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Manoj Bajpayee Interview: प्रयोग वही कर सकता है जिसको कल की चिंता नहीं, मैं जो भी हूं बैरी जॉन की वजह से हूं

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मनोज बाजपेयी - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
कैमरे के सामने खुद को तराशते हुए अभिनेता मनोज बाजपेयी को 30 साल हो रहे हैं। रंगमंच को जोड़ें तो उनकी ये अभिनय यात्रा अब 40 साल की है। बेलवा से बंबई (अब मुंबई) आने के बाद भी मनोज में जो एक बात नहीं बदली है वह है लगातार सीखते रहना और इसे ही वह अपनी कामयाबी का मंत्र मानते हैं। मनोज के मुताबिक उनकी शख्सीयत को ढालने में रंगमंच का सबसे बड़ा हाथ रहा है। अपने पहले गुरु बैरी जॉन को वह पिता तुल्य दर्जा देते हैं और बताते हैं कि कैसे समलैंगिकता का पहला पाठ उन्होंने ही पढ़ाया था। संगीत को लेकर खुद को प्रशिक्षित करने की प्रक्रिया, अपने बचपन के अपने जीवन पर असर,स्कूलों मे रंगमंच को अनिवार्य बनाए जाने की जरूरत और अपनी नई फिल्म ‘सिर्फ एक बंदा काफी है’ को लेकर मनोज बाजपेयी की ‘अमर उजाला’ के सलाहकार संपादक पंकज शुक्ल से एक लंबी और एक्सक्लूसिव मुलाकात...
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मनोज बाजपेयी - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
सिनेमा में आपने अधिकतर या तो अपराधियों के किरदार किए हैं या फिर पुलिस अफसर के, इन दोनों के बीच की जो मध्यरेखा है वकील का किरदार, ये आप पहली बार कर रहे हैंवकीलों के योगदान के बारे में वैसे भी मुख्यधारा के समाचार माध्यमों में भी कम बात होती है, इस किरदार की क्या खास बात है?
बड़ी अच्छी बात जो है इस फिल्म के बारे में कि सोलंकी (पूनम चंद सोलंकी) साहब इस फिल्म के साथ पूरे समय रहे और उनका जो किरदार है वह उसी तरह इस फिल्म में रखा गया है। बाकी सारी घटनाएं, बहुत सारी घटनाएं इस फिल्म के लिए प्रेरणा बनीं। ये वकील की जिंदगी, सुबह से लेकर शाम तक परिवार और परिवार के बाहर उसकी क्या क्या व्यस्तताएं, परेशानियां रहती हैं वे सारी चीजें आप इस फिल्म (सिर्फ एक बंदा काफी है) में देख पाएंगे। हमने उनके जीवन को उतने अंदर तक जाकर कवर नहीं किया है और यहां पर किसी ऐसे फैंसी वकील की बात भी नहीं कर रहे हैं। वह सुप्रीम कोर्ट का वकील भी नहीं है। वह लैंब्रेटा से चलने वाला आदमी, छोटे शहर का वकील है जो लोअर कोर्ट और हाईकोर्ट तक ही सीमित रखता है अपने आप को। वह इतना बड़ा केस लड़ता है जहां पर उसके सामने बड़े बड़े तुर्रम खां आते हैं। तो, ये फिल्म बड़ी हो जाती है।
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फिल्म जोरम में मनोज बाजपेयी - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
और, साथ में आत्मबल है उसका..
उसका एक विश्वास है अपने ऊपर, अपने काम के ऊपर और लालची नहीं है। मैं पूछकर हार गया कि सोलंकी साहब आपन ये केस क्यों लिया, सोलंकी साहब जवाब ही नहीं दे पाए वह भी सोचते होंगे कि ये कैसे मैने क्यों लिया।

