वह गाना कौन सा था?
ज्यादातर म्यूजिक सीटिंग तो घर पर ही होती थी। गीतकार इंदीवर साहब अक्सर घर आते थे। पिता जी को मीटर में गाने लिखने की बहुत अच्छी समझ थी, इंदीवार जी डैडी को बोलते थे कि मुझे भी मीटर में गाने लिखना सीखा दो, डैडी कहते थे कि तुम मीटर में लिखना सीखोगे तो तुमसे नहीं होगा जैसे लिख रहे हो वैसे ही लिखो। इस तरह से हमेशा मजाक मस्ती चलती रहती थी, इंदीवर  साहब को मीटर में गाने लिखने की थोड़ी बहुत समस्या होती ही थी। इस लिए वो डैडी को हमेशा बोलते थे कि मुझे मीटर में गाने लिखना सीखना है।

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नक्श लायलपुरी - फोटो : सोशल मीडिया
वैसे तो नक्श लायलपुरी के कई गीत कालजयी हैं, लेकिन 'ये  मुलाकात एक बहाना है' उस दौर का सबसे हिट गाना था आज भी लोग इस गीत गुनगुनाते हैं, इस गीत से जुड़ी कोई खास बात जो आप शेयर करना चाहें?
यह 'खानदान' फिल्म का गीत है,जिसे खय्याम साहब ने संगीतबद्ध किया था। उस समय फिल्म के पीआरओ गोपाल पांडे थे। तो तय यह हुआ कि दो गाने गोपाल पांडे के बड़े भाई अनजान साहब लिखेंगे दो गाने डैडी  और दो गाना कोई और गीतकार लिखेगा। फिल्म में कुछ छह गाने थे। लेकिन खय्याम  साहब ने शर्त रखी की पहले दो गाने नक्श लायलपुरी लिखेंगे। पहला गाना 'ये  मुलाकात एक बहाना है'  लिखा और गाना रिकॉर्ड हुआ तो सबको लगा कि फिल्म के सभी गाने नक्श लायलपुरी से ही लिखवाने हैं। इस गाने को लता जी ने गाया था। 

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नक्श लायलपुरी - फोटो : सोशल मीडिया
कई बार ऐसा ही रहा है कि नक्श लायलपुरी साहब के लिखे गाने का क्रेडिट गुलजार साहब को दे दिया गया, इसके पीछे की क्या कहानी थी?
एक फिल्म 'घरौंदा' थी, उस फिल्म के गाने गुलजार साहब लिख रहे थे। उस समय बांग्ला देश की सिंगर रूना लैला आई हुई थी, डैडी ने प्रोड्यूसर से कहा कि वह आई हुई है अगर आप उससे एक गाना गवाना चाहे तो गंवा सकते थे। एक गाना तैयार है अगर आप गवाना चाहे। तो डैडी के लिखे गीत 'तुम्हे हो ना हो' को रूना लैला गाया। गुलजार साहब को लगा कि इस गाने क्रेडिट में मेरा ही नाम जाना चाहिए क्योंकि फिल्म के सभी गाने वहीं लिख रहे थे। फिर उस गाने में गुलजार साहब ने अपना नाम दे दिया।

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नक्श लायलपुरी - फोटो : सोशल मीडिया
जब आपके पिता जी गीतकार के रूप में सक्रिय रहे तो उस समय साहिर लुधियानवी, हसरत जयपुरी, गुलजार और मजरूह सुल्तानपुरी जैसे गीतकारों का बोल बाला था, ऐसे में अपनी एक अलग पहचान बनाने के लिए आपके पिता जी को क्या करना पड़ा?
अच्छा काम करना और सिचुएशन की पकड़ा रखना दोनों अलग बात है। डैडी की खसियत यह थी कि वह हमेशा मीटर में गाने लिखते थे, इसलिए ज्यादातर संगीतकार उन्हें पसंद करते थे। डैडी की सबसे बड़ी खूबी यह थी कि वह बहुत ही शांत शांत स्वाभाव के थे और अपने काम से मतबल रखते थे, कभी उनका कमर्शियल सोच वाला एंगल रहा ही नहीं, यहां तो यही है कि  एक गाना अच्छा तब होता है जब  उसकी ट्यून अच्छी हो, अच्छे सिंगर उसे गाएं और अच्छे कलाकार पर फिल्माया जाए। उस समय रेडियो का दौर था और पिक्चराइजेशन से पहले भी कुछ गाने चल जाते थे और हिट हो जाते थे। 

