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Mukesh S Bhatt: अनुराग कश्यप ने दिया धोबी का पहला रोल, विशाल भारद्वाज ने इसलिए आज तक दोबारा काम नहीं दिया

Wed, 11 Oct 2023 09:38 AM IST
प्रियंका नेगी अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
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मुकेश एस भट्ट - फोटो : अमर उजाला
अभिनेता मुकेश एस भट्ट का नाम हिंदी सिनेमा के जाने माने निर्माता मुकेश भट्ट जैसा होने के चलते अक्सर लोग उन्होंने निर्माता मुकेश भट्ट समझकर ही फोन करते हैं। बिहार में मुजफ्फरपुर के रहने वाले अभिनेता मुकेश एस भट्ट अब तक 'कंपनी', 'एमएस धोनी- अनटोल्ड लव स्टोरी', 'भूतनाथ रिटर्न्स', 'दबंग 2', 'प्रेम रतन घन पायो', 'ब्लडी डैडी' जैसी कई फिल्मों में काम कर चुके हैं। हाल ही में अक्षय कुमार की फिल्म 'मिशन रानीगंज -द ग्रेट भारत रेस्क्यू' में भी उनका काम लोगों को पसंद आया है। ‘हाशिये के सुपरस्टार’ की इस कड़ी में आइए जानते हैं महेश एस भट्ट की कहानी, उन्ही की जुबानी…
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मुकेश एस भट्ट - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

नाटकों में लड़की बनकर हुई शुरुआत
बिहार के मुजफ्फरपुर और  सीतामढ़ी के बीच भरथुआ  एक गांव है, जहां का मैं रहने वाला हूं। मशहूर साहित्यकार रामवृक्ष बेनीपुरी का गांव और मेरा गांव बिलकुल अगल -बगल ही हैं। मुजफ्फरपुर के प्रभात तारा कॉन्वेंट स्कूल में पढ़ाई हुई। हमारे यहां छठ पर्व बहुत ही धूमधाम से मनाते हैं जिसमें लड़के लोग नाटक करते थे।  नाटक में जिस लड़के का काम अच्छा रहता था उसे प्राइज मिलता था। एक बार मैने भी गांव में एक नाटक किया। पहले तो डर के किया। फिर थोड़ी सी हिम्मत आई। गांव में सबको बड़ा अच्छा लगा और बुजुर्गों ने बड़ा सम्मान दिया। धीरे -धीरे नाटकों के प्रति मेरा आत्म विश्वास  बढ़ने लगा। मैं बचपन में दिखने में बहुत सुंदर था तो मुझे नाटकों में लड़की के ही किरदार निभाने के लिए मिलते थे। 

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मुकेश एस भट्ट - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

नुक्कड़ नाटक से दिखी दिल्ली की मंजिल 
मुजफ्फरपुर में ग्रेजुएशन की पढ़ाई पूरी कर रहा था। उसी दौरान नुक्कड़ नाटक वालों से मेरी मुलाकात हुई तो मेरे बचपन के दिन याद आ गए। उन दिनों प्रौढ़ शिक्षा अभियान चल रहा था। इस अभियान को लेकर हमने कई नुक्कड़ नाटक किए। दिल्ली से लोग पटना नाटक करने आते थे। हम लोग पटना नाटक देखने आते थे। हमने वहां एक नाटक 'कोर्ट मार्शल' देखा, उसमें पीयूष मिश्रा और मनोज बाजपेयी थे। जब वह नाटक देखा, तो मुझे लगा कि मुझे अब दिल्ली जाना चाहिए। पिता श्री शिव शंकर प्रसाद राय स्टेट बैंक आफ इंडिया में कैशियर थे। मां सुभद्रा देवी गृहणी थीं। तीन भाई हैं हम लोग। सबसे छोटा शैलेश दुबई में सॉफ्टवेयर इंजिनियर है और भाई मौलेश गांव में ही खेती बाड़ी संभालते हैं। 

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मुकेश एस भट्ट - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