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सुपर्ण, मनोज, विनोद, अन्य - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
थोड़ी देर पहले फिल्म के निर्माता विनोद भानुशाली से बात हो रही थी तो वह कह रहे थे कि अगर ये फिल्म मनोज बाजपेयी नहीं करते तो मैं ये फिल्म ही नहीं बनाता।
हां वह और सुपर्ण आए थे मेरे पास ये कहानी लेकर। इसमें वह सारे एलीमेंट थे जिसके लिए मैं हां कर सकता था। अंतत मैं यही कहूंगा कि मेरा अपना परफॉरमेंस सोलंकी साहब की प्रेरणा तो है ही, लेकिन अपना अभिनय इस फिल्म में मैं उस पीड़िता पर न्यौछावर करता हूं। ये मेरा ट्रिब्यूट है उसके लिए, उस लड़की के साहस के लिए, उसकी शक्ति के लिए। ये फिल्म करते समय ही ही मुझे इस बात का एहसास हुआ कि जो भी इस तरह का शारीरिक शोषण है उसमें अगर लड़की सामने नहीं आए तो केस कहीं आगे नहीं जा सकता है और उसके आगे आने के लिए कितनी जद्दोजहद है। उसको किस किस स्तर पर ये जद्दोजहद करनी पड़ी रही है। लेकिन, वह खड़ी रहती है। पूरी फिल्म में आप देखेंगे कि वह कैसे आखिर तक खड़ी रहती है।
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गुलमोहर - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
गुलमोहर’ के किरदार की तरफ आपने थोड़ी देर पहले इशारा किया। इस फिल्म में आपने शर्मिला टैगोर के साथ काम किया। 12 साल बाद वह आईं कैमरे के सामने लौट कर, कैसा अनुभव रहा उनके साथ काम करने का
शर्मिला जी का करियर ग्राफ देखिए तो वह कमाल है। सत्यजीत रे के साथ उन्होंने काम किया। उसके बाद कमर्शियल फिल्मों की भी वह सबसे बड़ी अदाकारा हुईँ। खूबसूरती के मामले में बहुत नाम था उनका। अभिनेता के तौर पर भी बड़ा नाम हुआ। और, फिर जब गुलजार साहब के साथ काम किया उन्होंने। हर तरह की फिल्मों में काम किया और उन्होंने राज किया। और उसके बाद जैसा कि वह बता रही थीं कि एक समय के बाद उन्होंने निर्णय लिया कि ये मैं छोड़ दूंगी। जब सब छोड़ा उन्होंने उनके खुद के लफ्ज हैं, मैं बता रहा हूं। उन्होंने कहा कि सब लोग कहते हैं कि आप कहां गायब हो गई थीं और मैं कहती हूं कि भाई फिल्मों के अलावा भी तो मेरा जीवन है। मेरे अपने दोस्त हैं। मेरी अपनी निजी गतिविधियां हैं तो मैं कहीं खोई नहीं थी। हां, मैं फिल्म इंडस्ट्री में नहीं दिख रही थी लेकिन मैं दूसरे मोर्चे पर एक्टिव थी। वह बहुत सख्त और बड़ी मजबूत महिला हैं। और बहुत जानकार, बहुत पढ़ने लिखने वाली। दुनिया भर की चीजों के बारे में उनका ज्ञान है और पूरा घर परिवार वह आज तक संभाल रही हैं।
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फिल्म दाग - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
आपने कौन सी फिल्म देखी शर्मिला टैगोर की पहले पहल?
वैसे तो बहुत सारी फिल्में देखी हैं लेकिन सबसे शुरू में जो फिल्म थी जो मैंने देखी वह ‘दाग’ फिल्म थी राजेश खन्ना साहब की जिसमें शर्मिला टैगोर जी और राखी जी थी। उस फिल्म का गाना गाकर मैं उनको ‘गुलमोहर’ की शूटिंग के समय तंग भी किया करता था। ‘दाग’ एक एक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर पर बनी फिल्म थी उस समय में। ‘दाग’ क्यों मेरे जेहन में रह गई ये तो पता नहीं लेकिन एक दो फिल्में जो उस समय की जब मैं बहुत छोटा था उस समय की जो याद रह गईं, ‘दाग’ उनमें से एक है। शर्मिला जी के सामने जब मैं गाना गाता था, एक चेहरे पे कई चेहरे लगा लेते हैं लोग, तो वह बहुत हंसती थीं। इस फिल्म का एक और गाना मैं गाता था, हवा चले कैसे ना तू जाने ना मैं जानूं। तो शर्मिला जी कहतीं, मनोज देखो तो जरा इस फिल्म में मैं एक टीचर का रोल कर रही थी और मैं ही गाना गा रही थी कि हवा चले कैसे..
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वीर जारा - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
दाग को अभी बीते महीने ही रिलीज के 50 साल पूरे हुए। इस फिल्म के निर्देशक यश चोपड़ा ने आपको वीर जारा में काम दिया और कहा कि मैं बस यही रोल आपको दे सकता हूं...
हां, उन्होंने कहा था कि मैं प्रॉमिस नहीं कर सकता हूं। मुझे उनकी ईमानदारी बहुत अच्छी लगी। नहीं तो लोग कहते हैं कि हां हां, अभी ये कर लो। बाद में कुछ नया करेंगे। उन्होंने कहा कि तू जिस तरह का एक्टर है और जिस तरह की फिल्में करता है वैसी फिल्में मैं बनाता ही नहीं हूं। मैं उस तरह की फिल्में नहीं बनाता जहां तेरे लिए कुछ स्पेस होगा। उन्होंने कोई वादा ही नहीं किया। उन्होंने कहा कि ये रोल है तू बता दे कि तू करेगा या नहीं करेगा। मैं चाहता हूं कि तू ये करे। ‘पिंजर’ देखी थी उन्होंने और मेरी परफॉरमेंस से वह बहुत प्रभावित हुए थे और वह चाहते थे कि ये मैं ही करूं। मेरा ये एक तरह का ट्रिब्यूट था यशजी को। मैं चाहता था कि इसके पहले कि वह फिल्में बनाना छोड़ें। मैं उनके डायरेक्शन में एक बार काम करना चाहता था। ये मौका था मेरे लिए।

