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पिता से बगावत कर संगीत सीखने वाले बांसुरी वादक हरिप्रसाद चौरसिया की ये हैं 10 अनसुनी कहानियां

Mon, 01 Jul 2019 07:08 AM IST
Mishra Mishra एंटरटेनमेंट डेस्क, अमर उजाला
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Hariprasad Chaurasia - फोटो : Social Media
हरिप्रसाद चौरसिया, नाम सुनते ही कानों में बांसुरी की मधुर ध्वनि गूंजने लगती है। बांस की बनी साधारण सी बांसुरी जब हरिप्रसाद के हाथो में होती है तो इस बांसुरी में मानव मन को मोह लेने वाली असाधारण शक्तियां आ जाती हैं। शास्त्रीय संगीत में महत्वपूर्ण योगदान देने के लिए हरिप्रसाद चौरसिया को पद्म भूषण, पद्म विभूषण, यश भारती और  संगीत नाटक अकादमी जैसे पुरस्कारों से सम्मानित किया जा चुका है। हिंदी सिनेमा में शास्त्रीय संगीत को पुनर्जीवित करने करने वाले महान कलाकार हरिप्रसाद चौरसिया के जन्मदिन पर आइए जानते हैं उनकी 10 अनसुनी कहानियां। 

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Hariprasad Chaurasia - फोटो : Social Media
बचपन में छूटा मां का साथ 
बांसुरी के जादूगर और शास्त्रीय संगीतकार हरिप्रसाद चौरसिया का जन्म 1 जुलाई 1938 को उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद (वर्तमान प्रयागराज) में हुआ। मात्र छह साल की उम्र में ही उनके सिर से मां का साया उठ गया और इनका बचपन पिता के साथ तनहाइयों में बीता। सौतेली मां हरिप्रसाद को सगी मां जैसा प्यार नहीं दे पाएगी यह सोचकर इनके पिता ने दूसरी शादी नहीं की और उन्होंने ही इन्हें पाल पोसकर बड़ा किया। 

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Hariprasad Chaurasia - फोटो : Social Media
पहलवान बनाना चाहते थे पिता
हरिप्रसाद चौरसिया के पिता अखाड़े में पहलवानी किया करते थे। वह चाहते थे हरिप्रसाद भी कुश्ती के दांवपेंच सीखकर बड़े पहलवान बनें। संगीत के प्रेमी हरिप्रसाद का मन अखाड़े में बिल्कुल नहीं लगता था पर पिताजी के डर से अखाड़े में जाया करते थे और कुश्ती का अभ्यास भी किया करते। संगीत की दुनिया में परचम लहराने के बाद हरिप्रसाद ने एक इंटरव्यू में कहा, "उन दिनों अखाड़े में की गई मेहनत से मुझे संगीत में भी काफी मदद मिली। बांसुरी बजाते समय लंबी सांसे बांधने में मैं अखाड़े में किए गए अभ्यास की बदौलत ही कामयाब हो पाया।" 

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Hariprasad Chaurasia - फोटो : Social Media
पिता से छुपकर सीखा संगीत
हरिप्रसाद के पिता उन्हें पहलवान बनाना चाहते थे। उनका मानना था कि संगीत या तो राजाओं के दरबार में होता है या भीख मांगने के लिए गाया-बजाया जाता है। हरिप्रसाद के पिता बहुत सख्त रवैये वाले इंसान थे। कई बार वह हरि प्रसाद की बुरी तरह पिटाई भी कर देते थे। संगीत को अपना दिल दे चुके हरिप्रसाद ने पिता से छुपकर अपने पड़ोसी पंडित राजाराम से गायन सीखना शुरू किया। तब वो सिर्फ नौ साल के थे। पंडित जी को पता था कि हरि प्रसाद के पिता को संगीत पसंद नहीं है इसलिए उन्होंने भी सब छुपा के रखा।