नहीं हुआ एनएसडी में दाखिला 
मैं साल 1993 में दिल्ली आया तो राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय (एनएसडी) ज्वाइन करने का मन हुआ। उसी समय भारतेन्दु नाटक अकादमी, लखनऊ से नवाजुद्दीन सिद्दीकी भी आए हुए थे। सौरभ शुक्ला भी मिले, उन्होंने ही बताया कि एनएसडी करने के लिए ग्रेजुएशन करना पड़ेगा। वापस ग्रेजुएशन पूरा करके दिल्ली गया और एनएसडी का एग्जाम दिया लेकिन चयन नहीं हुआ। वहीं बगल में श्रीराम सेंटर है जहां से मनोज बाजपेयी, शेखर सुमन जैसे लोग निकले हैं। वहां मेरा चयन हो गया। एनएसडी के गोल्ड मेडलिस्ट आलोक चटर्जी के निर्देशन में एक नाटक 'होरी' किया और वह नाटक काफी चर्चित हुआ। मेरी भी पहचान बन गई। मुझे लगा कि अब तो एनएसडी में मेरा दाखिला हो जाएगा। मैंने एग्जाम दिया, फिर नहीं हुआ। तीसरी बार एनएसडी का एग्जाम दिया तो तीसरी बार भी नहीं हुआ।

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मुकेश एस भट्ट - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

वापस आ गया मुजफ्फरपुर 
जब तीसरी बार मेरा चयन एनएसडी में नहीं हुआ तो वापस मुजफ्फरपुर आ गया और वहां मैंने भारतेंदु हरिश्चंद्र का नाटक ‘अंधेर नगरी चौपट राजा’ किया। यह नाटक बहुत लोकप्रिय रहा। सबको लगने लगा कि मुकेश यहां आ गया अब एक्टिंग क्लास शुरू करेगा। श्रीराम सेंटर में एक्टिंग सीखने के बाद मुझे वैसी फीलिंग नहीं आई थी क्योंकि वहां सिर्फ एक साल का कोर्स था। वह भी शाम को चार घंटे की ही क्लास होती है। एनएसडी में एक्टिंग सीखने का एक पूरा प्रोसेस होता है। आप वहीं हॉस्टल में रहते हो, एक्टिंग स्कूल में जाते हो। वहां पूरा माहौल एक्टिंग का मिलता है।

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मुकेश एस भट्ट - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

मां ने बेटी की तरह विदा किया
इसी बीच, मुंबई से मेरे एक मित्र का फोन आया। उसको रूम शेयरिंग के लिए एक साथी की जरूरत थी। वह मीरा रोड में रहता था। मैंने  बाबू जी से बात की। वह नही चाहते थे कि मैं एक्टर बनूं। उस जमाने के लोग बड़े स्वाभिमानी होते थे। वह चाहते थे कि कोई सरकारी नौकरी कर लूं। खैर, पिताजी को लगा कि दिल्ली में नाटक किया है तो मानेगा नहीं। उन्होंने मुझे दस हजार रुपये दिए। मां ने गांव का सतुआ, चूरा, घी, अचार सब बांधकर दिया। जैसे बेटी को विदा कर रही हो। मैं अपने आप को बहुत भाग्यशाली मानता हूं कि मुझे ऐसे प्यारे मां बाप मिले। 

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मुकेश एस भट्ट - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

