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Abhishek Bachchan: मुझे याद नहीं कि पापा की पहली फिल्म कौन सी देखी, घर पर वह कभी सुपरस्टार की तरह नहीं आए

Wed, 09 Aug 2023 09:56 AM IST
प्रियंका नेगी अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
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अभिषेक बच्चन - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
हिंदी सिनेमा के महानायक अमिताभ बच्चन के बेटे अभिषेक बच्चन ने जब फिल्मों में काम करने का फैसला किया तो सच यही है कि दो साल तक उन्हें मनमुताबिक काम नहीं मिला। कहते तो ये भी हैं कि पहली बार फिल्मफेयर अवॉर्ड में जाने का मौका आया तो वह अपने पैसे से नया सूट खरीदने लायक हालत में नहीं थे। बहरहाल, अभिषेक बच्चन को अपनी बढ़ती उम्र का अंदाजा है और इसीलिए इन दिनों वह ऐसे किरदार कर रहे हैं जिनमें उन्हें स्टारडम की बजाय अभिनय दिखाने का मौका मिले। ऐसी ही उनकी एक फिल्म 'घूमर' 18 अगस्त को रिलीज होने जा रही है। इसी सिलसिले में अभिषेक बच्चन ने ‘अमर उजाला’ से बात की।
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'घूमर' में अभिषेक बच्चन - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

'घूमर' तो राजस्थानी नृत्य होता है, और आपकी फिल्म क्रिकेट और कोच की कहानी पर आधारित है, ऐसे में फिल्म का शीर्षक का घूमर क्यों?  
यह बात आपको अभी नहीं बताऊंगा, यह आप फिल्म देखकर समझ जाएंगे। इस शीर्षक का घूमर से ताल्लुक तो जरूर है लेकिन जब आप फिल्म देखेंगे तो समझ आएगा कि फिल्म का शीर्षक 'घूमर' क्यों रखा गया है?  जब फिल्म के निर्देशक आर बाल्की पहली बार इस फिल्म का ऑफर लेकर आए थे तो उन्होंने बस कहानी एक एक ढांचा सुनाया था। उनके मन में यह था कि इस पर एक प्रेरणादायक फिल्म बनाएं। कहानी काफी हटकर है, इसके साथ- साथ बहुत ही प्रेरणादायक भी है।

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अभिषेक बच्चन - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

फिल्म में आप कठोर किस्म के कोच बने हैं, आपके जीवन में कभी इस तरह के कोच से सामना हुआ है? 
जब आर बाल्की के साथ मैं इस किरदार पर चर्चा कर रहा था तो यही तय हुआ कि एक आम कोच के जो  गुण होने चाहिए, वे इस किरदार में बिल्कुल नहीं हैं। यह किरदार उसके बिल्कुल विपरीत है। मुझे यह एक एक्टर के तौर पर बहुत अच्छा और दिलचस्प लगा। यह कोच जरूर है लेकिन कोच जैसा इसका स्वभाव बिलकुल नहीं है। इसमें ऐसी कोई विशेषता नहीं है, जो एक कोच में होनी चाहिए। बाल्की हमेशा अपनी फिल्मों में एक दिलचस्प किरदार लेकर आते हैं।

