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दीपिका के जेएनयू जाने पर आया भारतीय रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर का बयान, कही ये बात

Sat, 11 Jan 2020 04:20 AM IST
Mishra Mishra एंटरटेनमेंट डेस्क, अमर उजाला
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Raghuram Rajan and Deepika Padukone - फोटो : Social Media
भारतीय रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन ने जेएनयू जाने के लिए बॉलीवुड अभिनेत्री दीपिका पादुकोण का समर्थन किया है। उन्होंने सोशल नेटवर्किंग साइट 'लिंक्डइन' पर करीब 650 शब्दों के अपने ब्लॉग में जेएनयू, लोकतंत्र और भारत के मौजूदा हालात पर कई बातें लिखी हैं। राजन ने दीपिका के अलावा अपने ब्लॉग में चुनाव आयुक्त अशोक लवासा की भी इशारों ही इशारों में तारीफ की है। उन्होंने लिखा है कि जिस तरह लवासा ने अपने और अपने परिवार के उत्पीड़न के बावजूद काम करना जारी रखा, उससे पता चलता है कि आज भी कुछ लोग सच्चाई, स्वतंत्रता और इंसाफ के लिए न सिर्फ बड़ी-बड़ी बातें करते हैं बल्कि आदर्शों के लिए त्याग भी करते हैं।
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जेएनयू में प्रदर्शन करते छात्रक्ष - फोटो : PTI
रघुराम राजन ने अपने ब्लॉग में जो लिखा है, उसका सार कुछ इस तरह है:-
हाल के दिनों में भारत से आने वाली ख़बरें चिंताजनक रही हैं। नकाबपोश हमलावरों का एक समूह भारत की सबसे प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों में से एक, जवाहर लाल नेहरू यूनिवर्सिटी में घुस गया। हमलावर कैंपस में घंटों तक उत्पात मचाते रहे, छात्रों और फैकल्टी सदस्यों पर हमले करते रहे लेकिन पुलिस को इसकी जरा भी भनक भी नहीं लगी। अब तक ये साफ नहीं है कि हमलावर कौन थे लेकिन ये जरूर साफ़ है कि जिन पर हमला हुआ वो एक्टिविस्ट थे। ये भी साफ है कि इसमें न तो सरकार द्वारा नियुक्त प्रशासन और न ही पुलिस ने कोई दखल दिया।
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रघुराम राजन - फोटो : Getty Images - file
ये सब देश की राजधानी दिल्ली शहर में हुआ, जो अक्सर हाई अलर्ट पर रहती है। जब मशहूर विश्वविद्यालय भी युद्धक्षेत्र बन जाएं तब ऐसे आरोप विश्वसनीय लगने लगते हैं कि सरकार विरोधी आवाजों को दबाने की कोशिश कर रही है। अपने नेतृत्व को दोषी ठहराना आसान होता है लेकिन हम जैसे गौरवशाली लोकतंत्र में जनता के तौर हमारी भी कुछ जिम्मेदारी है क्योंकि हम नागरिकों ने ही नेताओं को गद्दी पर बिठाया है और उनके घोषणापत्र को चुपचाप स्वीकार किया है। यही वजह है कि नेताओं ने हमारी चुप्पी को अपना आदेश बना लिया है।