दस महीने लग मुंबई को समझने में 
मैं मुंबई साल 1998  में मुंबई आ गया। मुंबई आने के बाद भटकने लगा। समझ में नहीं आ रहा था कि किधर जाऊं। मुझे बाहर निकलने में डर लग रहा था जिसको देखो भाग ही रहा है। लोकल ट्रेन में चढ़ता था तो लोग दबा देते थे। मुझे हमेशा लगता था कि कोई न कोई मुझे देख रहा है। एक तो  मराठी भाषा, दूसरा कोई अपने जान पहचान का नहीं। श्रीराम सेंटर से कुछ सहपाठी जो पहले मुंबई आ गए थे वह भी ऐसे ही चलते फिरते चाय की दुकान पर मिलते थे। इस तरह से मुंबई को समझने में 10 महीने लग गये। फिर नवाजुद्दीन सिद्दीकी, राजपाल यादव से मिला। धीरे-धीरे एक माहौल में आने लगा। उसी दौरान पृथ्वी थियेटर जाना हुआ। थियेटर मुझे समझ में आता था बाकी कुछ समझ में नहीं आता था। वहां जाकर थोड़ा सुकून मिलता था। मकरंद देशपांडे का येटर ग्रुप ज्वाइन कर लिया। अनुराग कश्यप और इम्तियाज अली वहां नाटक देखने आते थे। धीरे-धीरे उनसे जान पहचान बन गई। 

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मुकेश एस भट्ट - फोटो : सोशल मीडिया
अनुराग कश्यप ने दिया पहला ब्रेक
उन दिनों अनुराग कश्यप एक फिल्म 'पांच' बना रहे थे। एक किरदार के लिए अनुराग ने किसी से बात की थी। वह किसी वजह से शूटिंग पर नहीं आ पाया। मैं पृथ्वी थियेटर पर बैठा हुआ था। अनुराग कश्यप आए और उन्होंने फिल्म में मुझे एक धोबी का किरदार निभाने का मौका दिया जो ड्रग्स सप्लाई करता है। इस किरदार में लोगों ने मुझे नोटिस किया। इस फिल्म को अनुराग कश्यप ने सबको दिखाया। राम गोपाल वर्मा ने भी फिल्म देखी। उन दिनों प्रवाल रमन कास्टिंग डायरेक्टर हुआ करते थे। उनका फोन आया कि रामू जी मिलना चाहते हैं। राम गोपाल वर्मा से पहली बार मिलकर अभिभूत हो गया। और, मुझे फिल्म 'कंपनी' फिल्म प्रोड्यूसर की भूमिका दी। इस फिल्म के बाद फिर कभी पलटकर नहीं देखा।

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मुकेश एस भट्ट - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

इस वजह से बंद हो गए विशाल के दरवाजे 
मैं अनुराग कश्यप की फिल्म 'गुलाल' कर रहा था जिसमें मेरा भंवर सिंह का रोल था। उसमे राजस्थानी लुक था जिसमे मेरी मूंछें बहुत बड़ी थी। उसी समय विशाल भारद्वाज 'मकड़ी' फिल्म बना रहे थे।  'मकड़ी' में दो हवलदारों की भूमिकाएं थी। विशाल भाई ने कहा कि एक हवलदार की भूमिका कर लो। मैंने वह काम करने से मना कर दिया क्योंकि मेरा पूरा फोकस भंवर सिंह पर था। उसके बाद से आज तक विशाल भाई ने कोई काम नहीं दिया। उनके प्रोडक्शन हाउस के दरवाजे मेरे लिए बंद हो गए।

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मुकेश एस भट्ट - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

मुकेश भट्ट नाम से सिर्फ नुकसान ही हुआ
मुकेश भट्ट के नाम का फायदा नहीं बल्कि नुकसान बहुत हुआ है। आज भी अगर सोशल मीडिया पर मुझे कोई सर्च करता है तो निर्माता मुकेश भट्ट का ही पूरा खानदान दिखता है। मैं तो कहीं नजर ही नहीं आता हूं। अक्सर लोग मुझे मुकेश भट्ट समझकर फोन करके रात के दो-दो बजे परेशान करते हैं। एक बार रात को दो बजे एक महिला का दुबई से फोन इमरान हाशमी का नंबर मांगने के लिए आया। मैंने उनको समझाया कि उस खानदान का मैं नहीं हूं। ऐसे बहुत सारे फोन आते हैं लेकिन मैंने कभी बुरा नहीं माना।

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टीकू वेड्स शेरू में मुकेश एस भट्ट - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