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सत्यमेव जयते - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
जैसा कि आप कह रहे हैं कि कलाकार को एक स्पेस चाहिए होता है कुछ नया कर दिखाने को आपकी हाल की फिल्मों में एक नया मनोज बाजपेयी दिखता है। अपने मन के किरदार करने का और अपने किरदारों के साथ प्रयोग करने का ये साहस आप कैसे लाते हैं
एक अभिनेता ये स्पेस तभी ढूंढ सकता है जब वह अपनी असुरक्षा से बाहर आए। हमारी इंडस्ट्री में आज आप हैं और कल नहीं रहेंगे कि नहीं, पता नहीं होता। और अगर कल नहीं रहने का साहस आपके अंदर में है तो शायद प्रयोग कर सकते हैं। मेरे अंदर में तो साहस क्या अब तो उसकी आदत ही पड़ गई है। मैं चाहूं या न चाहूं मेरे करियर ने मुझे इतनी ताकत दे दी है क्योंकि मेरे करियर ने कभी एक समरस चढ़ाव नहीं देखा और न ही एकरस उतार ही देखा। ‘सत्यमेव जयते’ और ‘बागी 2’ में जब मैंने काम किया तो उनसे मुझे ताकत मिली कि मैं अपनी तरीके की फिल्में करूं, अपने तरह के नए डायरेक्टर्स ढूंढूं। मैंने कई सारे डायरेक्टर्स तलाशे जिनके पास वे स्क्रिप्ट थीं जहां मुझे पता था कि मैं अपने अभिनेता के साथ अपनी काबिलियत के साथ प्रयोग कर सकता हूं। और, फिर ‘फैमिली मैन’ आई। कोई नहीं जानता था ‘फैमिली मैन’। शुरुआती दौर में ओटीटी ने इतना बड़ा रूप नहीं लिया था। अचानक से ‘फैमिली मैन’ आया और वह घर घर का चहेता बन गया। ‘फैमिली मैन’ सीजन वन ने फिर मुझे बहुत ताकत दी कि मैं ये ‘गुलमोहर‘ और ऐसी ही चार पांच फिल्में कर पाया। अभी ‘बंदा’ है, फिर ‘जोरम’ आएगी फिर कानू बहल की फिल्म आएगी। ये सारी फिल्में करने का साहस मुझे फिर मिला तो अपनी सफलता से मैं यही काम करता हूं।

