लोकसभा चुनाव के एक्जिट पोल सामने आते ही, जहां ज्यादातर सर्वे में एनडीए को बहुमत मिलता दिखाई दे रहा है, वहीं यूपीए भी 2014 के मुकाबले बेहतर स्थिति में नजर आ रही है। वहीं चुनाव की बेला को भुनाने में बॉलीवुड पीछे नहीं है। जी हां, चुनाव और फिल्मों का गहरा संबंध रहा है। पुराने समय से ही देखें तो चुनावों के दौरान राजनीति के इर्द-गिर्द कई फिल्में बनती रही हैं। फिल्मकार खासतौर से अपनी फिल्म की कहानी राजनीतिक मुद्दों पर रचते आए हैं और चुनाव के मौसम में ऐसी फिल्मों का प्रमोशन करना उनके लिए सोने पे सुहागा है। आईए जानते हैं, उन 8 फिल्मों के बारे में तो, जिसमें राजनीति को खूब भुनाया गया।
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Jackky Bhagnani
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यंगिस्तान
हिंदुस्तान में बसता है एक यंगिस्तान। ये यंगिस्तान इस देश की तकदीर बदलने का माद्दा रखता है। लोकसभा चुनाव को ध्यान में रखते हुए ही इस फिल्म की कहानी गढ़ी गई है। फिल्म का हीरो एक राजनेता है और का चुनाव लड़ने जा रहा है। वह किस तरह युवाओं की सोच को बदलना चाहता है और किस तरह वह लोगों को राजनीति में आने के लिए प्रेरित करता है, इसी के इर्द-गिर्द कहानी घूमती है। वैसे यह फिल्म राजनीति के रंग में रंगी एक प्रेम कहानी है।
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Gulaab Gang
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गुलाब गैंग
माधुरी दीक्षित और जूही चावला की इस फिल्म में महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने के साथ-साथ समाज में राजनीति और जनता के बीच चल रहे गंदे खेलों को भी बड़ी खूबी से पेश किया गया। जूही (सुमित्रा देवी) एक राजनेता हैं और राजनीति की बारीकियां अच्छी तरह जानती हैं। वो सत्ता हासिल करने के लिए रज्जो (माधुरी) को लुभाने और उसका फायदा चुनाव में उठाना चाहती हैं। रज्जो सुमित्रा की नीयत भांप उसके खिलाफ ही चुनाव लड़ती है। बस, यहीं से इनके किरदारों के अस्तित्व की लड़ाई शुरू होती है।
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Bhoothnath Returns
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भूतनाथ रिटर्न्स
अमिताभ बच्चन की भूतनाथ वर्ष 2008 में आई थी। इसमें एक भूत और बच्चे की दोस्ती ने जमकर धमाल मचाया था। 2014 में जब भूतनाथ ने वापसी की तो कहानी को मौजूदा समय से जोड़ने के लिए इसमें लोकसभा इलेक्शन का रंग पिरोया गया। अब आप इसी से फिल्म के तेवरों का अंदाजा लगा सकते हैं। फिल्म में बोमन ईरानी नेता के रोल में हैं और वे बड़ा ही मजेदार डायलॉग कहते हैं, “इलेक्शन सर्कस की तरह होता है यहां जोकर सिर्फ टाइमपास के लिए होता है, टिकटें खरीदी जाती हैं शेर को देखने के लिए।” भूतनाथ को इलेक्शन लड़ते भी दिखाया था।
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nayak
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नायक
अनिल कपूर की फिल्म ‘नायक: द रियल हीरो’ आप नहीं भूले होंगे। 2001 में रिलीज हुई यह फिल्म ‘एक आम आदमी के राजनीति में आने की कहानी है। फिल्म में एक साधारण इंसान (पत्रकार) को एक दिन के लिए मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठने का मौका दिया जाता है। फिर उसके बाद शुरू होती है प्रशासनिक प्रणाली को सुधारने और भ्रष्टाचार को खत्म करने की रोमांचक कहानी।
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Raajneeti
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'राजनीति'
प्रकाश झा की फिल्म राजनीति वास्तविक जीवन में राजनीति के उतार चढ़ाव की कहानी थी। फिल्म के कुछ पन्ने आज के नेताओं की निजी जिंदगी से लिए गए थे। फिल्म में कैटरीना कैफ एक प्रशिक्षित राजनेता के रूप में थीं। फिल्म के बनने के वक्त ही यह बात जोर शोर से फैलाई गई थी कि उनका किरदार सोनिया गांधी से मेल खाता है।
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satyagraha
- फोटो : file photo
सत्याग्रह
अन्ना आंदोलन और उससे उपजे कई सवाल इस फिल्म की पृष्ठभूमि में हैं। प्रकाश झा ने फिल्म के जरिए संदेश देने की कोशिश की कि भ्रष्ट और लगभग सड़ चुकी व्यवस्था के खिलाफ अब जनता को अपने गुस्से का इजहार सिर्फ आपसी बहसों से नहीं, बल्कि सड़क पर उतर कर करना होगा।
राजनीतिक फिल्म सेंसरशिप का शिकार
हमारे यहां राजनीतिक फिल्मों के रिलीज पर सेंसरशिप का भी इतिहास रहा है। इंदिरा गांधी के चरित्र से प्रेरित फिल्मकार गुलजार और लेखक कमलेश्वर की आंधी पर आपातकाल के दौरान प्रतिबंध लगा दिया गया तो सांसद अमृत नाहटा की किस्सा कुर्सी का पर, जो कि इंदिरा गांधी और संजय गांधी की राजनीति पर एक व्यंग्यात्मक फिल्म थी, इमरजेन्सी के दौरान प्रतिबंध लगाया गया। इसके मूल प्रिंट तक जला दिए गए। जगमोहन मुंदड़ा अपने जीते जी सोनिया गांधी पर सोनिया नाम की फिल्म बनाने के अपने सपने को पूरा नहीं कर पाए। इतालवी अभिनेत्री मोनिका बलूची को सोनिया गांधी की भूमिका में लेने की मीडिया घोषणाओं और इन दावों के बावजूद कि सोनिया गांधी को इस फिल्म को लेकर कोई समस्या नहीं है, फिल्म आगे नहीं बढ़ पाई।