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Makrand Deshpande Long Interview: ‘मुझे मंजिल तक पहुंचना ही नहीं है, मैं यात्रा में रहना चाहता हूं’

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मकरंद देशपांडे - फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई
आंखों में अब भी कुछ कर गुजरने का जुनून, शरीर में अब भी किसी युवा सी ही लचक और बातों में अब भी किसी बच्चे सी खनक, ये 54 के हो चले मकरंद देशपांडे की पहचान हैं। हिंदी के अलावा मराठी, तमिल, तेलुगू, कन्नड़ और मलयालम सिनेमा में बड़ा नाम कमा चुके मकरंद का रंगमच में भी बड़ा काम है। वह अब तक छोटे बड़े मिलाकर करीब सौ नाटकों का मंचन कर चुके हैं। फिल्मों से जुड़ी हस्तियों के लंबे इंटरव्यू की श्रृंखला में अगला ‘लंबा इंटरव्यू’ उन्हीं का है। वरिष्ठ लेखक-निर्देशक विनोद पांडे के इंटरव्यू को किस्तों में प्रकाशित करने के दौरान पाठकों ने हमसे ये ‘लंबे इंटरव्यू’ एक साथ ही प्रकाशित करने की फरमाइश की सो मकरंद का पूरा इंटरव्यू एक बार में ही प्रकाशित किया जा रहा है। वरिष्ठ फिल्म समीक्षक पंकज शुक्ल ने इस बार मकरंद देशपांडे से उनके जीवन दर्शन, उनकी कला, उनके माता-पिता और उनकी सामाजिक सोच पर लंबी बातचीत की है। आपकी टिप्पणियो का इंतजार रहेगा।

मकरंद भाई, अरसे बाद आप कैमरे के सामने लौटे, इस बार सिनेमा में क्या खींच लाया आपको?
वेब सीरीज ‘हंड्रेड’ मैंने रुचि नारायण के लिए की, और फिल्म ‘सड़क 2’ महेश भट्ट के लिए। रुचि नारायण का सिनेमा को लेकर बात करने का अंदाज अलग है, रोचक है। वह सिनेमा को समर्पित इंसान हैं। उन्होंने हनुमान जी पर एक फिल्म बनाई थी और तमाम कठिनाइयों से गुजरीं। फिर भी लगी रहीं। अपने जीवन सिद्धांतों के अनुसार मैं उन्हें ना नहीं बोल सकता था। मुझे एक अपराधी का साफ सुथरा लुक उनकी सीरीज ‘हंड्रेड’ में पसंद आया। उसकी कलमें स्याह से सफेद हो चली हैं। वह रहता बिल्कुल टिपटॉप है। तो ऐसे लोग हैं अंडरवर्ल्ड की दुनिया में और यही इस किरदार का आकर्षण है।
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कयामत से कयामत तक - फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई
रुचि नारायण की इससे पहले आई फिल्म ‘गिल्टी’ तो बहुत ही सामयिक बन पड़ी, क्या कहेंगे?
मुझे लगता है कि यह एक बहुत ही हिम्मतभरा प्रयास रहा। स्त्री सशक्तीकरण की जो वह बात करती हैं, उसे आकर अब खुले में बोलना पड़ेगा। कानून कोशिश कर रहा है लेकिन कानून की अपनी दिक्कतें हैं। जो न्याय मिलना है, वो मिल ही रहा है ऐसा नहीं है। निर्भया मामले में कानून ने जो किया वह एक महान उदाहरण है। पुरुष प्रधान संस्कृति में क्रूरता बहुत है। लोग ये भी बोलेंगे कि स्त्री भी तो क्रूर होती है लेकिन इसका कोई मतलब नहीं है। इसका कोई अर्थ नहीं है। हम पुरुष प्रधान संस्कृति में मानकर चलते हैं कि स्त्री गौण है। निर्बल है। दुबली है। ‘हंड्रेड’ में एक ऐसी पुलिस अफसर दिखती है जो महिला होने के चलते खाकी पहनकर भी कुछ नहीं कर सकती।