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फैमिली मैन - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
फैमिली मैन का श्रीकांत तिवारी बहुत कुछ मनोज बाजपेयी जैसा नहीं लगता
मनोज बाजपेयी तो आपको ‘बंदा’ के सोलंकी में भी दिखेगा। एक अभिनेता तो हर किरदार में रहता है। एक अभिनेता अपने अनुभवों के जरिये ही सारे किरदारों को जीता है। मेरी अपनी जो यात्रा रही है जो अनुभव रहा है जिस जिन लोगों से भी मैं मिला हूं तो उनमें से कुछ निकालकर कभी सोलंकी में डाल देता हूं तो कभी किसी और किरदार में..

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फैमिली मैन का बच्चों के साथ - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
‘फैमिली मैन‘ में एक पिता का अपने बच्चों से जो संवाद है, वह काफी रोचक है.. 
वह आता है मेरे अपने खानदान से। मेरे परिवार में बच्चों के साथ जो रिश्ते मेरे कुछ भाइयों के हैं, वे इसी प्रकार के हैं। वे बेटों को गाली देकर बात करते हैं और बेटियों से वे नजर नहीं मिलाते। बेटियां डांट देती हैं। ये कुछेक जो चीजें हैं जो मैं नॉर्थ से लेकर आय़ा हूं। नॉर्थ के जो डायनेमिक्स होंगे इसमें। श्रीकांत तिवारी की जो मैंने पृष्ठभूमि तैयार की मैंने उसको बनारस का बनाया है। वह बनारस का आदमी है। दिल्ली में पढ़ा लिखा है। वहां उसकी होने वाली पत्नी उसको कॉलेज मं टकराई जो कि साउथ इंडिया की थी और वहां से इनको प्रेम हुआ लेकिन वह प्रेम और विवाह जो है वह गलत हो गया क्योंकि दोनों दो अलग अलग संस्कृतियों के लोग हैं। इसके कारण उसमें जो उनका जो संवाद है वह चिंता का विषय भी होता है और आपको मुस्कुराने का मौका भी देता है। ये सारा चक्कर हमने इसलिए किया था मैंने कि पूरा स्पाई का मिथ तोड़ना चाहते थे हम। स्पाई की जो एक छवि गढ़ दी गई है अंग्रेजी फिल्मों के जरिये उसे हम दिखाना चाहते थे कि वह जितना ऑर्डिनिरी है और उतना ही एक्स्ट्रा ऑर्डिनरी भी है।  

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मनोज बाजपेयी - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
आप एक बेटी के पिता है तो आपका जब अपनी बेटी के साथ सामना होता है तो आपके अंदर भावनाएं कैसी होती हैं एक लाडली की तरह उससे बातें करते हैं या उसके सामने ऐसा कुछ करने से बचते हैं जो उसे खटके..
हम लोग करते भी नहीं हैं। हम जो भी काम करते हैं, उससे छुपा कर नहीं करते हैं। ये एक नियम है हमारे परिवार में। उसको भी हमारी पत्नी ने इसी तरह परवरिश दी है और संस्कार दिए हैं कि वह कुछ भी करे तो वह बताए या फिर सामने करे। अगर उसे किसी दिन अपने दोस्त के घर जाकर सोना है तो हमारी पत्नी कहती हैं कि भाई हमें जरा सी दिक्कत है तुम अपने दोस्त को यहां बुला लो और यहा साथ में रात गुजार लो। चीजों को मेरी पत्नी ने बहुत ही डेमोक्रेटिक रखा हुआ है। और, डेमोक्रेटिक हद से ज्यादा है इतना कि दोनों महिलाएं आपस में बैठकर करके अपनी सारी बातें करती हैं। तो कुछ भी छुपा नहीं रहता है।

