अभिनेता जुनैद खान ने अमेरिका में रंगमंच सीखा है। मुंबई में तमाम नाटक किए हैं। ओटीटी फिल्म ‘महाराज’ से अपना डेब्यू किया और अब बड़े परदे पर उनकी पहली फिल्म ‘लवयापा’ रिलीज होने जा रही है। आमिर खान प्रोडक्शंस के दफ्तर में जुनैद खान ये ‘अमर उजाला’ के लिए ये खास बातचीत की सलाहकार संपादक पंकज शुक्ल ने।
जिस तमिल फिल्म ‘लव टुडे’ (2022) की ‘लवयापा’ रीमेक है, वह आपने पहली बार कब देखी? और, इस फिल्म की कौन सी खासियत ऐसी है जिसने आपको इसका हिंदी रीमेक करने के लिए उत्साहित किया?
फिल्म के निर्माता मधु मंटेना ने मूल फिल्म के अधिकार खरीदे थे और मुझसे मुलाकात में उन्होंने ये फिल्म देखने की गुजारिश की। मैंने फिल्म देखी तो मुझे ये काफी पसंद आई। फिल्म के वन लाइनर (एक लाइन में फिल्म की कहानी बताना) पर मैं मोहित हो गया था कि क्या हो अगर शादी से पहले लड़के और लड़की को अपने मोबाइल फोन की अदला-बदली करने को कहा जाए? मेरा मानना है कि प्रेम में जो बाधाएं आती हैं, वे अधिकतर हमारी खुद की बनाई हुई होती हैं।
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जुनैद खान
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
आपका जीवन मोबाइल पर कितना आधारित है? क्या लगता है कि बिना मोबाइल के भी आप रह सकते हैं?
हां, मुझे लगता है कि बिना मोबाइल के मेरा काम चल सकता है। मुझे मेरा पहला मोबाइल तब मिला था जब मैं 16 साल का था और वह भी बहुत बेसिक मोबाइल था, सिर्फ फोन कर सकने लायक। लेकिन, मोबाइल जरूरत तब बना, जब हमने इस पर वे सारे काम भी करने शुरू कर दिए जो पहले हम मोबाइल पर नहीं करते थे। जैसे मैं अब किताबें भी मोबाइल पर पढ़ता हूं। फिल्म की स्क्रिप्ट्स भी मोबाइल पर आने लगी हैं। फिल्म की शूटिंग चल रही हो तो उसके गाने और भी तमाम सारी चीजें पहले मेरे मोबाइल पर ही आती हैं।
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फिल्म 'महाराज' में जुनैद खान
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
तो कागज का प्रयोग किए हुए कितना समय हो चुका है आपको? कब कुछ लिखा था आखिरी बार या पढ़ा था?
हां, अगर हस्ताक्षर की गिनती न करें तो वाकई मुझे किसी कागज पर कुछ लिखे हुए या कुछ पढ़े हुए काफी अरसा हो गया है। लेकिन हां, नाटकों की रिहर्सल हम अब भी कागज से ही करते हैं, उससे एक लय बनी रहती है। रही बात लिखने की तो मुझे याद आता है कि फिल्म ‘महाराज’ का जो मेरा मोनोलॉग है, उसे याद करने के लिए मैंने लिखकर याद करने की शैली का सहारा लिया था। उसे लिखा भी मैंने देवनागरी में ही था।
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जुनैद खान और खुशी कपूर फिल्म में 'लवयापा'
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
वाह, तो फिर हिंदी नाटक भी आपने किए होंगे, या पढ़े होंगे?
नहीं, नाटकों के मंचन की जहां तक बात है तो वे तो मैंने अधिकतर अंग्रेजी या मिश्रित भाषा में ही किए हैं। लेकिन हां, मुझे हिंदी के नाटक पढ़ना बहुत पसंद है। ‘अंडे के छिलके’ एकांकी नाटक मुझे बहुत पसंद है। कृश्न चंदर की ‘एक गधे की आत्मकथा’ पढ़ना मुझे बहुत अच्छा लगता है।
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जुनैद के पिता आमिर खान और सौतेली मां किरण राव
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
और, अपने माता-पिता का कितना सहयोग मिला आपको अभिनेता बनने में?
