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एक खत ने बदल दी थी गिरीश कर्नाड की जिंदगी, ऐसे शुरू हुआ था फिल्मों का सफर

Mon, 10 Jun 2019 11:17 AM IST
भावना शर्मा एंटरटेनमेंट डेस्क, अमर उजाला
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girish karnad - फोटो : social media
एक्टर, डायरेक्टर और राइटर गिरीश रघुनाथ कर्नाड का 81 की उम्र में निधन हो गया। गिरीश लंबे समय से बीमार चल रहे थे। उनके शरीर के कई अंगों ने काम करना बंद कर दिया था और उन्हें सांस लेने में तकलीफ हो रही थी, जिसके चलते उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया था। गिरीश के निधन की खबर से फैंस सदमे में हैं। सभी सोशल मीडिया पर उन्हें श्रद्धांजलि दे रहे हैं । गिरीश ने बॉलीवुड के अलावा साउथ की भी कई फिल्मों में काम किया। गिरीश की आखिरी फिल्म की बात करें तो उन्होंने सलमान खान के साथ 'टाइगर जिंदा है' की थी । 

Girish Karnad, veteran actor and playwright, and Jnanpith awardee, passed away this morning. More details awaited pic.twitter.com/YiQT8kCEqD

— ANI (@ANI) June 10, 2019
 
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girish karnad - फोटो : social media
गिरीश शुरुआत से ही थिएटर में काम करते थे । गिरीश कर्नाड को 1978 में रिलीज हुई फिल्म 'भूमिका' के लिए नेशनल अवॉर्ड मिला था। उन्हें 1998 में साहित्य के प्रतिष्ठित ज्ञानपीठ अवॉर्ड से नवाजा गया था। गिरीश कर्नाड को कर्मशिल सिनेमा में काम करने के लिए भी जाना जाता है। गिरीश ने 1970 में कन्नड़ फिल्म 'संस्कार' से अपना एक्टिंग और स्क्रीन राइटिंग डेब्यू किया था। इस फिल्म ने कन्नड़ सिनेमा का पहला प्रेजिडेंट गोल्डन लोटस अवार्ड जीता था।

 
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girish karnad - फोटो : social media
बॉलीवुड में उनकी पहली फिल्म 1974 में आई 'जादू का शंख' थी। गिरीश ने बॉलीवुड फिल्म निशांत (1975), शिवाय और चॉक एन डस्टर में भी काम किया था। गिरीश का जन्म एक कोंकणी परिवार में हुआ था । कर्नाड ने 1958 में धारवाड़ स्थित कर्नाटक विश्वविद्यालय से ग्रेजुएशन किया । इसके बाद वे एक रोड्स स्कॉलर के रूप में इंग्लैंड चले गए । वे शिकागो विश्वविद्यालय के फुलब्राइट महाविद्यालय में विज़िटिंग प्रोफेसर भी रह चुके हैं ।

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girish karnad - फोटो : social media
कर्नाड ने एक बार अपने बारे में बताया था, ''जब मैं 17 साल का था, तब मैंने आइरिस लेखक 'सीन ओ कैसी' की स्केच बनाकर उन्हें भेजा, तो उसके बदले उन्होंने मुझे एक पत्र भेजा । पत्र में उन्होंने लिखा था कि मैं यह सब करके अपना वक्त जाया न करूं, बल्कि कुछ ऐसा करूं, जिससे एक दिन लोग मेरा ऑटोग्राफ मांगे ।
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girish karnad - फोटो : social media
गिरीश ने बताया था, ''मैंने पत्र पढ़कर ऐसा करना बंद कर दिया । मेरे माता-पिता दोनों की ही थियेटर में दिलचस्पी थी । मेरे पिता उस समय काम के सिलसिले में घूमते रहते थे । बाल गंधर्व के नाटक हों या मराठी थियेटर, उन दोनों की दिलचस्पी पूरी रहती थी । वे अक्सर थियेटर की बातें घर में किया करते थे । थियेटर कितना शानदार होता था, यह मैंने उन्हीं से सुना । इसके बाद मेरी इसमें रुचि बढ़ती गई ।'
पहले कवि बनने का इरादा था 
गिरीश ने बताया था कि जब मैं बड़ा हो रहा था, तब मेरे परिवेश में नाटक मंडलों या नाटक कंपनियों का बोलबाला था । मेरे माता-पिता को नाटकों का शौक था । उनके साथ मैं भी नाटक देखने जाता था। यहीं से नाटकों ने मेरे मन में जगह बना ली थी।  मैं बचपन से ही ‘यक्षगान’ का उत्साही प्रशंसक रहा हूं। पर बाईस की उम्र होने तक मेरी जिंदगी की सबसे बड़ी महत्वाकांक्षा कवि बनने की थी। यहां तक कि जब मैं अपना पहला और सबसे प्रिय नाटक 'ययाति' लिख रहा था, तब नाटकों में रुचि होने के बावजूद मैंने नाटककार बनने का नहीं सोचा था। 
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girish karnad - फोटो : social media
महिलाओं को बारीकी से समझता हूं 
बकौल, गिरीश, मेरी परवरिश दो बहनों, एक भांजी और घर के सामने रहने वाले अंकल की चार बेटियों के साथ हुई है। सात लड़कियों के साथ रहने के कारण मैं महिलाओं की सोच को बेहद बारीकी से समझता हूं। यही वजह है कि मेरे नाटकों में महिला चरित्र बिल्कुल नैसर्गिक प्रतीत होता है। मुझे भारत से इंग्लैंड पहुंचने में तीन हफ्ते लग गए थे और मैं चाहकर भी निर्धारित तीन वर्षों से पहले अपने मुल्क वापस नहीं लौट सकता था। 1963 में इंग्लैंड से वापस लौटने के बाद मैं मद्रास (चेन्नई) की ऑक्सफोर्ड प्रेस में विभिन्न प्रकार के भारतीय लेखन को सामने लाने के काम से जुड़ गया। इससे रचनात्मक कौशल को संवारने में मदद मिली। 
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फिल्मों से ज्यादा नाटक पसंद है 
गिरीश आगे कहते हैं कि मैंने नाटक लिखना शुरू किया था, तब कन्नड़ साहित्य पर पश्चिम का गहरा प्रभाव था। 1970 में मैंने अनंतमूर्ति के उपन्यास पर आधारित 'संस्कार' से बतौर फिल्म स्क्रीनराइटर और अभिनेता शुरुआत की थी। उसके बाद मैंने कई फिल्मों के लिए काम किया, पर हमेशा से ही पसंदीदा क्षेत्र नाटक ही रहा। नाटक लिखने के दौरान इसकी शैलियों पर प्रयोग करना मेरे लिए फिल्म निर्देशन की तुलना में ज्यादा आजाद अनुभव है। 

हर नाटक पर की खूब मेहनत 
गिरीश कर्नाड कहते हैं मैं किसी भी ऐतिहासिक कहानी पर नाटक लिखने से पहले उस विषय के विद्वानों से मिलकर नोट्स तैयार करता हूं। मुझे उन कवियों और लेखकों से नफरत है, जो एक ही जगह बैठकर अपना काम पूरा कर लेते हैं। मैंने हमेशा अपने नाटकों पर मेहनत की है। जब मैंने तुगलक लिखा, तो सोचा था कि कोई इसमें दिलचस्पी नहीं लेगा, लेकिन ऐसा हुआ नहीं। मुझे समझ में आ गया कि नाटक बच्चों की तरह होते हैं, जो अपनी योग्यता के आधार पर आगे बढ़ते हैं। 

(एक इंटरव्यू के कुछ अंश)
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