हिमाचल प्रदेश के रहने वाले ब्रह्मभट्ट हैं 
हम लोग हिमाचल प्रदेश के रहने वाले ब्रह्मभट्ट हैं और  ज्वाला देवी हमारी कुलदेवी हैं। वर्षों पहले हमारे पूर्वज बिहार आ गए और अपना सरनेम ब्रह्मभट्ट से रॉय कर लिया। जब मैं दिल्ली श्रीराम सेंटर में नाटक कर रहा था तभी मैंने मुकेश कुमार से अपना नाम मुकेश भट्ट रख लिया था। श्रीराम सेंटर में जब मेरा एडमिशन हो रहा था तब मेरे मन में ख्याल आया कि अपना नाम मुकेश भट्ट क्यों न रख लूं। ऐसा नहीं था कि मुंबई आकर पब्लिसिटी के लिए अपना नाम बदल लिया।

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प्रेम रतन घन पायो में मुकेश एस भट्ट - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
सलमान के साथ 10 दिन शूटिंग
मैंने अक्षय कुमार के साथ पांच-छह फिल्में की हैं। अभी उनके साथ 'मिशन रानीगंज- द ग्रेट भारत रेस्क्यू' रिलीज हुई है। वह जितने बड़े स्टार हैं उससे कहीं अच्छे इंसान हैं। सभी के साथ काम करना मेरे लिए बहुत ही सहज रहा है। चाहे रणबीर कपूर के साथ फिल्म 'रॉकेट सिंह' हो, सलमान खान के साथ 'दबंग 2'  और 'प्रेम रतन घन पायो' हो। 'प्रेम प्रेम रतन घन पायो' में सलमान को बग्घी से गिराने वाला मैं ही हूं। वह सीन छोटा है, लेकिन उस सीन की शूटिंग दस दिनों तक हुई। मुझे काम करके बहुत अच्छा लगा।

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मिशन रानीगंज- द ग्रेट भारत रेस्क्यू में मुकेश एस भट्ट - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

मनोज के साथ बार-बार काम करना चाहता हूं 
मनोज बाजपेयी के साथ मुझे काम करने का बहुत कम मौका मिला है, लेकिन मैं उनके साथ और काम करना चाहता हूं। उनके साथ हंसल मेहता की फिल्म 'दिल पे मत ले यार' की थी। मनोज बाजपेयी हमारी इंडस्ट्री के ऐसे एक्टर हैं, जिनका काम देखकर मुझे बहुत अच्छा लगता है। वह एक पेंटिंग की तरह हैं जिसमें  उनके अभिनय के कई रंग देखने को मिलते हैं। चाहे आप उनका एक किरदार 'गैंग्स ऑफ वासेपुर' का देख लीजिए और दूसरा किरदार 'सिर्फ एक बंदा काफी है' का। दोनों किरदार में उनके अभिनय के अलग अलग रंग हैं। फिल्म 'अक्स' में उनके अभिनय एक अलग ही लेवल का रहा है। मैं उनके साथ बहुत काम करना चाहूंगा क्योंकि काम के दौरान उनसे और भी कुछ सीखूंगा।

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मिशन रानीगंज- द ग्रेट भारत रेस्क्यू में मुकेश एस भट्ट - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

एकै साधे सब सधै, सब साधै सब जाय
मेरा मानना है कि एकै साधे सब सधै, सब साधै सब जाय। मुझे सिर्फ अभिनय ही करना है। मुझे लगता है कि अभी अभिनय में ही कुछ नहीं कर पाए हैं। अभी भी मेरे अंदर बहुत सारे किरदार सो रहे हैं जिनको अभी जगाना है। मुझे नहीं लगता कि अभिनय को पूरा करने में मुझे यह जन्म काफी होगा। मैं कविताएं, लधु कहानियां लिखता रहता हूं। वह सब खुद के लिए। मैने एक शॉर्ट फिल्म भी बनाई थी। प्रयोगात्मक तौर पर कुछ ना कुछ करता रहता हूं। मुझे पढ़ने का बहुत शौक है। विश्व सिनेमा और इतिहास के बारे में पढ़ता रहता हूं।

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