एक बार फिर
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और, बंबई में सेंसर बोर्ड से मिला तोहफा क्या था?
आमतौर पर सेंसर बोर्ड से बुलावा आता है तो फिल्म निर्देशक की रूह तक कांप जाती है। मेरे साथ भी वही हुआ। उस समय रीजनल ऑफिसर अपर्णा मोहिले हुआ करती थीं। फिल्म मेरी बोल्ड तो थी ही। मैं वहां गया तो सब मेरे चेहरे को ऐसे देख रहे थे जैसे गोली मार देंगे। लेकिन, मेरे अंदर घुसते ही वह खड़ी हो गई। बोली, 'प्लीज कम मिस्टर पांडे। व्हाट ए फिल्म यू हैव मेड!' ये मुझे फिल्म के लिए मिला पहला सरकारी सम्मान था। सरकारी दफ्तर का मेरा ये भी अनुभव रहा कि मुझसे चाय पानी के लिए पूछा गया। फिल्म सेंसर हो चुकी गई तो मैं वापस लंदन चला गया कि अब बाकी काम फिल्म के वितरक देख लेंगे।
इसके बाद आपको तुरंत ही वापस भी आना पड़ा था शायद?
हां, बस वीकेंड ही गुजरा था। शायद सोमवार का दिन रहा होगा। मुझे इंडिया हाउस से एक फोन आया। फोन पर मौजूद महिला ने कहा, 'विनोद! मुझे मंत्रालय से एक प्रार्थना पत्र मिला है। वे आपको भारत भेजना चाहते हैं।' मैंने कहा क्यों? वह बोली कि वहां एक फिल्म फेस्टिवल है। वह आपकी फिल्म को पैनोरमा में दिखाना चाहते हैं। मैंने पूछा कि क्या होता है पैनोरमा? तो उन्होंने बताया कि ये भारत के अंतर्राष्ट्रीय फिल्म फेस्टिवल का हिस्सा होता है जिसमें चुनिंदा फिल्मों का प्रदर्शन किया जाता है और ये एक बहुत बड़ा सम्मान है किसी निर्देशक के लिए। मैं तो बहुत खुश हो गया। लेकिन, महिला के अगले वाक्य ने मेरा उत्साह ठंडा कर दिया। वह बोलीं, आपको भारत जाना पड़ेगा लेकिन हम आपके भाड़े का खर्चा नहीं उठा सकते। जब आप बॉम्बे पहुंच जाओगे तो उसके आगे का हम आपका सारा खर्चा उठाएंगे। मैं फिर वापस भारत आ गया, लेकिन इस बार मेरा स्वागत किसी स्टार की तरह किया गया। यहां आकर ही पता चला कि अपर्णा मोहिले ने ही मेरी फिल्म पैनोरमा के लिए भेजी थी। और, इस बात का जिक्र मेरे लंदन लौटने से पहले भी जुहू की एक पार्टी में हुआ था, लेकिन तब मेरी समझ में ही नहीं आया।