इस फिल्म में रिश्ते हैं। रूठना-मनाना, हंसी-मजाक है। सास-बहू, पति-पत्नी, मां-बेटे और पिता-पुत्र हैं। यहां मुकम्मल परिवार है। कहानी में रोमांस है और कॉमेडी भी। फिल्म की खूबी यह है कि इसमें आप हंसते-हंसते रो सकते हैं और रोते-रोते अचानक हंसी छूट जाती है। यह बदलते हुए बॉलीवुड परिवारिक प्रस्तुति है। यह अलग बात है कि विषय सीधा-सरल नहीं हैं। मामला ऐसे दंपति का है जो धर्मशास्त्रों की नीति-रीतिनुसार गृहस्थाश्रम की विदाई के मुहाने पर खड़ा है। रेलवे में टीटी कौशिक साब (गजराव राव) रिटायर होने को हैं। वह सहृदय-कवि हृदय हैं। पत्नी बबली (नीना गुप्ता) को बरसात की एक रात में स्वरचित कविता सुनाते हुए रोमांटिक हो जाते हैं। यह रोमांस उनके लिए रूटीन-सा होता है परंतु 19 हफ्तों के बाद हालात करवट बदल लेते हैं, जब बबली की तबीयत नासाज होती है। बेटा डॉक्टर के पास ले जाता है और पता चलता है कि कौशिक परिवार में नया सदस्य आ रहा है।
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कौशिक दंपति जाने कब का अपने परिवार को पूरा मान चुके हैं। बड़ा बेटा नकुल (आयुष्मान) नौकरी करता है, दूसरा बारहवीं बोर्ड परीक्षा देने को है। कौशिक साब की बूढ़ी मां (सुरेखा सीकरी) बबली की सख्त सास हैं। कौशिक दंपति द्वारा सुनाई खुशखबरी के बाद दोनों जवान बेटे कैसे दोस्तों का सामना करेंगे? कौशिश साब कहां-कहां क्या जवाब देंगे? सास बहू को कितने ताने मारेगी? नकुल की गर्लफ्रेंड पर क्या इंप्रेशन पड़ेगा? रिश्तेदार-पड़ोसी तो सबके एक जैसे होते हैं, बस मजाक उड़ाने का मौका चाहिए।
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कौशिक परिवार के इन हालात को निर्देशक अमित शर्मा और उनके राइटरों ने खूबसूरती से पटकथा में ढाला। वह न तो सिनेमाई अंदाज में चौंकाते और न नकली ड्रामा या प्रपंच रचते हैं। फिल्म सहजता से बढ़ती है। 50 पार की उम्र में मां बनने जा रही बबली कुछ हाई-वोल्टेज नहीं करती। सीधे-सीधे पति को फैसला सुनाती है कि इस बच्चे को रखना चाहती है। यह रोचक परिस्थिति है जो आज के जमाने अजीब लगती है। फिल्म में निर्देशक ने पारिवारिक मूल्यों को सबसे ऊपर रखा। बगैर किसी खल-पात्र या नकारात्मक परिस्थिति के अमित शर्मा बधाई हो को मनोरंजक बनाते हैं। परिवार के हक में चुपचाप बहुत कुछ कह जाते हैं।
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फिल्म में रचे गए पात्र हमारे आस-पास के हैं। दिल्ली-मेरठ का परिदृश्य कहानी को जीवंत बनाता है। आयुष्मान खुराना हीरो हैं परंतु पहले हिस्से में कहानी पूरा टीम वर्क है। परिवार के हर सदस्य की जिंदगी आपके सामने है। इनमें सबसे ज्यादा प्रभाव छोड़ती हैं 73 बरस की सुरेखा सीकरी। उनका अभिनय और अंदाज फुलझड़ी जैसा है। रंग बदलती सास के रूप में वह याद रहती हैं। नीना गुप्ता के चेहरे पर मां की ममता और बच्चों के लिए प्यार खूब झलकता है।
गजराव राव अपने किरदार में फिट हैं। आयुष्मान को दूसरे हिस्से में मौका मिला और वह अपना काम बखूबी करते हैं। सान्या ने भी अपने रोल को बखूबी निभाया। फिल्म का संगीत ठीक है। बधाई हो को अपने विषय के कारण भले ही यू/ए प्रमाणपत्र मिला हो लेकिन आधुनिक होते जमाने में परिपक्व सोच के साथ इसे परिवार के संग देखा जा सकता है।