होली
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इन गीतों की जगह फूहड़ता ने ले ली है
आज के दौर में हम चाहे कितने भी आधुनिक हो जाएं लेकिन फगुआ के बिना होली का त्योहार अधूरा है। होली खेलैं रघुवीरा, नदिया सरजू के तीरा, आज बिरज में होली रे, केकय हाथै कनक पिचकारी केकैय हाथै अबीरा, बसवरिया से कागा उड़ भागा मोरा सइया अभागा न जागा, छलिया का वेश बनाया, श्याम होली खेलने आए... ये कुछ ऐसे फगुआ गीत हैं, जिनकी बोली धीरे-धीरे खामोश होती जा रही है। अब तो होली के पावन गीतों की जगह अश्लील और फूहड़ गीत सुनाई देने लगे हैं। अब तो गांव की होली भी पहले जैसी नहीं रही। समय के साथ होली की उमंग भी गायब होने लगी है।