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JNU celebrity protest - फोटो : twitter
सरकार से कुछ उम्मीद थी
हममें से कुछ लोगों को उम्मीद थी सरकार आर्थिक एजेंडे पर काम करेगी। कुछ लोग नेताओं के भाषण से सहमत हुए, उन भाषणों से सहमत हुए जिन्होंने हमारे पूर्वाग्रहों को हवा दी। हममें से कुछ लोगों को कोई फर्क नहीं पड़ा। हमें लगा कि राजनीति किसी और की समस्या है। हममें से कुछ लोगों को आलोचना करने से डर लगा था। ऐसा इसलिए भी था क्योंकि हमने आलोचना करने वालों का बुरा हश्र होते हुए देखा था। लेकिन आखिरकार, लोकतंत्र सिर्फ एक अधिकार ही नहीं बल्कि एक जिम्मेदारी भी है। ये देश की सुरक्षा करने का दायित्व भी है, सिर्फ चुनाव वाले दिन ही नहीं बल्कि हर रोज।
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जनता को पसंद आया आरबीआई गर्वनर का काम - फोटो : Reuters
खुशकिस्मती से हाल के दिनों में भारत से आने वाली कुछ खबरें उत्साह बढ़ाने वाली भी रहीं। जब देश में अलग-अलग धर्मों के युवा, हिंदू और मुसलमान युवा, हाथों में हाथ डालकर और राष्ट्रध्वज लिए, नेताओं के थोपे नकली अलगाव को ठुकराकर एक साथ मार्च करते हैं तो यह दिखाता है कि हमारे संविधान की मूलभूत भावना आज भी उज्ज्वल है। जब प्रशासनिक सेवाओं के अधिकारी अपनी 'ड्रीम जॉब' से इसलिए इस्तीफा दे देते हैं क्योंकि उन्हें नहीं लगता कि वो ठीक तरह से अपना फर्ज निभा पा रहे हैं तो वो इस बात की जीती-जागती मिसाल होते हैं कि हमें आजादी दिलाने वाले पूर्वज हमें आज भी प्रेरित कर रहे हैं। जब एक चुनाव आयुक्त बिना अपने परिवार के उत्पीड़न की परवाह किए पूरी निष्पक्षता से अपना काम करता है तो वो ये सुनिश्चित करता है कि मूल्य पूरी तरह नष्ट नहीं हुए हैं। जब मीडिया के कुछ लोग बिना थके हुए सच्चाई तक पहुंचने के लिए काम करते हैं जबकि उन्हीं के साथी सरकारी दबाव के आगे घुटने टेक देते हैं, तो वे ये दिखाते हैं कि एक गणतंत्र का जिम्मेदार नागरिक कैसा होता है।
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जेएनयू में दीपिका पादुकोण - फोटो : सोशल मीडिया
सिद्धांतों के लिए लड़ने वाले लोग
जब बॉलीवुड की एक अभिनेत्री अपनी आने वाली फिल्म को खतरे में डालकर जेएनयू में घायल छात्रों से मिलकर अपना मौन विरोध जाहिर करती है तो वो हमको उन सभी मुद्दों की ओर देखने के लिए प्रेरित करती है, जो सचमुच दांव पर लगी हुई हैं। ये वो लोग हैं जो आज उन सिद्धातों के लिए लड़ रहे है जिनके लिए महात्मा गांधी ने अपनी जान दी थी। ये वो लोग हैं जिन्होंने आजादी पाने के लिए कभी मार्च नहीं किया लेकिन आज वो उस आजादी को बचाने के लिए मार्च कर रहे हैं। ये वो लोग हैं जो रवींद्र नाथ टैगोर के सपनों के भारत को सच में बदलने की कोशिशों में लगे हुए हैं। इस 26 जनवरी को भारत अपना 70वां गणतंत्र दिवस मनाएगा, वो दिन जब भारत को अपना संविधान मिला था। आदर्शों और उदारवाद से भरा संविधान। हमारा संविधान परफेक्ट नहीं था लेकिन ये उन विद्वान महिलाओं और पुरुषों का बनाया था जो विभाजन की विभीषिका का गवाह बनने के बाद एकता से भरा भविष्य बनाना चाहते थे।
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raghuram rajan - फोटो : सोशल मीडिया
वो समझते थे कि भारत में बहुत कुछ अच्छा करने की क्षमता है लेकिन वो ये भी समझते थे कि भारत में आत्मघाती ताकतें भी बाहर आ सकती हैं। इसलिए उन्होंने ऐसा संविधान बनाया जिनमें हमारे साझा हितों को ध्यान में रखा गया था। नए दशक में इससे अच्छा प्रण भला और क्या होगा कि हम सब ये सुनिश्चित करें कि संविधान की इस भावना की लौ हममें लगातार जलती रहे? आइए, आज के मुश्किल भरे दौर में हम एक बेहतर भारत बनाने के लिए काम करें जो उस सहिष्णुता और सम्मान का उज्ज्वल उदाहरण हो, जिसकी कल्पना हमारे पुरखों ने की थी। आइए, हम नए दशक के लिए अपने इस काम पर लग जाएं।

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