मेरे माता-पिता (रीना दत्ता-आमिर खान) ऐसे अभिभावक हैं, जिनसे मैं कोई भी बात साझा कर सकता हूं। हमारे बीच इतना विश्वास है कि हमारे बीच कुछ छुपा नहीं। मेरी परवरिश बहुत ही सामान्य तरीके से हुई। स्कूल मेरा यहीं पापा के ऑफिस के पास था। कॉलेज पढ़ने मैं लोकल ट्रेन से जाता था और फिर कॉलेज के बाद जब अभिनय की बारी आई तो पापा ने ही सलाह दी कि मैं थियेटर में मास्टर्स करूं। इसके लिए मैं अमेरिका गया। लौटकर आया तो यहां पहला नाटक ‘मदर करेज एंड हर चिल्ड्रेन’ किया जिसमें मैं अरुंधति नाग का बेटा बना था।
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फिल्म महाराज के एक दृश्य में जुनैद खान
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
अपने वतन, अपने लोगों के कितना करीब हैं आप?
मेरी पहली फिल्म ‘महाराज’ हमारे पूरे परिवार ने एक साथ देखी थी। फैमिली का अर्थ मुझे उसी दिन समझ आ गया था। उस शो में मेरे पापा, मेरी मम्मी, मेरे नाना, मेरी नानी और मेरी दादी सब थे। मैं भी ये फिल्म पहली बार देख रहा था तो बजाय उनके चेहरे पढ़ने के मैं बड़े परदे पर पहली बार खुद को देखकर खुश हो रहा था। फिर इंटरवल हुआ। हां, तब तक फिल्म में इंटरवल था क्योंकि फिल्म बनी तो थियेटर के लिए ही थी, लेकिन ये निर्माता को तय करना होता है कि फिल्म किस तरह से ज्यादा से ज्यादा लोगों के पास पहुंचे। लेकिन, उस दिन सबने मुझे जो प्यार दिया, वह मैं हमेशा याद रखूंगा।
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जुनैद खान
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
आपकी बहन आयरा बहुत खुलकर बातें करती हैं और आप उतने ही संकोची लगते हैं, क्या बचपन में ‘बुली’ भी हुए घर पर आप?
नहीं, मैं कहूंगा कि हम लोग बिल्कुल एक दूसरे को बुली नहीं करते थे। हमारा आपसी रिश्ता काफी गर्मजोशी भरा रहा है। मेरा मानना है कि आयरा बहुत ही संवेदनशील है। बहुत ही मददगार इंसान है। हां, मेरी मम्मी आयरा की ज्यादा सुनती हैं, बस यही एक बात ठीक नहीं लगती मुझे।
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फिल्म 'लवयापा' में खुशी कपूर के साथ जुनैद खान
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
‘लवयापा’ के निर्देशक अद्वैत चंदन ने ही फिल्म ‘लाल सिंह चड्ढा’ के लिए आपका ऑडीशन शूट किया था, उनकी वह एक खूबी क्या है जो आप सबको बताना चाहेंगे?
अद्वैत को मैं अरसे से जानता रहा हूं और वह भी मुझे अच्छे से जानते हैं। हमारे बीच एक अनकहा रिश्ता समझ का तो है ही लेकिन बतौर निर्देशक अद्वैत कमाल के इंसान हैं। उन्हें अपने कलाकारों से उनका सर्वोत्तम निचोड़ना आता है। ‘महाराज’ का मेरा किरदार मेरी निजी शख्सियत के काफी करीब लगा था मुझे, उसके मुकाबले ‘लवयापा’ के किरदार को मैं चुनौतीपूर्ण मानता हूं, लेकिन अद्वैत ने हम सबसे कमाल का अभिनय कराया है और एक बहुत ही अच्छी फिल्म बनाई है।
आपकी तीसरी फिल्म जो साई पल्लवी के साथ बन रही है, उसकी तो शूटिंग पूरी हो चुकी है, लेकिन अगर आपको ये मौका मिले कि आप अपनी अगली फिल्म जिस भी निर्देशक के साथ शुरू करना चाहें, उसी के साथ शुरू होगी, तो वह निर्देशक कौन होंगे?
राज कपूर! लेकिन, काश कि ऐसा हो सकता। मुझे उनकी निर्देशित सारी फिल्में बहुत पसंद हैं और इनमें से अधिकतर मैंने देखी भी हैं। लेकिन, उनकी फिल्म ‘मेरा नाम जोकर’ मेरे दिल के बेहद करीब है। ये एक ऐसी फिल्म है जो अपने समय से काफी पहले आई। उस समय फिल्म भले न चली हो लेकिन आज भी हिंदी सिनेमा का जिक्र बिना इस फिल्म की चर्चा के अधूरा है।