महिला सशक्तीकरण का जिक्र चला तो मुझे आपका फिल्म ‘कयामत से कयामत तक’ का किरदार बाबा याद आता है, जो कहानी में आता ही है लड़कियों को छेड़ने…
(जोर से हंसते हुए..) हमारी जो पुरानी फिल्में रही हैं उनमें जब तक हीरोइन को छेड़ा न जाए तब तक हीरो नहीं बनता। पहले के जमाने में क्या होता था कि इंटरवल के पहले एक विलेन चाहिए होता था फिर इंटरवल के बाद दूसरा बड़ा विलेन चाहिए होता था। तो हम वो इंटरवल के पहले वाले छोटे विलेन थे। लेकिन, ये सब करने में घिन भी बहुत आती है। ‘अंत’ नाम की एक फिल्म थी सुनील शेट्टी की। उसमें मैं एक नेता का बेटा हूं। मेरे लिए तो बड़ा मुश्किल होता था वो रेप सीन करना। फिर मैं सोचने लगा कि यार ये मैं क्या कर रहा हूं, मैं कौन हूं और क्यों ये करवाया जा रहा है मुझसे। फिर मुझे खुद ही इसका उत्तर मिला और इसी के चलते मैंने फिल्मों में काम करना बंद कर दिया था। सब वही करवाना चाहते थे और उस पर तुर्रा ये कि इसको अच्छे से कर दो। भई, इसमें अच्छा क्या होता
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मकरंद देशपांडे - फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई
मुझे सिनेमा में अगर कोई फकीर दिखता है तो वह सूरत मकरंद देशपांडे की है, कैसे बचा लेते हैं खुद को ग्लैमर के इस मोह से?
हां, ये सच है कि लोगों को मैं फकीर जैसा लगता हूं। कभी आमिर (खान) ने भी यही कहा था कि मैं फकीर हूं। बात उन दिनों की है जब मैं 17-18 साल का था और क्रिकेट खेल रहा था। ग्राउंड पर मुझे ऐसा एक विचार आया कि कभी तो यहां से रिटायर होना पड़ेगा। फिर मेरे मन में विचार आया कि नहीं नहीं ऐसा कोई काम नहीं करना है जिसमें रिटायर होना पड़े। क्योंकि जीवन का और जीने का कोई विकल्प नहीं है। जीना तो पड़ेगा ही तो कोई ऐसा काम करते रहो कि जिसमें जीवन आपका आपके काम के साथ में रहे।

