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Prasanth Varma Exclusive: सरस्वती शिशु मंदिर की पढ़ाई ने हमें सिखाया सदाचार, अब बारी इसे दुनिया तक पहुंचाने की

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प्रशांत वर्मा - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

वैसे तो इन दिनों हर तरफ फिल्म ‘आदिपुरुष’ का ही हल्ला है लेकिन दक्षिण में बन रही ‘हनुमान’ नामक कहानी का असर अभी से दुनिया के तमाम देशों में दिखने लगा है। फिल्म का टीजर यूट्यूब पर रिलीज होते ही वायरल हो गया था और देश भर के दर्शकों को पौराणिक कथाओं और आधुनिकता के संगम से बनी इस फिल्म का बेसब्री से इंतजार है। इसके निर्देशक प्रशांत वर्मा ने हाल ही में अपनी सिनेमाई दुनिया पर से भी पर्दा उठाया है।  पौराणिक कथाओं के किरदारों से आधुनिक युवा पीढ़ी के संगम के तौर पर बस रही सिनेमा की इस दुनिया के रचयिता प्रशांत वर्मा से ‘अमर उजाला’ के सलाहकार संपादक पंकज शुक्ल की एक्सक्लूसिव बातचीत।

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हनुमान - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

आपकी नई फिल्म क्या है, हनुमान या हनु मैन’? नाम और टीजर से तो यही प्रतीत होता है कि ये किसी सुपरहीरो की कहानी है?
टीजर में इसका नाम हमने ‘हनुमान’ ही रखा है लेकिन कुछ लोगों ने इसे ‘हनु-मैन’ कहकर भी बुलाना शुरू कर दिया। मुझे दोनों नाम स्वीकार्य हैं क्योंकि फिल्म में हनुमान भी हैं और हनु-मैन भी। मैंने ये दर्शकों पर छोड़ दिया कि वे इसे किस नाम से पुकारते हैं। फिल्म की शूटिंग पूरी हो चुकी है और हैदराबाद के कई प्रतिभाशाली युवा इसके स्पेशल इफेक्ट्स पर काम कर रहे हैं। इन युवाओं ने स्टार्टअप के रूप में अपने स्पेशल इफेक्ट्स स्टूडियो खोले हैं और हॉलीवुड या मुंबई के स्टूडियो से कहीं कम बजट में हम ये काम पूरा करने की कोशिश कर रहे हैं।

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प्रशांत वर्मा - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

और, फिल्म के टीजर को जैसी प्रतिक्रिया सोशल मीडिया पर मिली, उसके लिए आप कितना तैयार थे?
सच बताऊं तो ये एक कल्पनातीत अनुभव रहा। इसे रिलीज करने से पहले हमने इसे दर्शकों के अलग अलग कई वर्गों को दिखाया था और सबकी प्रतिक्रिया बहुत अच्छी थी। मुझे यही था कि हम सौ में से 75 या 80 नंबर हासिल कर ही लेंगे लेकिन जो प्रतिक्रिया आई, वह सौ में से हजार नंबर लाने जैसी थी। टीजर जैसे ही वायरल हुआ, मेरे मोबाइल पर संदेशों की बाढ़ सी आ गई। मुझे कुछ समझ नहीं आया तो मैं मोबाइल बंद करके क्रिकेट खेलने चला गया।

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हनुमान - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

और, ये प्रशांत वर्मा सिनेमैटिक यूनिवर्स क्या है?
ये पौराणिक और लोककथाओं का आधुनिकता से संगम है। हम किरदारों की एक ऐसी दुनिया बनाने जा रहे हैं जिनकी जड़ें भारतीय संस्कृति में होंगी लेकिन जिनका संबंध आज के युवाओं से होगा। मैंने अपने जन्मदिन पर इस तरह के कुल आठ किरदार सोचे थे और इनका एक वीडियो बना दिया था। आलसी हूं थोड़ा, तो कोई नाम सोचने की मेहनत नहीं कर पाया और इन फिल्मों का नाम प्रशांत वर्मा सिनेमैटिक यूनिवर्स रख दिया।

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प्रशांत वर्मा - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

