jagjit singh
जगजीत सिंह की लाइव परफॉरमेंसेज में उनसे कैफ़ भोपाली की ग़ज़ल, ‘तेरा चेहरा कितना सुहाना लगता है’ की बहुत फरमाइशें होती थीं। इस गज़ल को वह सुनाते भी बड़े मजे लेकर थे। जैसे ही मिसरा आता था, आग का क्या है पल दो पल में लगती है। जगजीत सिंह साजिंदों को रफ्तार कम करने का इशारा करते और बोलते, ये इश्क़ की आग है। प्रेम की अग्नि। love at first sight, उसके बाद sight ढूंढते रहो। फिर अगली लाइन सुनाते, बुझते बुझते एक ज़माना लगता है। फिर रुकते और बोलते, सबसे पहले तो चश्मा लगता है, फिर दांत लगते हैं, फिर बाल भी लगते हैं, और कभी तो घुटने भी लगते हैं।