फिल्म- मास्टरजी
- फोटो : सोशल मीडिया
फिल्म मास्टरजी जब के भाग्यराज ने निर्देशित नहीं की तो इसके निर्देशन का जिम्मा मिला श्रीदेवी की पहली सुपरहिट हिंदी फिल्म हिम्मतवाला निर्देशित करने वाले के राघवेंद्र राव को। इनका पूरा नाम है कोवेलामुदी राघवेंद्र राव। जीतेंद्र के साथ उनकी खूब जमी।
और, उनके बेटे प्रकाश कोवेलामुदी ने पिछले साल जीतेंद्र की बेटी एकता कपूर के लिए निर्देशित की अपनी पहली हिंदी फिल्म, जजमेंटल है क्या। राघवेंद्र राव औऱ जीतेंद्र की दोस्ती फिल्म हिम्मतवाला से पहले शुरू हो चुकी थी जब दोनों की जोड़ी ने पूनम ढिल्लों के साथ निशाना और हेमा मालिनी व रति अग्निहोत्री के साथ फर्ज और कानून जैसी फिल्में बनाईं। राजेश खन्ना भी मास्टरजी से पहले के राघवेंद्र राव की बतौर निर्माता निर्देशक बनी हिंदी फिल्म नया कदम में काम कर चुके थे।
उस दौर की इन फिल्मों में नायिका की कामुकता, मादकता और हीरो को रिझाने के लिए फेंके जाने वाले पैंतरों पर निर्देशक का पूरा ध्यान रहता। युवाओं को फोकस में रखकर बनने वाली इन फिल्मों को पूरे परिवार के साथ देखना कई बार मुश्किल हो जाता था क्योंकि इन फिल्मों के संवाद अक्सर कादर खान लिखा करते। निर्माताओं की डिमांड कुछ कुछ दादा कोंडके की फिल्मों जैसे संवादों की होती और कादर खान ये सोचकर इंकार नहीं करते कि वह नहीं लिखेंगे तो कोई और इन्हें लिखेगा।
कादर खान और शक्ति कपूर की जोड़ी ने इन संवादों को परदे पर भी एक अलग ही गिरावट के साथ पेश किया। हिंदी सिनेमा के संवादों में दोहरे मायनों वाली बातों का ये कादर खान काल भी कहा जा सकता है। फिल्म मास्टरजी चली तो बस श्रीदेवी की श्रृंगार रस में पगी अदाओं और फिल्म के संवादों के कारण।
फिल्म मास्टरजी का संगीत ज्यादा कुछ फिल्म को सपोर्ट कर नहीं पाया और बप्पी लाहिड़ी भी उन दिनों बस गाने छाप दिया करते थे। फिल्में फिर भी सुपरहिट होती थीं। मास्टर जी भी सुपरहिट ही रही। दक्षिण के निर्माताओं ने हिंदी सिनेमा वालों की तिजोरियां भरने में अहम भूमिकाएं निभाई हैं। ये तो भला हो मणि रत्नम जैसे निर्देशकों का जिन्होंने बाद में आकर मामला संभाल लिया नहीं तो अस्सी के दशक का ये मसाला डोसा टाइप का साउथ सिनेमा हिंदी सिनेमा को कहां ले जाता, किसी को कुछ पता नहीं। आज के बाइस्कोप में इतना ही, कल यानी 1 जून को बात करेंगे एक और ओल्डी गोल्डी की..। सिलसिला जारी है।
पढ़ें: बाइस्कोप: हीरोइन से प्रोड्यूसर तक सबको भारी पड़ी 'जय संतोषी मां' की कामयाबी, किसी के हिस्से नहीं आया असली संतोष
(बाइस्कोप अमर उजाला डिजिटल का दैनिक कॉलम है जिसमें हम उस दिन रिलीज हुई किसी पुरानी फिल्म के बारे में चर्चा करते हैं।)