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मकरंद देशपांडे - फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई
तो दुविधा के समय आप किससे मार्गदर्शन लेते हैं?
मेरे जीवन में दुविधा कम ही रही। मुझे ऐसा कभी नहीं लगा कि ये एक्टिंग ही जीवन है। मुझे ऐसा लगा कि जीवन इसके बाहर भी बहुत कुछ है। मैं उसी हिसाब से जीता हूं। समय अपना साथ होना चाहिए ताकि जीवन उसके हिसाब से चलता रहे। मुझे कोई आत्मकथा लिखनी नहीं है। आत्मकथा लोग लिखते हैं दुनिया को बताने के लिए कि देखो मैंने ये मकाम हासिल किया। मैंने ये किया, मैंने वो किया तो मैंने तय किया कि मुझे मंजिल तक पहुंचना ही नहीं। मैं यात्रा में रहना चाहता हूं। सहज जीवन जीना चाहता हूं। आपने पूछा था ना कि दुविधा हो तो किससे मार्गदर्शन लेते हैं, मैंने अपनी मां से पूछा था कि क्या करूं? उसने इतना ही कहा, ‘जो सहज बन रहा हो वो कर लेना चाहिए।’ मुझे लगता है कि सहज वही है जिसमें आप कुछ भी छोड़ सकते हैं। क्या है कि मुझमें वह अहंकार भी नहीं है।
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निर्मला देशपांडे और विनायक देशपांडे - फोटो : मकरंद देशपांडे
और पिता जी से क्या सीखा?
मेरी माता जी निर्मला देशपांडे चल बसीं अभी चार पांच साल पहले। पिताजी विनायक देशपांडे का हाथ अभी मेरे सिर पर है। वह भारतीय डाक में सार्टिंग अफसर थे। उनसे मैंने हिंदुस्तान सीखा है। उनकी उम्र अभी 96 साल की है। लेकिन, वह कैसे बात करते हैं, मैं बताता हूं। जैसे मैं नाम ले दूं, कटनी। तो बस मैं कटनी नाम भर ले दूं तो वो मुझे बता देंगे कि कटनी एक जंक्शन है वहां से शहडोल क्या जाता है, वहां से गुजरने वाली सारी ट्रेनों के बारे में वह बता देंगे। मतलब कि उनके दिमाग में पूरा हिंदोस्तान बसा हुआ है। कई राज्यों में रहे, ज्यादातर वक्त उन्होंने ट्रेन में बिताया है, उनको जो हिंदुस्तान की मालूमात है वह गजब है।
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आमिर खान और मकरंद देशपांडे - फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई
जीवन के बहाव में ‘गंगोत्री’ की बात भी करनी ही होती है, तो आमिर खान हों या शाहरुख खान, ये सब आपके अभिनय की गंगोत्री के साथी हैं, कैसा नाता है इन दोनों से?
मैं जब रंगमंच पर हुआ करता था तो आमिर मेरे एक नाटक में बैकस्टेज भी कर चुके हैं। उन्हें मैं तब से जानता हूं। आमिर उन दिनों टेनिस प्लेयर हुआ करते थे। वह तो मेरे सामने ही अभिनेता बने फिर स्टार बने। शाहरुख और मैं ‘सर्कस’ में मिले थे। वह तब तक टीवी स्टार हो चुके थे। सीरियल ‘फौजी’ हिट हो चुका था। मुझे याद है, वह शूटिंग पर एक इतनी बड़ी अटैची लेकर आया था जितनी बड़ी अटैची मैंने पहले कभी नहीं देखी। पता चला कि सीरियल में पहनने के लिए वह अपने ही सारे कपड़े ले आया था। अरसे बाद, एक दिन जिस स्टूडियो में मेरी शूटिंग चल रही थी, वहीं शाहरुख का कुछ शूट था। मैं वहां लंच के बाद लेटा हुआ था। एकदम से लगा कि कोई सीने पर बैठ गया है। आंख खुली तो वह शाहरुख था। कहने लगा, ‘तुम डायरेक्टर हो और सो रहे हो!’ ऐसा नहीं है कि मैं फोन करूंगा तो अब ये दोनों मुझे झट से मिलने बुला लेंगे लेकिन हां मैंने एक मराठी फिल्म निर्देशित की थी तो मैंन आमिर से पूछा कि ऑडियो लॉन्च के लिए आओगे। तो उसने कहा कि एक काम करता हूं प्रीमियर पर आता हूं और वो आया।
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स्वदेस - फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई
और, फिर आप साथ एक फ्रेम में दिखे फिल्म स्वदेस में?
हां, और फ्रेम बनाने वाला आशुतोष गोवारिकर। ‘सर्कस’ हम तीनों ने 1990 में किया था और 2003 में की थी फिल्म ‘स्वदेस’। 13 साल बीच में बीत गए और 13 साल बहुत होते हैं। जीवन का एक अहम हिस्सा हम जी चुके थे। आधी जवानी हमारी गुजर चुकी थी। लेकिन हम फिर मिले तो बहुत मजा आया। आशुतोष तब तक लगान डायरेक्ट कर चुका था, स्टार डायरेक्टर बन चुका था और शाहरुख खान भी बादशाह खान बन चुका था। मैं बहुत सारा थिएटर जी चुका था। हम तीनों जब दोबारा मिले तो सबसे मजेदार बात जो हुई और जो मुझे याद रही वह ये कि शाहरुख जब मुझसे मिला तो उसने मुझसे जो सबसे पहली बात की वो थी ‘दानव’ की। मुझे बहुत अच्छा लगा कि उसे पहले से पता था मैं क्या क्या कर चुका हूं। ये जो लोग कहते हैं कि ये सब सुपरस्टार बन गए तो इनका रवैया बदल गया लेकिन मैं सच बताऊं तो ये लोग मेरे साथ वैसे ही रहे। मैं शशि कपूर साहब के अंतिम संस्कार में गया हुआ था तो वहां पर शाहरुख ने दूर से मुझे देखा होगा और चुपचाप से मिल कर चला गया।

