कृति सैनन
- फोटो : अमर उजाला, मुंबई
सिर्फ सात साल पहले फिल्म ‘हीरोपंती’ से आपने करियर शुरू किया और अभी से लोगों को बिट्टी मिश्रा, रश्मि त्रिवेदी या पार्वती बाई जैसे आपके किरदारों के नाम याद रहने लगे हैं, ये अलग अलग किरदार संयोग हैं या रणनीति?
जी, रणनीति तो बिल्कुल नहीं है। शुरू में तो आपके पास गिने चुने ही प्रस्ताव आते हैं और इनमें से जो पसंद आते हैं, वह हम करते चले जाते हैं। हां, इन्हीं के बीच कुछ मील के पत्थर आते हैं जो आपको कुछ अलग करने का मौका देते हैं, जैसे मेरी चौथी फिल्म थी ‘बरेली की बर्फी’। एक साधारण सी दिखने वाली छोटे शहर की बिट्टी मिश्रा। अश्विनी अय्यर तिवारी और नितेश तिवारी ने मुझमें ये किरदार देखा, मैं कैसी हूं ये नहीं देखा। लोगों ने मुझे इस तरह के किरदारों में पसंद किया तो ‘लुकाछिपी’ की रश्मि त्रिवेदी भी बनी मैं। लेकिन, आशुतोष गोवारिकर ने मेरे जैसी उत्तर भारतीय पंजाबी लड़की को महाराष्ट्र की एक युवती के किरदार में कैसे देखा, मैं भी नहीं जानती।