मुंबई के पॉश इलाके बांद्रा पश्चिम में बने एक सभागार में एक फिल्म चल रही है। डॉक्यूमेंट्री फिल्म है। जो बताती है कि कैसे देश में सैकड़ों किशोर, युवा, वयस्क पुरुष पुलिस हवालात और जेलों में तिल तिल कर मर रहे हैं। ये वे लोग हैं जिन्हें अदालत के मुताबिक रेप केस सर्वाइवर कहा जाना चाहिए। ये वे लोग हैं जिनकी इज्जत सरे बाजार उछाल दी गई और अदालत से फैसला आने के पहले ही समाज ने उनके माथे पर बलात्कारी लिख दिया। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के शासन काल में हुए निर्भया कांड के बाद जनता का गुस्सा शांत करने के लिए आनन फानन में बदले गए कानून ने तमाम निर्दोष पुरुषों की जिंदगी नरक बना दी है। ये फिल्म समाज की इसी अंतर्धारा की कहानी कहती है। ये फिल्म देखते समय सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश जस्टिस बी एन श्रीकृष्णा हॉल में मेरे ठीक पीछे बैठे हैं। और, वह भी फिल्म को ध्यान से देख रहे हैं। फिल्म खत्म होती है। पूरा हॉल तालियों से गूंज उठता है। लोग खड़े होकर फिल्म बनाने वालों को बधाइयां दे रहे हैं कि तभी दर्शकों के बीच से एक औसत कद काठी का एक व्यक्ति धीरे धीरे जगह बनाते हुए मंच तक पहुंचता है। वह देश में बलात्कार कानूनों के दुरुपयोग की जीवित केस स्टडी है। नाम, नितिन भारती।