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मकरंद देशपांडे - फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई
और, ऋतिक रोशन?
आपने एक बहुत ही अच्छी फिल्म ‘गुजारिश’ की बात छेड़ी है। मैं उस दिन का अनुभव बताऊं तो ये था कि रिहर्सल करनी थी और वो जैसे कि बीमार है, बिस्तर पर है तो हमने थोड़ी सीन की रिहर्सल की। दो सीन थे। फिर अचानक से संजय लीला भंसाली ने कहा कि इन दोनों को मिलाकर एक सीन बना देते हैं और एक काम करें कि इसको वन शॉट करते हैं। आमतौर पर ऐसे मौकों पर बड़े सितारे झिझकते हैं। लेकिन, इसके लिए ऋतिक भी तैयार था। फिर शूटिंग शुरू होने से ठीक पहले मुझे कुछ सूझा तो मैंने कहा कि मुझे फूल चाहिए। सेट पर फूल थे नहीं। भंसाली साब ने पूछा कि क्यों चाहिए मकरंद को फूल? तो मैंने कहा कि अगर कोई कलाकार आदमी आ रहा है तो वह फूल लेकर ही आएगा। तो शूटिंग रुक गई। फूल मंगाए गए। तो जो वो मैं फूल मारता हूं न, उसमें ऋतिक जैसा एक्टर कह सकता है कि ये क्या कर रहे हो लेकिन वो जो आखिर में मैं उसके ऊपर फूल रखता हूं जैसे कि वह एक लाश है। उसमें ऐश्वर्या भी है सीन में। मै उसको भी मारता हूं तो वो बाहर जाती है फिर आती है तो बड़ा एक कोऑर्डिनशन सा था। वो दो सीन का एक सीन बनाया गया। वन टेक ओके हो गया। किसी ने कहा एक सेफ्टी टेक करते हैं तो भंसाली ने कहा कि क्यों करना है? उस सीन के बाद ऋतिक मेरे पास आया और उसने मुझे फूलों का वही गुलदस्ता दिया एक प्यारी सी तारीफ के साथ। ये तीनों अपने काम के प्रति सजग हैं। ऋतिक का स्टारडम ही अलग है। उसका लुक। उसका स्टाइल। उसके जैसा डांसर नहीं है। मैं तो उसे देखना ही बहुत पसंद करता हूं।

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मकरंद देशपांडे - फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई
अमिताभ बच्चन के साथ काम करने का भी कोई तो किस्सा जरूर होगा?
अमिताभ बच्चन रिहर्सल खूब करते हैं शूटिंग से पहले। ‘बुड्ढा होगा तेरा बाप’ में सीन था हमारा तो उन्होंने कहा कि रीडिंग करें तो मैंने कहा हां शुरू करते हैं। फिर मैं एकाएक रुक गया तो उन्होंने पूछा कि क्यों रुक गए। मैंने कहा कि सर आप एक लाइन आगे चले गए। उन्होंने अपनी स्क्रिप्ट देखी और एकदम से चुप हो गए। फिर अपने ही हाथों से अपने ही गालों पर थपकियां लगाने लगे। मतलब कि कैसे मिस हो गया। ऐसा वह न भी करते तो क्या होता? लेकिन, उस दिन मुझे समझ आया कि ये आदमी इतना बड़ा क्यों है? वह जिस सीन में जितना कुछ दे सकते हैं, उससे रत्ती भर भी कम नहीं देना चाहते। उनको काम करते देखना ही अलग अनुभव है। मेरा अपना मानना है कि अमिताभ बच्चन अगर नाटकों में काम करते तो कमाल करते। सोचिए कि पूरा एक ओपन एयर थिएटर हो, बीच में अमिताभ बच्चन हों, सामने 10 हजार लोग और नाटक किसी सामाजिक परिदृश्य पर चल रहा हो। उनमें एक ताकत है शब्दों की, उनका कहा सुनने को लोग शांत हो जाते हैं। उनके भीतर एक अलग ऊर्जा है।