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मनोज बाजपेयी - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
एक अच्छा संकेत है ये आधुनिक अभिभावक होने का क्योंकि जो भी लोग इस समय 50 साल के या उसके आसपास के हैं उन्होंने अपना बचपन और अपनी जवानी जो देखी है वह अपने मां बाप की पिटाई से देखी है...
याद न दिलाएं तो बेहतर है।

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मनोज बाजपेयी - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
अब हमें अपने बच्चों के हिसाब से बदलना पड़ रहा है। ये इकलौती पीढ़ी होगी शायद जिसने पारिवारिक मूल्यों में इतना बदलाव देखा है। तो मनोज बाजपेयी ने बेलिया से लेकर बंबई (अब मुंबई) तक के 30-40 साल में कितना बदलाव आया है?
मैं जिस परिवार से आता हूं वहां बाप नहीं मारता था। वहां मां मारती थी और ये सोचकर मारती थी कि ये मर जाएगा। मैं एक मातृप्रधान परिवार का लड़का हूं। शांत रहने वाला लेकिन जिद्दी था। मेरी जिद के कारण मेरी मां को बहुत परेशानी हुई। लेकिन, चूंकि मेरी माता जो थी वह सर्वेसर्वा थी हमारे परिवार की। उसके कारण हमारे परिवार में हमारी परवरिश अलग हुई। एक पुरुष प्रधान परिवार के बच्चे और एक स्त्री प्रधान परिवार के बच्चे में जो फर्क होता है वह मुझमें भी रहा। अगर कोई मेरी हमउम्र लड़की या कोई छोटी भी लड़की अगर वह कुछ ऐसा तर्क मेरे साथ करे जिसका मेरा पास जवाब तो होगा लेकिन मैं दूंगा नहीं। पता नहीं क्यों, लेकिन माता के कारण उसे सम्मान कहें या महिलाओं से डर वह कभी गया ही नहीं। मैं आज भी महिलाओं से बहुत डरता हूं।

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मनोज बाजपेयी - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
और, दिल्ली के अनुभवों ने आपको कितना बदला?
जब मैं दिल्ली गया तो वहां यूनिवर्सिटी में गुजारे दिनों ने मुझे बदला। मुझे बदलने में दिल्ली का बहुत बड़ा हाथ रहा। बैरी जॉन का बहुत बड़ा हाथ रहा। बल्कि सबसे बड़ा हाथ बैरी जॉन का रहा। फिर जो मैंने जो रंगमंच किया, लोगों से मिलना शुरु किया, बौद्धिक बातें करना, फिल्में देखना, बातचीत में शामिल होना,  अलग अलग विचारधाराओं के लोगों के साथ में उठना बैठना, उसने इस मनोज बाजपेयी को बनाया।

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बंदा फिल्म में मनोज बाजपेयी - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

