छोटा परदा अब बड़ा होना चाहता है। बरसों से अपने ऊपर लगे बुद्धू बक्से के तमगे को वह नोंच फेकना चाहता है। सास बहू की कहानियों के दिन कब के पूरे हो चुके हैं। नए दौर में नए तरह की कहानियों की तलाश हो रही है। ऐसी कहानियां जिनमें जिंदगी की सच्चाई हो, समाज से भिड़ने की जिजीविषा हो और हो अपने बूते समुदाय की बेहतरी की कोशिश। ऐसी ही एक कहानी है जौनपुर, उत्तर प्रदेश की बिटिया मनीषा यादव की। मनीषा ने अपनी कॉरपोरेट नौकरी छोड़कर मुंबई में अपने बुजुर्ग पिता के ऐसे कारोबार को आगे बढ़ाने का बीड़ा उठाया जिसमें महिलाओं का आना अब भी वर्जित ही माना जाता है। मनीषा ने तमाम विकट परिस्थितियों में इस काम को कामयाबी का मुकाम दिया है। वह कहती हैं, ‘बाकी सब तो बाद में है, आप तो बस ये सोचकर देखिए कि पूरा पूरा दिन मैं सिर्फ इसलिए पानी नहीं पीती थी क्योंकि जहां हमारी फैक्ट्री है, उस औद्योगिक क्षेत्र में महिलाओं के लिए कोई शौचालय ही नहीं है जहां मैं लघुशंका समाधान के लिए जा सकती।’