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मुकेश छाबड़ा ने किया खुलासा, जाते जाते यह वादा पूरा कर गए सुशांत सिंह राजपूत

Sat, 04 Jul 2020 07:47 AM IST
shrilata biswas अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
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सुशांत सिंह राजपूत, संजना संघी, मुकेश छाबड़ा - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
दिवंगत अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत की अंतिम फिल्म दिल बेचारा आजकल खूब चर्चाओं में है। यह फिल्म 24 जुलाई को सीधे ओटीटी पर रिलीज होने जा रही है लेकिन सुशांत के प्रशंसक सोशल मीडिया पर लगातार इस फिल्म को सिनेमाघरों में रिलीज करवाने पर जोर दे रहे हैं। हालांकि होगा तो वही जो इस फिल्म के निर्माता चाहेंगे। फिल्मों के जाने माने कास्टिंग निर्देशक मुकेश छाबड़ा ने इस फिल्म का निर्देशन किया है। उन्होंने कहा कि इस फिल्म को करके सुशांत ने दोस्ती का फर्ज अदा किया है।
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सुशांत सिंह राजपूत और मुकेश छाबड़ा - फोटो : सोशल मीडिया
दरअसल, मुकेश और सुशांत वर्ष 2013 में आई फिल्म 'काय पो छे' के वक्त से ही एक दूसरे के बहुत अच्छे दोस्त रहे हैं। फिल्म के लिए कास्टिंग निर्देशक के तौर पर मुकेश ने 800 लोगों के ऑडिशन के बाद सुशांत की काबिलियत को पहचाना था। 
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मुकेश छाबड़ा - फोटो : ट्विटर
मुकेश छाबड़ा बताते हैं, ‘एक बार सुशांत ने मुझसे कहा था कि तुम्हारा दिल फिल्म बनाने में हैं। किसी दिन तुम खुद अपनी ही फिल्म का निर्देशन करोगे। सुशांत ने मुझसे वादा किया कि मैं जिस दिन फिल्म बनाऊंगा, वह मेरी फिल्म में काम करेंगे।’

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दिल बेचारा - फोटो : सोशल मीडिया
मुकेश छाबड़ा सुशांत की इस अंतिम फिल्म से ही निर्देशन में अपने करियर का शुभारंभ कर रहे हैं। यह फिल्म रिलीज होने के लिए तैयार है। सुशांत के बारे में याद कर वह कहते हैं, 'मुझे पता था कि मैं अपनी पहली फिल्म के लिए एक महान अभिनेता के अलावा किसी ऐसे व्यक्ति की जरूरत थी जो मुझे एक दोस्त के रूप में समझे। जो मेरे करीबियों में से हो। कोई ऐसा व्यक्ति जो इस पूरी यात्रा के दौरान मेरे साथ खड़ा होगा। मुझे याद है कि बहुत पहले सुशांत ने मुझसे वादा किया था कि जब भी मैं अपनी पहली फिल्म बनाऊंगा, तो वह इसमें मुख्य भूमिका निभाएंगे।‘
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सुशांत सिंह राजपूत, संजना संघी - फोटो : सोशल मीडिया
अपनी बात जारी रखते हुए मुकेश ने कहा, 'जब मैंने उन्हें दिल बेचारा के लिए संपर्क किया, तो उन्होंने बिना पटकथा पढ़े तुरंत हामी भर दी। हमारे बीच हमेशा से एक मजबूत भावनात्मक संबंध था। वह हमेशा दृश्य को बेहतर बनाने में मेरी मदद करते थे। वह मेरे साथ पढ़ते थे और अगर किसी भी समय उन्हें लगता है कि रचनात्मक रूप से दृश्य में सुधार किया जा सकता है, तो वह हमेशा मुझे बताते थे। हम साथ बैठते थे और पटकथा पर विस्तार से चर्चा करते थे।'
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