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नक्श लायलपुरी - फोटो : सोशल मीडिया
आपके डैडी ने उस दौर के मदन मोहन, ख्यम साहब,जयदेव,नौशाद, रविंद्र जैन जैसे कई सर्वश्रेष्ट संगीतकारों के साथ काम किया, किसके साथ उनकी ट्यूनिक सबसे ज्यादा अच्छी रही?
डैडी की ट्यूनिंग सबके साथ अच्छी थी, जैसा कि मैंने पहले कहा कि  डैडी को मीटर की बहुत अच्छी समझ थी,इसलिए उन्होंने सबके साथ अच्छा काम किया चाहे हो रोशन लाल हो, भगत राम, मदन मोहन, लक्ष्मीकांत प्यारेलाल, आर डी बर्मन, कल्याण जी आनंद जी, शंकर जयकिशन, खय्याम साहब और जयदेव। खय्याम साहब और जयदेव साहब  के साथ तो डैडी ने बहुत काम किया। उस दौर के जितने भी संगीतकार थे डैडी ने सबके साथ काम किया। उन्होंने लगभग 145 संगीतकारों के साथ काम किया।

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नक्श लायलपुरी - फोटो : सोशल मीडिया
फिर पंजाबी फिल्मों के बहुत सारे गीत लिखे?
जब हिंदी फिल्में मिलना  कम हो गया तो डैडी ने फिर पंजाबी फिल्में लिखनी शुरू की। उन्होंने एक पंजाबी फिल्म फिल्म 'जीजा जी' का गीत 'मैं कुंडल वलियन जुल्फान नू' पहली बार लिखी थी। इस फिल्म के लिए निर्माता  उनको 250 रुपये साइनिंग अमाउंट के तौर दिए थे, डैडी ने सोचा कि अगर पंजाबी गीत नहीं लिख पाएंगे तो वह साइनिंग अमाउंट वापस कर देंगे। जब वह घर पर आए तो मेरे बड़े भाई की तबियत खराब थी और पैसे की जरूरत थी, फिर डैडी ने सोचा कि एक बार कोशिश करता हूं। उन्होंने फिर 15-16 मुखड़े लिखे, तो उनको लगा कि अभी भी हिंदी हावी है, क्योंकि उनको पंजाबी में तो कभी कोई गीत लिखे नहीं थे। जब उन्होंने 17वां मुखड़ा लिखा, तो उन्हें लगा कि यह पंजाबी में चल सकता है। इस तरह से पंजाबी फिल्म  'जीजा जी' का गीत 'मैं कुंडल वलियन जुल्फान नू' हिट हुआ और फिर यहां से पंजाबी फिल्मों का सफर शुरू हुआ और डैडी ने करीब 40 पंजाबी फिल्मों के गीत लिखे। फिल्म 'जीजा जी' का गीत 'मैं कुंडल वलियन जुल्फान नू' कव्वाली गीत था जिसे मोहम्मद रफी और आशा भोसले ने गाया था और इस फिल्म के संगीतकार सपन जगमोहन थे। 
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नक्श लायलपुरी - फोटो : सोशल मीडिया
एक आखिरी सवाल, इंडस्ट्री में आम तौर पर देखा गया पिता जिस क्षेत्र में रहे हैं, बेटे ने भी उसी प्रोफेशन को अपनाया है, लेकिन इस मामले में आप अलग रहे हैं?
ऐसी बात तो नहीं है,गीत लेखन से तो मैं भी शुरू से ही जुड़ा रहा हूं, लेकिन डैडी ने कहा कि लेखन का प्रोफेशन ठीक नहीं है। मैं जिस परेशानियों से गुजरा हूं,नहीं चाहता कि तुम भी उस परेशानी से गुजारों। उन्होंने मुझे सलाह दी कि कुछ टेक्निकल लाइन सीखोगे तो अच्छा रहेगा। शुरुआत मैने सहायक निर्देशन से की लेकिन फिर गलती से सिनेमैटोग्राफी में आ गया। जब मैं 12वीं में पढ़ रहा था तो, उस समय डायरेक्शन में था। फिर ग्रेजुएशन पूरी करने के लिए काम से ब्रेक लिया तो जिनके साथ सहायक निर्देशक के तौर पर जुड़ा था उनके पास काम नहीं था। फिर एक सिंधी फिल्म में असिस्टेंट डायरेक्टर के तौर पर जुड़ा।  कई सिनेमेटोग्राफर के साथ काम करते करते महाभारत में ऑपरेटिव  कैमरामैन हो गया। जब महाभारत खत्म हुई तो स्वतंत्र कैमरामैन के रूप में मेरे पास तीन फिल्में थी। 'दुर्गा बनी ज्वाला' से बतौर कैमरामैन का जो सफर शुरू हुआ तो बस चलता ही रहा। आज कैमरामैन के साथ साथ लेखन और निर्देशन में भी व्यस्त हूं।
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