मतलब कुछ कुछ एवेंजर्स सीरीज जैसा..
हां, कह सकते हैं कि प्रेरणा वही है। ये आठ किरदार ऐसे हैं जिन पर अलग अलग फिल्में भी बनेंगी और ये एक दूसरे किरदारों की फिल्मों में भी नजर आएंगे। इस कड़ी की पहली फिल्म ‘हनुमान’ है जिसे इसी साल रिलीज करने की तैयारियां चल रही हैं। दूसरी फिल्म ‘अधीरा’ होगी। मैंने अपनी पहली फिल्म बनाने से पहले 34 पटकथाएं लिख ली थीं। फिर हमने कुछ अरसा पहले सिर्फ कहानियां बुनने की कंपनी स्क्रिप्टविल खोली जिसे मेरी बहन स्नेहा देखती हैं। इस कंपनी में हमने तमाम लेखकों को अपने साथ लिया है और हम सब मिलकर सिनेमा के लिए लीक से इतर कहानियां तैयार कर रहे हैं। हमारी एक कहानी पर बनी फिल्म रिलीज हो चुकी है। दूसरी कहानी पर बन रही फिल्म में महेश बाबू काम कर रहे हैं।

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प्रशांत वर्मा - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

और, इन कहानियों की तलाश में आपकी अपनी परवरिश कितना काम आती है?
मैंने और मेरी बहन ने सरस्वती शिशु मंदिर में पढ़ाई की है। तमाम विषयों के अलावा हमारा एक विषय सदाचार भी होता था और इस विषय की कक्षाओं में ही हमने अपनी गौरवशाली संस्कृति और उससे जुड़े चरित्रों के बारे में जाना। तीन फिल्में बनाने के बाद हमने ये जाना कि भारतीय सिनेमा को विश्व पटल पर ले जाने के लिए हमारी ये कहानियां सबसे बड़ी मददगार हो सकती हैं।

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हनुमान - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

मतलब हनुमान की रिलीज भी अपने आप में एक स्टेटमेंट होगी?
हम सब मिलकर इसे पूरी दुनिया में पहुंचाने की कोशिश कर रहे हैं। भारतीय भाषाओं में इसे हिंदी, तमिल, कन्नड़ और मराठी में डब किया जाना है और इसके लिए हम बेहतरीन आवाज वाले कलाकारों की तलाश कर रहे हैं। सुनिधि चौहान हमारे साथ हैं। विदेश से भी हमें कुछ लोगों ने संपर्क किया है और इसे उनकी स्थानीय भाषा में डब करने को कहा है। कुछ सिर्फ उनकी भाषा के सबटाइटल्स से ही खुश हैं। निर्देशक एस एस राजामौली इस पूरी यात्रा में हमारे मार्गदर्शक रहे हैं और उनसे मैंने बहुत कुछ सीखा है। मेरा अगला सपना यही है कि स्पाइडर मैन जैसी फिल्में जब रिलीज होती है तो पूरी दुनिया उसका इंतजार करती है और कोई दूसरी बड़ी फिल्म उसके सामने रिलीज नहीं होती। वैसे ही एक दिन ऐसा भी आ सकता है जब हमारी बनाई सिनेमाई दुनिया की फिल्म रिलीज हो और हॉलीवुड वाले उस दिन अपनी फिल्म रिलीज करने से पहले सौ बार सोचें। राजामौली ये काम देश में कर चुके हैं, अब इसे आगे ले जाने का वक्त आ गया है।

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जॉम्बी रेड्डी - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

अच्छा थोड़ा पीछे जाकर आपकी फिल्म ‘जॉम्बी रेड्डी की बात करते हैं जिसे तेलुगु सिनेमा की पहली जॉम्बी मूवी माना जाता है। ये फिल्म बनाने से पहले आपने हिंदी फिल्म गो गोवा गॉन देखी थी क्या?
हां, बिल्कुल मैंने देखी थी। और, मैंने अपनी फिल्म बनाने से पहले इस फिल्म के निर्देशकों राज और डीके तक पहुंचने की कोशिश भी की। मैं जानना चाहता था कि उन्होंने किरदारों के चेहरे मोहरे कहानी के मुताबिक दिखाने के लिए कैसे काम किया और जॉम्बी बने लोगों के मेकअप के लिए पर किस तरह आगे बढ़े। लेकिन, मुझे उनसे कोई प्रतिक्रिया ही नहीं मिली। फिर मैंने खुद से इस पर काम शुरू किया। ये बहुत मुश्किल काम था। हमने करीब एक दर्जन अलग अलग प्रयोग किए। बजट हमारे पास था नहीं तो हम बाहर से किसी विशेषज्ञ को भी नहीं बुला सकते थे। हमने यूट्यूब पर तलाश की। बहुत सारे वीडियोज देखे और जो कुछ सीखा, खुद करके सीखा। अगर आप ये फिल्म देखेंगे तो आप पाएंगे कि पहले शेड्यूल में हमारी शूटिंग से लेकर फिल्म पूरी होने तक इन सारी चीजों में उत्तरोत्तर सुधार आता गया है।

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