बैरी जॉन के पास आप गए थे उनके शागिर्द बनने और उन्होंने अपने साथ का एक उस्ताद बना लिया आपको..
जी, एक साल के बाद उन्होंने मुझे अपने साथ में रखा और फिर बाद में स्वतंत्र रूप से वर्कशॉप देना शुरू कर दिया क्योंकि वह देखते थे कि 17-18 घंटे एक लड़का काम कर रहा है। ये थकता नहीं है और इसके अंदर सीखने की बहुत ललक है। उन्होंने धीरे धीरे मुझे जिम्मेदारियां देनी शुरू कर दीं। मैं तब 22-23 साल का था। मैं रोज वर्कशॉप कराते हुए खुद भी सीखता रहता था। अगले दिन मुझे क्या करना है ये भी तैयारी करता था। फिर बैरी के साथ शेयर करता था। उनसे पूछता था। ये सब करते करते मैंने बैरी के साथ दो साल रहकर करीब आठ साल की पढ़ाई कर ली। बैरी चुप तो बहुत रहते हैं लेकिन मेरी सफलता को लेकर वह अक्सर खूब बातें करते हैं। शिक्षक पिता तुल्य होता है। पिता तो मेरे गांव में थे बेलवा में. लेकिन मेरे पिता जो दिल्ली में थे वह पूरी तरह से बैरी थे। उन्होंने अपने ऊपर ये जिम्मेदारी ले ली थी कि न सिर्फ मनोज को एक अच्छा रंगकर्मी, एक अच्छा अभिनेता बनाना है बल्कि मनोज को एक बढ़िया इंसान भी बनाना है। जो भी मैं हूं या कहें कि जो भी मैं बना, वे सारे लाइफ स्किल्स, वे सारे मैनर्स, वह शिक्षा इंसान बनने की, वह बैरी ने मुझे सिखाया। यहां तक कि वह मुझसे मेरे साथ बैठकर ये बात करते थे कि समलैंगिक क्या होता है क्योंकि मुझे उन्होंने देख लिया था कि ये डरता है। तो बिठाकर वह बताते थे कि समलैंगिक क्या होता है? वे कैसे बर्ताव करते हैं, कैसे सोचते हैं...

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अलीगढ़ फिल्म - फोटो : सोशल मीडिया
और, ये आपके काम आया फिल्म ‘अलीगढ़’ में?
बिल्कुल काम आया और वैसे भी मेरे बहुत सारे समलैंगिक दोस्त है। चाहे अपूर्व असरानी हों जो दुनिया के सामने पूरी तरह से एलजीबीटीक्यू (लेस्बियन, गे, बाइसेक्सुअल, ट्रांसजेंडर, क्वीर) बिरादरी का चैंपियन है। हीरो है। इन सब लोगों ने मुझे बहुत सिखाया है। मुझे लगता है जब बात प्रेम की आती है तो न आपका दखल हो सकता है न मेरा दखल हो सकता है। जैसे जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा कि बात सिर्फ जननांग की नहीं है, बात भावनाओं की है। हमें उन भावनाओं का सम्मान करना चाहिए। उसकी कद्र करनी चाहिए तभी तो एक स्वस्थ समाज हम बना पाएंगे।

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बंदा फिल्म में मनोज बाजपेयी - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
वर्कशॉप करने का जो आपका अनुभव है चाहे वह बैरी जॉन के यहां रहा हो, एनएसडी का रहा हो, उसे कितना मिस करते हैं और अगर मौका मिले तो क्या फिर से झुग्गी बस्तियों के बच्चों के लिए ऐसा कुछ करना चाहेंगे?
मैं तो वर्कशॉप लेता रहता हूं लेकिन बच्चों के साथ मेरा काफी कम हो गया है। मेरी इच्छा है कि थोड़ा सा खाली हूं तो बच्चों के साथ फिर से वह सब करूं। स्कूल जाने वाले बच्चों की वर्कशॉप करूं यहां मुंबई में जहां मेरी बेटी भी उस वर्कशॉप का हिस्सा बने। मैं उसको ये अनुभव देना चाहता हूं थियेटर वर्कशॉप का। क्योंकि वर्कशॉप पर्सनैलिटी को बनाता है और मेरे हिसाब से सारे स्कूल में सारे हिंदुस्तान में थिएटर कंपलसरी कर देना चाहिए। थिएटर सिर्फ एक्टर ही नहीं बनाता। ये व्यक्तित्व विकास के लिए भी बहुत जरूरी है। ये बहुत ही जरूरी है। पता नहीं क्यों ये थियेटर वर्कशॉप को बड़े बड़े स्कूल भी इग्नोर करते हैं। महंगे स्कूल भी इग्नोर करते हैं जबकि वह अफोर्ड कर सकते हैं। एक टीचर तो अफोर्ड कर ही सकते हैं जो अलग अलग दिन पर अलग अलग कक्षाओं के लिए वर्कशॉप चलाए।