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मकरंद देशपांडे - फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई
किसी फिल्म के बारे में पता चले कि इसमें मकरंद देशपांडे भी है तो लोगों की पहली प्रतिक्रिया यही होती है कि अरे, ये तो सत्या वाला वकील है..
‘सत्या’ जब बन रही थी तो उसका लुक क्या होना चाहिए, इस पर चर्चा हो रही थी। तब मैंने रामू (रामगोपाल वर्मा) से कहा कि देखो ये आदमी जो अगर ज्यादातर अपना वक्त एक कोर्ट छोड़ दिया जाए तो इन्हीं के साथ उठता बैठता है तो क्यों न हम उसको ऐसे ही रखें कि अगर उसके कपड़े चेंज कर दिए जाए तो ये उनमें से ही एक लगेगा। तो आप उसको वैसा ही रखो बस उसके ऊपर एक कोट डाल दो। रामू को इस सुझाव पर बड़ा मजा आया। पिक्चर रिलीज होने के बाद मुझे किसी ने फोन किया कि ऐसा वकील वाकई में है। जो ऐसा ही दिखता है। ऐसा ही रहता है।

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मकरंद देशपांडे - फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई
रामगोपाल वर्मा के साथ लंबा सिलसिला रहा है..
बहुत लंबा रहा है और अभी मैंने एक फिल्म की है उनकी। हॉरर फिल्म है। इमोशनल हॉरर फिल्म है। लंबा रिश्ता है उसके साथ, वो एक ऐसा आदमी है जिसके बारे में मैं हमेशा कहता हूं कि सत्या को फिल्मफेयर क्रिटिक अवार्ड की बजाय अगर तभी फिल्मफेयर मेन अवार्ड दिया जाता तो हिंदी सिनेमा बदल जाता। जैसे इस बार ऑस्कर अवार्ड फिल्म ‘पैरासाइट’ को दिया गया। इसके पीछे सोच यही है कि इससे हॉलीवुड का सिनेमा बदलेगा। हमें भी अपना सिनेमा बदलने के लिए कुछ तो साहसपूर्ण करना पड़ेगा।

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मकरंद देशपांडे - फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई
सत्या, कंपनी या जंगल जैसी फिल्में बनाने वाले रामगोपाल वर्मा हाशिये पर क्यों चले गए, आप तो उनके बहुत करीब रहे, आपका क्या मानना है?
राम गोपाल वर्मा ने सिनेमा में बहुत प्रयोग किए। रंगीला देख लो। बाद में भूत देख लो। वह आदमी जॉनर बदलता रहा और कभी विफलता से डरा नहीं। तब उनके साथ काम करते हुए ऐसा लगता था कि हम दोस्त के साथ काम कर रहे हैं। जो जानता है और आपको सुनता है। और मानता भी है कि मैंने जो किया वो ठीक नहीं था और तुमने जो उस वक्त कहा था वो मैं अब बताऊं तो सबसे सही था। बहुत जीनियस आदमी है वह। बाद में उसने खराब फिल्में की। मेरा ऑब्जर्वेशन ये रहा कि टैलेंट क्या है इसकी अगर परिभाषा करनी होगी तो ये है कि जिसको उस विषय या उस परिवेश में जितना जानना चाहिए उतना पता है। अगर आपने यह मान लिया कि कोई भी लिख सकता है, कोई भी एडिट कर सकता है, कोई भी एक्टिंग कर सकता है, कोई भी शूट कर सकता है तो ये ‘कोई भी’ नहीं सफल होता। हर कोई, सब कुछ नहीं कर सकता, ये बात वह मानने को तैयार नहीं। मेरा ये मानना है कि ज्यादा ज्ञानी लोगों के साथ ये होता ही है।

