लॉक अप
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इसके बाद मुनव्वर एक और शायरी सुनाते हैं और कहते हैं, "सर पर थी जिम्मेदारी, ख्वाहिशों को अपनी मारा, जताते क्या के सब, तो लिया न सहारा, मानता हूं मैं हारा हूं हजारों जंग, खुदा गवाह है मैं एक बार भी नहीं हिम्मत हारा"। इसके बाद बारी थी शिवम की और फिर वह कहते हैं, "खुशबू बनकर गुलों से उड़ा करते हैं, धुआं बनकर पर्वतों से उड़ा करते हैं, ये कैंचियां खाक हमें उड़ने से रोकेगी जनाब, हम पंखों से नहीं हौसलों से उड़ा करते हैं"। फिलहाल दोनों की शायरी ने समां बांध दिया और सभी कैदियों के चेहरे पर मुस्कान आ गई।