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Hariprasad Chaurasia - फोटो : Social Media
घरेलू काम के बदले सीखा बांसुरी बजाना
पंडित राजाराम से थोड़ा बहुत गायन सीखने के बाद हरिप्रसाद संगीत के पुजारी बन गए। 15 साल की उम्र में उन्होंने रेडियो पर पंडित भोलानाथ को बांसुरी बजाते सुना और उसी समय इनके मन मे बांसुरी सीखने की इच्छा हुई। हरिप्रसाद जी पंडित भोलानाथ के पास पंहुच गए। पंडित भोलानाथ की शादी नहीं हुई थी और वह अकेले रहते थे। हरिप्रसाद पंडित भोलानाथ के घर पर ही रुक गए और सब्जी काटना, मसाला पीसना जैसे घरेलू कामों में उनका हाथ बंटाने लगे। बदले में पंडित भोलानाथ ने उन्हें बांसुरी सिखाना शुरू कर दिया।

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Hariprasad Chaurasia - फोटो : Social Media
पिता से बगावत कर बने संगीतकार
गायन और बांसुरी वादन सीखते- सीखते काफी वक्त निकल गया। पारिवारिक जिम्मेदारियां बढ़ रही थीं। इसी बीच हरिप्रसाद को उत्तर प्रदेश में सरकारी क्लर्क की नौकरी मिल गई। इससे इनके पिता जी काफी खुश हुए पर हरिप्रसाद का मन इस नौकरी में नहीं लगा। इसी बीच इनको कटक रेडिया से स्टाफ आर्टिस्ट बनने का प्रस्ताव आया। इस प्रस्ताव के बाद इन्होंने क्लर्क की नौकरी छोड़ दी। इस बात का पता इनके पिता जी को चला तो उनको गहरा सदमा लगा। पहली बात ये कि उनका बेटा संगीत से कमाई करने जा रहा है और ऊपर से जिस बच्चे के पालन पोषण के लिए उन्होंने दूसरी शादी नहीं की, वह उन्हें छोड़कर दूसरे शहर जा रहा है। पिता के कई बार रोकने पर भी हरिप्रसाद नहीं माने और चल पड़े संगीत और बांसुरी को अपना हमसफर बनाने। 

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सिनेमा का रोचक सफर
हरिप्रसाद चौरसिया 1957 में आकाशवाणी से जुड़े और कटक चले गए। वहां लोगो को उनका काम पसंद आया और धीरे-धीरे उनकी लोकप्रियता बढ़ने लगी। फिर एक दिन हरि प्रसाद चौरसिया का ट्रांसफर मुंबई हो गया गया। 250 रुपये की तनख्वाह पर वह मुंबई तो आ गए लेकिन मुंबई उन्हें पसंद नहीं आया। रेडियो पर उनका बांसुरी वादन फिल्म संगीतकार मदन मोहन और रोशन ने सुना। इन दोनों से मुलाकात के बाद ही उन्हें फिल्मों में बांसुरी बजाने का का मौका मिलने लगा और उन्होंने फिर रेडियो छोड़ दिया। 

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यूं बनी शिव-हरि की जोड़ी 
हिंदी सिनेमा में संगीतकारों की बहुत जोड़ियां बनी लेकिन उन सबसे अलग है शिव-हरि की जोड़ी। संतूर वादक पंडित शिव कुमार शर्मा और हरिप्रसाद चौरसिया की जोड़ी हिंदी सिनेमा में मशहूर है। हरिप्रसाद चौरसिया ने जितनी भी फिल्मों में बतौर संगीतकार काम किया उन सब मे पंडित शिव कुमार उनके जोड़ीदार रहे। शिव-हरि की जोड़ी के बारे में हरिप्रसाद बताते हैं, "लंदन में एक रिकॉर्डिंग के दौरान एलबम के कवर पर हमारा नाम लिखा जाना था पर बड़ा नाम होने की वजह से पूरा नाम लिखना मुश्किल था। इस पर फैसला लिया गया कि शिव और हरि यानी दोनों के शुरूआती नाम लिखे जाएं। चूंकि उम्र में शिव कुमार बड़े थे इसलिए शिव का नाम पहले लिखा गया।" शिव-हरि की जोड़ी ने यश चोपड़ा सहित कई फिल्म निर्माताओं के साथ काम किया। चांदनी, लम्हे, सिलसिला, फासले, साहिबा और परंपरा जैसी कई फिल्मों में शिव-हरि की इस जोड़ी ने अपना जलवा दिखाया। 