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बंदा फिल्म में मनोज बाजपेयी - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
पहले तो बहुत सारे स्कूल में वार्षिकोत्सव में नाटक होते ही थे, तीन तीन महीने तक इन नाटकों की रिहर्सल चलती रहती थी..
बहुत सारे स्कूलों में है ऐसा, दिल्ली के सरकारी स्कूलों में है ऐसा। मेरी दिल्ली के पूर्व शिक्षामंत्री मनीष सिसोदिया से इस बारे में बड़ी लंबी बातचीत भी हुई थी। मैंने उनसे निवेदन किया था कि आप लोग कृपया इसे कीजिए। मैं सारी राज्य सरकारों से जब भी उनके साथ मौका मिलता है बैठने का, तो यही निवेदन करता हूं कि आप रंगमंच को कंपलसरी कीजिए।

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बंदा फिल्म में मनोज बाजपेयी - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
आप कहते है कि समाज के लोगों से आपके किरदारों को ताकत मिलती है। क्या साहित्य से भी आपको ताकत मिलती है क्योंकि आप कविता पाठ बहुत अच्छा करते हैं..
कविता क्योंकि मैं बहुत बचपन से करता रहा हूं। एलोक्यूशन (श्रेष्ठ वक्तृत्व कला) कंपटीशन में भाग लेता रहा हूं। वहां से वह मेरी एजूकेशन शुरू हो गई थी और साहित्य के प्रति लगाव भी वहीं से शुरू हुआ था। फिर प्रेमचंद की कहानी पढ़ी तो मैं पागल ही हो गया। पता नहीं क्यों, लेकिन जो स्टेशन पर उपन्यास बिकते थे मेरा मन उन्हें पढ़ने का नहीं करता था। बिल्कुल नहीं करता था..

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बंदा फिल्म में मनोज बाजपेयी - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
मतलब वेद प्रकाश शर्मा और सुरेंद्र मोहन पाठक के उपन्यास आपने कभी पढ़े ही नहीं?
सुरेंद्र मोहन पाठक वगैरह मैंने बाद में पढ़ा। प्रेमचंद मैं पहले पढ़ चुका था। सुमित्रानंदन पंत मैं पहले पढ़ चुका था। बहुत सारे दोस्तों ने कहा कि इब्ने सफी को पढ़ो। गुलशन नंदा को पढ़ो। गुलशन नंदा जी ने कोई स्क्रिप्ट लिखी थी जिस पर फिल्म बनी थी तो मैंने उनको पढ़ना शुरू किया। ‘दाग’ उन्हीं की कहानी पर बनी थी, बहुत सुंदर फिल्म लिखी थी। तब मैंने कहा कि सुमित्रानंदन पंत तक जाने के लिए पाठक को गुलशन नंदा और इब्ने सफी से होकर जाना पड़ेगा। ये लोग आम जनता के लिए बहुत जरूरी हैं।

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मनोज बाजपेयी अमिताभ बच्चन के साथ - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
और रामधारी सिंह दिनकर की कविताओं का आपकी शख्सीयत पर कितना असर पड़ा है?
रामधारी सिंह दिनकर की कविताएं मेरे संघर्ष के दिनों की कमाल की साथी हैं। उनकी दो चार लाइनें भी अगर आप कहीं से भी उठा लीजिए तो आपको कभी डिप्रेशन में जाने ही नहीं देंगी। मुझे जैसा याद है मैं अपनी परिस्थिति से ही लड़ता रहता था। संघर्ष के दिनों में। अचानक मैं बैठा हूं और अपने आप से ही कह रहा हूं, ‘याचना नहीं अब रण होगा, जीवन जय या मरण होगा’..गुस्से में। मेरा गुस्सैल स्वभाव रहा था। रामधारी सिंह दिनकर की कविताओं ऑटोमैटिकली मेरे पास आ जाती थीं क्योंकि उसमें वीर रस की बातें हैं।