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'सरकार' में अमिताभ बच्चन - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
अपने करियर में सबसे पहले आप जब अमिताभ बच्चन के साथ कैमरे आए तो उस दिन का अनुभव साझा करना चाहेंगे?
सबसे पहले हम लोगों ने कैमरे के सामने बाल्की की ही एक विज्ञापन फिल्म की थी। यह 2001 की बात है। फिल्म की बात करें तो पहली बार 'सरकार' में हमने साथ काम किया हालांकि रिलीज पहले 'बंटी और बबली' रिलीज हुई। 'सरकार' का एक छोटा सा सीन था। संवाद उसमें थे नहीं। फिल्म के निर्देशक राम गोपाल वर्मा समझ रहे थे कि मैं बहुत नर्वस हूं। उन्होंने कहा भी कि घबराओ मत। एक हल्का फुल्का सीन करेंगे। लेकिन मेरी हालत बहुत ही खराब थी। इसलिए नहीं कि वह मेरे पिता जी हैं। मेरे पिता के साथ- साथ वह अमिताभ बच्चन भी हैं। मेरा मानना है कि विश्व भर में उनसे बेहतर एक्टर कोई है ही नहीं। तो, हालत खराब थी। पसीना भी आ रहा था, मैं बहुत ही बुरी स्थिति में था। शायद डैड ने यह देखा और समझ गए कि बच्चा थोड़ा घबड़ाया हुआ है। उन्होंने माहौल को बहुत ही सहजता में बदल दिया। जैसा आम तौर पर बाकी ऐक्टर के साथ भी वह यही करते हैं। लेकिन शूटिंग के बाद जब हम एक साथ घर गए तो उन्होंने गाड़ी में समझाया कि कैसे करना चाहिए था। थोड़ा सुधार करो। मेरा काम देखकर वह ईमानदारी से बताते हैं कि उन्हें क्या लगा? उनको क्या पसंद आया और क्या पसंद नहीं आया?
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अभिषेक बच्चन - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
और, मां (जया बच्चन) के साथ पहली बार कब काम किया?
मां के साथ सबसे पहले मैंने एक बांग्ला फिल्म 'देश' में काम किया था। यह 2001-2002 की बात है। मैं कोलकाता में किसी काम से गया था और मां सिलीगुड़ी में शूटिंग कर रही थी। उन्होंने कहा कि फिल्म में मेरे किरदार के बेटे का एक छोटा सा रोल है, क्या तुम करोगे? मैने कहा कि जरूर करूंगा, मै आ जाता हूं। उसके बाद मां के साथ 'द्रोण' और 'लागा चुनरी में दाग' में काम किया। मां के साथ काम करके एक अलग अनुभव होता है। वह मेरी मां हैं, वह शब्द ही मेरे लिए बहुत मजबूत है।
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अभिषेक बच्चन - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

आपको बचपन में कब लगा कि आपके डैड इंडस्ट्री की बहुत बड़ी हस्ती हैं
मुझे ऐसा कोई क्षण याद नहीं है। लेकिन एक अहसास तो था कि ये जो आदमी हैं स्पेशल हैं। लेकिन घर पर वह हमारे पिता हैं। मां ने घर का माहौल शुरू से मध्यमवर्गीय परिवार जैसा ही रखा। डैडी भी कभी मेकअप लगाकर या अपने कॉस्ट्यूम में घर नहीं आए। वह अपना काम सेट पर छोड़कर आते थे। कभी सुपरस्टार की तरह घर नहीं आए। जब उनके साथ कहीं बाहर जाएं तो जो प्रतिक्रियाएं देखते थे तो कहीं न कहीं यह अहसास जरूर था कि जरूर यह कुछ स्पेशल हैं। लेकिन, कभी एक पल के लिए भी ऐसा नहीं लगा कि मेरे डैडी बहुत बड़े सुपरस्टार हैं।

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अभिषेक बच्चन - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

पापा की पहली कौन सी फिल्म आप थियेटर में देखने गए?
वह मुझे याद नहीं क्योंकि उनकी हर फिल्म देखते थे। किसी प्रिव्यू थियेटर में देखते थे या फिर नॉर्मल थियेटर में देखते थे। इसलिए याद नहीं कि उनकी पहली फिल्म कौन सी देखी थी।

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'बंटी और बबली' फिल्म में अभिषेक बच्चन - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

आर बाल्की के साथ आप का मैजिक हमेशा फिट बैठ जाता है, उनके साथ अब तक की कैसी बॉन्डिंग रही है?
आर बाल्की के साथ तो मैं करीब 20 साल से काम कर रहा हूं। हमारे बीच ऐसी केमेस्ट्री बन गई है कि हम समझ जाते हैं कि एक दूसरे को क्या चाहिए? वह कुछ समझाने आते हैं तो मैं उनके पूरा समझाने से पहले ही समझ जाता हूं कि वह क्या समझाना चाहते हैं, उनको पूरा समझाने की जरूरत नहीं पड़ती है। इससे पहले हमने 'पा' में साथ काम किया था। 12-13 साल के बाद फिर साथ काम कर रहे हैं, लेकिन एक दूसरे से संपर्क में तो रहे ही हैं। हमारा काम का संबंध बहुत ही मजबूत है।

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'पा' फिल्म में अभिषेक बच्चन - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

