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Mohammed Rafi: फकीर के गानों की नकल कर गाना सीख गए थे मोहम्मद रफी? इस तरह दी थी पहली प्रस्तुति

Sat, 24 Dec 2022 07:50 AM IST
ज्योति राघव एंटरटेनमेंट डेस्क, अमर उजाला
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Mohammed Rafi - फोटो : सोशल मीडिया
मोहम्मद रफी अगर हमारे बीच होते तो आज अपना जन्मदिन मना रहे होते। दिवंगत गायक को किसी परिचय की जरूरत नहीं है। वे सुरीली आवाज के जादूगर थे। उनके निधन के वर्षों बाद भी उनके गाए गीत खूब सुने और गुनगुनाए जाते हैं। मोहम्मद रफी का जन्म 24 दिसंबर 1924 को हुआ था। रफी साहब ने प्रेम, दुख, सुख, देशभक्ति, भजन, बालगीत लगभग हर मिजाज के गीतों को गाया। रिपोर्ट्स के मुताबिक रफी साहब के नाम लगभग 26 हजार गीत गाने का रिकॉर्ड है। लेकिन, क्या आप जानते हैं उन्होंने पहला गाना कब और किन परिस्थितियो में गाया था? आइए जानते हैं...
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Mohammed Rafi - फोटो : सोशल मीडिया
मोहम्मद रफी को शहंशाह-ए-तरन्नुम भी कहा जाता था। रफी साहब बहुत कम बोलने वाले, जरूरत से ज्यादा विनम्र इंसान थे। रफी साहब ने अपने गांव में फकीर के गानों की नकल करते-करते गाना गाना सीखा था और एक वक्त ऐसा आया जब वो देश के सबसे ज्यादा सुने जाने वाले गायकों में से एक बन गए। कहते हैं कि रफी साहब का परिवार लाहौर से अमृतसर आकर बसा था। बेहद कम उम्र में ही रफी बड़े भाई की नाई की दुकान पर चले जाया करते और वहां से गुजरते एक फकीर के नग्मों को बड़े गौर से सुना करते थे। एक दिन रफी फकीर के गाए गाने को गुनगुना रहे थे कि फकीर लौट आया और रफी साहब की सुरीली आवाज को सुनकर हैरान रह गया। फकीर ने रफी साहब को दुआ दी कि वो एक दिन इसी सुरीली आवाज के दम नाम रौशन करेंगे।
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Mohammed Rafi - फोटो : सोशल मीडिया
रफी साहब के शौक का उनके भाई को पता चला तो उन्होंने रफी साहब को गाने की बाकायदा तालीम दिलवाने की सोची। वह रफी साहब को उस्ताद अब्दुल वाहिद के पास ले गए और उनसे दीक्षा दिलवाई। रफी साहब का पहली बार गाने का किस्सा भी बड़ा रोचक है। उन दिनों कुंदन लाल सहगल का गायन की दुनिया में बड़ा नाम था। लोग उनका गाना सुनने के लिए दूर दूर से आते थे। रफी साहब को पता चला कि सहगल साहब ऑल इंडिया के एक प्रोग्राम के लिए मंच पर गाने आ रहे हैं। वह भी अपने भाई के साथ कार्यक्रम में पहुंचे। लेकिन, अचानक बत्ती चली गई और सहगल ने गाने से इनकार कर दिया। जब सहगल चले गए तो भीड़ चिल्लाने लगी, तब रफी साहब के भाई के इसरार पर आयोजकों ने रफी साहब को मंच पर खड़ा कर दिया। रिपोर्ट्स के मुताबिक तब रफी साहब की उम्र महज 13 वर्ष थी। उन्होंने उस रोज मंच पर ऐसा गाया कि लोग मंत्रमुग्ध हो गए।
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Mohammed Rafi - फोटो : सोशल मीडिया
लेकिन इसके बाद वो गायन की तालीम में व्यस्त हो गए और फिर 20 साल की उम्र में मुंबई पहुंचे। उनको पहला गाना मिला पंजाबी फिल्म गुल बलोच से। हालांकि यहां उन्हें वो पहचान नहीं मिली, जिसके वो हकदार थे। दो साल बाद नौशाद के म्यूजिक से सजी फिल्म अनमोल घड़ी में रफी साहब को गाने के लिए बुलाया गया। गाने के बोल थे, 'तेरा खिलौना टूटा'। रफी ने यह गीत गाया तो नौशाद साहब ने फिल्म रिलीज होने से पहले ही एलान कर दिया था कि यह गाना जमकर चलेगा और साथ ही रफी साहब का सिक्का भी। इसके बाद रफी की सफलता का सफर शुरू हुआ और ये बुलंदी तक जा पहुंचा। शहीद, दुलारी, बैजू बावरा जैसी फिल्मों ने रफी को मुख्यधारा में लाकर खड़ा कर दिया। 31 जुलाई 1980 को रफी साहब सदा के लिए इस दुनिया से चले गए। आज भले ही वे हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी आवाज की रूमानियत आज भी कायम है।
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