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मनोज बाजपेयी - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
इन दिनों कुछ पढ़ते हैं हिंदी की किताबें, नए लेखकों की मसलन..
हां, पढ़ता हूं। बहुत सारे नए लोग मुझे दे देते हैं अपनी किताबें तो उनको मैं पढ़ लेता हूं। नाम तो नहीं याद हैं इस समय किसी के। बहुत सारे ऐसे हैं जिनमें मुझे बहुत सारी संभावनाएं भी आईं नजर। एक जो मैं चीज देख रहा हूं जैसे मेरे एक दोस्त हैं डॉ. दिनेश शर्मा। वह व्हाट्सऐप पर मुझे चार चार पेज के संस्मरण भेजते रहते हैं। लिखते हैं और मुझे भेजते हैं। फिर मैं उस पर अपनी प्रतिक्रिया देकर उनको वापस भेजता हूं। मेरे लिए वह भी किताब है। दुख मुझे इस बात का है कि मेरा दिन में पढ़ाई का जो समय है वह एक तो कम होता है दूसरे मुझे उस समय में नई आने वाली स्क्रिप्ट खत्म करनी होती है क्योंकि किसी को जवाब देना है।
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मनोज बाजपेयी - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
संगीत के प्रति आपका लगाव कैसे और कहां से शुरू हुआ?
इसको मैंने अपने अंदर पैदा किया। मैं सुगम शास्त्रीय संगीत ज्यादा सुनता था जो कि हिंदी फिल्में होती हैं। हिंदी फिल्मों के गानों का बड़ा शौक था मुझे क्योंकि फिल्मों का बड़ा शौक था। मोहम्मद रफी साहब हों या किशोर कुमार साहब हो महेंद्र कपूर साहब हों या मन्ना डे साहब हों। सहगल साहब वगैरह को तो सुनता भी नहीं था। क्लासिकल की तरफ जाता ही नहीं था मैं। जब मैंने थियेटर करना शुरू किया तब मैंने देखा कि मैं तो बहुत पीछे हूं क्योंकि ऐसे ऐसे खुद गाने वाले लोग हैं यहां पर और ये सब भीमसेन जोशी जी को सुनने जाते हैं, किशोरी अमोनकर जी को सुनने जाते हैं। और, ये सब मुझे बहुत ही तुच्छ नजर से देख रहे हैं कि ये तो फिल्मी गाने सुनने वाला आदमी है इसको तो क्सालिकल म्यूजिक सुनने की तमीज ही नहीं है। तब मैंने जबर्दस्ती सारे के सारे कंसर्ट में जाना शुरू किया। कमानी ऑडिटोरियम में होता था या श्रीराम सेंटर में। पहले करीब 10 कंसर्ट में मुझे नींद ही आ जाती रही। फिर एक बार हम सुनने गए। किसी ने कहा पाकिस्तान से आए हुए हैं सूफी गाते हैं। हम लोग सुनने गए और जब सुनने लगे तो मुझे लगा कि क्या जादू है! क्लासिकल म्यूजिक लेकिन समा बंध गया इतना जोश हम सबमें। तालियां बज रही हैं। बाद में पता चला कि ये नुसरत फतेह अली खान हैं। मैं बात कर रहा हूं 35 साल पहले की। उस समय जो वह शबाब पर थे और जिस तरह से वह समा बंधा तो वहां से मेरी क्लासिकल की यात्रा शुरू हुई। और, आज ये है कि बिना कुमार गंधर्व को सुने मेरे दिन की शुरुआत नहीं होती है। संगत के कारण ही आपका व्यक्तित्व बदलता है। संगत आपको बहुत कुछ देकर जाती है। जरूरी ये है कि आप किस संगत में हैं?


यह पूरा इंटरव्यू आप यहां देख और सुन भी सकते हैं..

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