उत्तम सिंह
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
नौशाद और रोशन की फिल्मों में भी आपने वायलिन बजाई। दोनों के संगीत निर्देशन में ऐसी क्या खास बात नजर आती है आपको?
आप बीते दौर के किसी भी संगीतकार का नाम लेंगे, मैंने साथ में काम किया है। दोनों में फर्क यह है कि हर आदमी का अपना स्कूल था। उनकी अपनी आवाज, उसका अपना संगीत का एक तरीका, उसका अपना टोन। म्यूजिक का अपना एक टोन होता है जो उस समय हर संगीतकार अपना अलग होता था। चाहे वह शंकर जयकिशन साहब हो, ओपी नैय्यर साहब हो या फिर नौशाद साहब, मदन मोहन साहब, रोशन जी या फिर चित्रगुप्त जी हो, सी रामचंद्र जी हों, सबका अपना अपना टोन होता था। म्यूजिशियन वही होते थे। वे हर जगह म्यूजिक बजाते थे। आज के संगीत की बात करें तो आज कोई टोन है ही नहीं। आज टोन 'की- बोर्ड' का टोन है। आज की तारीख में किसी भी संगीतकार का अपना टोन नहीं है।