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जब गुरु ने दी पुलिस बुलाने की धमकी 
हरिप्रसाद चौरसिया अन्नपूर्णा देवी के भी शागिर्द राह चुके हैं। अन्नपूर्णा देवी मशहूर सरोद वादक अलाउद्दीन खां की बेटी और पंडित रविशंकर  की पहली पत्नी थीं। एक बार हरिप्रसाद को अलाउद्दीन खां ने इलाहाबाद में बांसुरी बजाते सुना। उन्होंने हरिप्रसाद से कहा, "मैहर आ जाओ, मैं तुम्हें सिखाऊंगा।" तब हरि प्रसाद ने पिता के डर से मना कर दिया। अलाउद्दीन खां ने कहा कि घर छोड़कर आना चाहो, तो भी आ जाओ। अगर अभी नहीं आ सकते, बाद में आना चाहो, तो मेरे मरने के बाद मेरी बेटी से भी सीख सकते हो।” मुंबई आने के बाद यह बात हरिप्रसाद के दिमाग मे दौड़ती रही। हरि प्रसाद चौरसिया जब अन्नपूर्णा देवी से संगीत सीखने पहुंचे तो उन्होंने साफ मना कर दिया और उन्हें घर से निकाल दिया। उन दिनों फिल्मी संगीतकारों की अच्छी छवि नहीं थी। हरि प्रसाद दोबारा पहुंचे तो अन्नपूर्णा देवी ने पुलिस बुलाने की धमकी दी। तीन साल की कोशिश के बाद वह तैयार हुईं और उन्होंने हरि प्रसाद से कुछ बजाकर सुनाने को कहा।

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अब नहीं भाता फिल्मों के लिए संगीत बनाना
हरिप्रसाद चौरसिया को आधुनिक फिल्मों में काम करना पसंद नही है। उनका मानना है कि आधुनिक फिल्मों में शास्त्रीय संगीत को ज्यादा मान्यता नहीं दी जाती। हरिप्रसाद चौरसिया के लिए फिल्मों के लिए काम करना कभी प्राथमिकता था भी नहीं। एक इंटरव्यू में हरिप्रसाद चौरसिया कहते हैं, "अब उस तरह की फिल्में कहां बन रही हैं? अनारकली, मुगल-ए-आजम, बैजू बावरा अब कहां बनती हैं? हमारे लिए फिल्म संगीत कभी प्राथमिकता नहीं था। हमने फिल्मों का संगीत तभी किया जब शास्त्रीय कार्यक्रमों से समय मिलता था। दोनों के बीच हमेशा संतुलन बनाए रखा। आज जैसी फिल्मों में काम करके क्यों हम नाम खराब करें?” 

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जब बिस्मिल्लाह खां के साथ संगत से किया इंकार
न्यूयॉर्क के एक कार्यक्रम के दौरान हरिप्रसाद चौरसिया को उस्ताद बिस्मिल्लाह खां के साथ बांसुरी बजाने को कहा गया। उन्होंने पूरी विनम्रता से कहा, "मैं खां साहब के साथ नहीं बजा सकता हूं। उनको हम लोग बचपन से शहनाई बजाते देखते आए हैं। मैं उनके साथ स्टेज साझा करने की हिम्मत नहीं कर सकता। हां, उनके बजाने के बाद कुछ मिनट मैं भी जरूर बजाऊंगा।" बिस्मिल्लाह खां को याद करते हुए हरिप्रसाद चौरसिया कहते हैं, "बनारस में जब कभी मेरा कार्यक्रम होता था। वह आगे की लाइन में ही बैठे दिखते थे और हमेशा बहुत दाद देते थे। यूं समझिए कि खां साहब का आशीर्वाद मिल गया, तो फिर सभी का आशीर्वाद मिल गया।"

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