अमर अजाला के कंसल्टिंग एडिटर पंकज शुक्ल के साथ सचिन गोले
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
दक्षिण भारतीय फिल्मों का सहारा
फिर छोटी छोटी डबिंग मुझे मिलने लगी। फिल्मों का काम मुझे जब मिलना शुरू हुआ तो मैं भीड़ में खड़े लोगों की आवाजें निकालता था। फिर मेरी मुलाकात आवाज की दुनिया के कुछ नामचीन लोगों से हुई जैसे, कि मैं अंजू पिंकी का नाम लेना चाहूंगा। डबिंग कोऑर्डिनेटर अल्पना जी का नाम लेना चाहूंगा। फिर करते करते छोटे छोटे ऑडिशन तो मैं देता ही था तो यही आस पास में, तिलक नगर में और अंधेरी में कुछ कुछ ऐसे स्टूडियोज हैं जो साउथ इंडियन फिल्मों की डबिंग करते हैं। उन्होंने सोचा कि क्यों ना थोड़ा सा अपना भी बजट कम है। कुछ कुछ नए नए आर्टिस्ट आ रहे हैं, जिसमें सचिन गोले का भी नाम शामिल है तो चलो उसे हीरो के लिए ट्राई करते हैं। मेरी जुबान भी साफ हो चुकी थी और डबिंग की टेक्नीक मुझे आ गई थी। वहां से गाड़ी चल निकली।