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मकरंद देशपांडे - फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई
महेश भट्ट भी उसी राह चले हैं, ‘सड़क 2’ में काम करने के लिए हां कैसे कर दी?
अब इसमें कैसा है कि भट्ट साब के साथ मैंने बहुत काम किया है और उन्होंने मुझे फोन किया। जयपुर में हम थिएटर फेस्टिवल के लिए मिले थे। वह भी आए थे तो बातचीत हुई। लौटकर उन्होंने फोन किया। पूजा भट्ट ने फोन किया था। वो हमेशा से मेरी बहुत अच्छी दोस्त रही। भट्ट साब मेरे घर आए औऱ उन्होंने मुझे पूरी फिल्म की कहानी सुनाई। और मुझे ऐसा लगा जैसे कोई एक बाबा मिल गया मुझे। मुझे तो इस फिल्म में काम करने में बहुत मजा आया।

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मकरंद देशपांडे - फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई
और खुद को इतना दुनिया से दूर कैसे रख पाते हैं?
मैं अभी गांधीजी की पुस्तक ‘सत्य के साथ मेरे प्रयोग’ पढ़ रहा था। इस किताब का सार यही है कि क्या आप खुद पर हंसकर अपनी पोल खुद खोल सकते हैं। वह जो कुछ इस किताब में कह रहे हैं, अपने ऊपर लांछन लगाकर सच कह रहे हैं। महात्मा बन चुके हैं वह ये सब लिखते समय लेकिन कह रहे हैं कि जब भी मुझे महात्मा कहा जाता है मुझे अच्छा नहीं लगता। गांधी को पढ़कर मेरी समझ में तो एक ही बात आई कि कुछ जानना है तो दुनिया पहले घूमनी पड़ेगी। गरीब से मिलना पड़ेगा। दरिद्र में ही नारायण बसता है। मैं जब भी किसी गरीब को देखता हूं तो इतना दुख होता है कि क्या कहें। हम किन किन मुद्दों पर झगड़ रहे हैं। क्या बहसें कर रहे हैं? लोगों के पास खाने को नहीं है। चलो मान लिया कि आज तो महामारी हुई है लेकिन जब भी सांप्रदायिक झगड़े हुए तो मरता तो गरीब ही है ना। कभी आपने सुना कि कोई अमीर किसी महामारी में सड़क पर भूख से मर गया। हमेशा गरीब मरता है।

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मकरंद देशपांडे - फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई
अच्छा महामारी का आपने जिक्र किया तो इस समय जो सावधानियां लोग अपना रहे हैं, उसकी परंपरा तो भारतीय समाज में शुरू से रही है, नहीं?
गांवों में पहले गरीब भी वो सारे कर्म वही करता था जिनका आज प्रचार हो रहा है। और वह ये कि घर में घुसो तो हाथ पैर अवश्य धो लो। जूते वगैरह दरवाजे से बाहर ही रखो। जूता पहनकर घर में नहीं आते थे, क्यों? संक्रमण को रोकने के लिए। हमारे समाज की तमाम अच्छी बातें रहीं जिनको पंडिताई से जोड़ दिया गया लेकिन किसी ने अमल नहीं किया। साने गुरुजी ने बताया कि क्यों हम खाना खाते समय चारों तरफ पानी गिराते थे? क्यों खाने का एक टुकड़ा निकालकर बाहर रखते थे जिसको हम चित्रावली कहते हैं? वो इसलिए कि आसपास के जंतु कीटाणु उसको खाते रहें आप अपना खाना खा लीजिए। पानी की आपने सीमारेखा बना दी तो कीटाणु पास नहीं आते हैं। हमारे विश्वास, शास्त्र के विचार कुछ तो समझाते ही थे।