तो, 'पा' में पिता जी का पिता बनने का कैसा अनुभव रहा है?
बाल्की यहीं हमारे ऑफिस (जलसा के ठीक पीछे बच्चन परिवार का दफ्तर है, जनक) में आए थे। उन्होंने कहा कि मैं कुछ सोच रहा हूं क्या तुम करोगे? उन्होंने कहा कि मैं चाहता हूं कि तुम अपने पिता का रोल निभाओ। मैंने कहा कि यह कैसे होगा, वह मेरे पिता हैं और उम्र में मुझसे बड़े हैं। यह मैं कैसे कर पाऊंगा? बाल्की ने कहा कि मेरे पास एक आइडिया है, लिखने दो फिर आता हूं। बाल्की के सोचने का नजरिया बहुत अलग होता है। वह काफी यूनीक कॉन्सेप्ट लेकर आते हैं। मेरा और ओरो का किरदार बहुत दिलचस्प था। बाल्की और डैडी ने उस लुक पर बहुत मेहनत की थी। मेकअप आर्टिस्ट जिन्हें हम विदेश से लाए थे उनका काम बहुत अच्छा था। उन्हें लग रहा था कि जैसे डैडी 10 -11 साल के कोई बच्चे हो।

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'दिल्ली 6' में अभिषेक बच्चन - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

एक और फिल्म राकेश ओमप्रकाश मेहरा की 'दिल्ली 6' का जिक्र करना चाहूंगा। वहीदा रहमान जी के साथ कैसे अनुभव रहे?
मैं वहीदा आंटी को बचपन से जानता हूं। जब डैड बेंगलुरु में ‘कुली’ की शूटिंग कर रहे थे, तो प्रतिदिन हम लोग उनके साथ समय बिताते थे। बेंगलुरु में उनका फार्म हाउस था। जिस दिन वहीदा आंटी की शूटिंग नहीं होती थी, तो उनके घर चले जाते थे। पहली बार उनके साथ फिल्म  'ओम जय जगदीश' में काम किया था और उसके बाद 'दिल्ली 6' में काम किया । उनके साथ काम करके ऐसे ही लगता था कि दादी जैसी कोई है और उनके साथ काम कर रहे हैं। वह बहुत ही प्यारी हैं, देखभाल बहुत करती हैं। वह बहुत ही विनम्र और अच्छे स्वभाव की हैं।

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'रिफ्यूजी' फिल्म में अभिषेक बच्चन - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
राकेश मेहरा से भी आपका रिश्ता काफी पुराना है..
राकेश ने डैड के साथ एक बीपीएल का विज्ञापन बनाया था। उसी दौरान हमारी दोस्ती हो गई। एक बार एक शाम को हम दोनों बैठे हुए थे, मैंने कहा कि करीब दो साल हो गए हैं, और कोई काम ही नहीं दे रहा था। मुझे तो ऐसा लग रहा था जिस दिन एक्टिंग के बारे में सोचूंगा सब काम देने के लिए तैयार हो जाएंगे। राकेश ओमप्रकाश मेहरा ने कहा कि मुझे भी फिल्म डायरेक्ट करनी है लेकिन मैं एड फिल्म में फंस गया हूं। फिर हमने तय किया कि क्यों न हम दोनों मिलकर एक कहानी लिखे। मैंने कहा कि तुम डायरेक्शन करना और में उसमे एक्टिंग करूंगा। 6-7 महीने में हमने मिलकर कहानी लिखी 'समझौता एक्सप्रेस'। हालांकि वह फिल्म कभी बन नहीं पाई।
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'रिफ्यूजी' फिल्म में अभिषेक बच्चन - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

और फिर आपको मिली थी जे पी दत्ता की फिल्म रिफ्यूजी’?
उन दिनों डैड बहुत मुश्किल दौर से गुजर रहे थे। मेरे पास भी उस समय पैसे नहीं थे कि अवार्ड में जाने के लिए नया सूट सिला सकूं। अपनी बहन की शादी में मैंने शेरवानी खरीदी थी तो उसे ही पहनकर चला गया। उस समय मेरे बाल लम्बे थे क्योंकि ‘समझौता एक्सप्रेस’ के लिए मैने बाल लंबे किए थे और दाढ़ी बढ़ा रखी थी। उस वक्त जेपी साहब को फिल्म 'बॉर्डर' के लिए फिल्मफेयर अवार्ड मिल रहा था। वहां उन्होंने मुझे देखा। उस समय वह 'आखिरी मुगल' बनाने की सोच रहे थे। उन्होंने मुझे देखा। उन्हें लगा कि ये मेरे किरदार में फिट बैठ रहा है। उनके दो -तीन के बाद घर आकर डैड से मिले और बोले कि एक फिल्म बना रहा हूं, चाहता हूं कि अभिषेक उसमें काम करें लेकिन वह फिल्म भी नहीं बनी। उसके बदले उन्होंने 'रिफ्यूजी' बनाई। और, बस इस तरह से सिलसिला शुरू हुआ और आज हम ‘घूमर’ पर बात कर रहे हैं।

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