अवध के इलाके में किस्सागोई घुट्टी में मिलती है। हर तीज त्यौहार की अपनी कहानियां हैं। बच्चों को सुनाने की कहानियां अलग हैं। कुछ असल और कुछ बस उसी वक़्त सोची हुई। बड़े होकर कहानियां सुनने का वक्त नहीं मिलता और जो बड़ों को बहला सके, ऐसी किस्सागोई आसान भी नहीं है। इस मामले में हिमांशु और प्रज्ञा दाद के हकदार हैं कि बीती शाम साहिर लुधियानवी की जो दास्तां उन्होंने यहां मुंबई के आराम नगर स्थित ‘स्लम्स ऑफ बॉलीवुड’ में सुनाई, उसने पूरी महफिल को पूरे एक घंटे तक अपने जादू से बांधे रखा। साहिर को लोग एक बेहतरीन शायर और गीतकार के रूप में जानते हैं। लेकिन, ये दास्तां बताती है कि बचपन से लेकर अपने आखिरी वक्त तक साहिर ने जिंदगी को एक आम इंसान जैसे ही जिया। कभी शोहरत का मुखौटा लगाकर तो कभी उस मुखौटे की तलाश में जो उन्हें फिर से अपनी अम्मी की गोद में खेला अब्दुल हई बना दे।