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मकरंद देशपांडे - फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई

तो भक्तिमार्ग के अनुयायी हैं आप?
हमारे यहां भक्ति बहुत बड़ी बात मानी गई है। लेकिन, भक्ति किसकी? ईश्वर की भक्ति। भक्ति मार्ग जो है वही सबसे बड़ा मार्ग है। हमारी भक्ति हमारी कला के साथ है। अपनी कला के प्रति समर्पण ही सारा अहंकार खत्म कर देता है। शनि महाराज का भी तो यही है। जब जब आपको अभिमान होगा, अहंकार होगा तब तब वो आपके परेशान करेंगे। अगर आपने अहंकार नहीं रखा तो कोई दिक्कत नहीं है। आज तक मेरी एक बात समझ में नहीं आई जो मैंने सिर्फ राजनीति में सुनी है। वह है शक्ति प्रदर्शन। अगर आपके पास शक्ति है तो प्रदर्शन करने की जरूरत क्या है? आपका ज्ञान आपके विवेक से झलकता है, आपके लेखन से नहीं। इसी तरह आप कितने लोगों को लेकर साथ चल सकते हैं, यही आपकी शक्ति होनी चाहिए। शक्ति का मतलब दूसरों के प्रयासों को नकारने में नहीं है।

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मकरंद देशपांडे - फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई
और अंतिम प्रश्न रंगमंच के ह्रास के बारे में है। कोरोना से बनी परिस्थितियों ने रंगमंच की एक धारा ‘जुनून’ को भी लील लिया? क्या वजह मानते हैं इसकी?
संजना कपूर ने ‘जुनून’ को बंद करने का एलान किया तो इसकी फौरी वजह तो मुझे अर्थ ही समझ आता है। किसी भी आंदोलन को चलाए रखने के लिए धन की जरूरत होती है। हमारे यहां बहुत ही कम है ऐसा कि किसी सरकार ने रंगमंच को कोई अहमियत दी हो। कुछ संस्थाएं बन गई हैं देश में जो रंगमंच के नाम पर अनुदान लेती रहती हैं, वह रंगमंच के हित के लिए कुछ कर भी रहीं हैं कि नहीं कोई देखने वाला नहीं है। संजना ने रंगमंच के लिए बहुत कुछ किया लेकिन रंगमंच को लेकर वाहवाही लूटने वालों ने कभी इस तरफ ध्यान नहीं दिया। लेकिन, मैं इसे अंत नहीं मानता, मैं इस एक विराम मानता हूं। नाटक में एंट्री हुई है तो एग्जिट जरूर होगी लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि आप दोबारा एंट्री नहीं ले सकते। गौतम बुद्ध से जब पूछा गया कि आप ध्यान में कब बैठते हो और कब बाहर आते हो। उन्होंने कहा कि कब मैं बाहर आया हूं जो बैठूंगा फिर से। तो इसी अवस्था की ही तो सबको तलाश है। हमने अपना थिएटर जब शुरू किया तो सोचा कि नाम क्या रखा जाए तो मैंने कहा कि हमसे पहले भी बहुत लोगों ने रंगमंच किया है हमारे बाद भी करेंगे तो क्यों न हम अपना अंश जोड़ दें। इसलिए मैंने अपनी मंडली का नाम रखा ‘अंश’। ‘अमर उजाला’ के शहर बरेली से मेरा पुराना नाता रहा है, बरेली मैं जाता रहा हूं, वहां खूब नाटक किए हैं। जैसा कि आपने विमर्श किया है और समय ने साथ दिया तो ‘अमर उजाला’ के पाठकों के साथ कुछ समय बिताने मैं आपके साथ जरूर चलूंगा उत्तर प्रदेश के किसी शहर में। जल्दी ही।
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